जलालपुर धई व खजुरी में आज खेली जायेगी होली, शोक के चलते होली के दिन नहीं खेली जाती होली

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रायबरेली : पूरे देश में जहां 13 मार्च को होली की रौनक छाई रही वहीं दीनशाह गौरा व जगतपुर क्षेत्र की दो ग्राम पंचायतें जलालपुर धई व खजुरी शोक में डूबी रहीं। अबकी बार यहां 20 मार्च को होली मनाई जाएगी। जहां जलालपुर धई गांव में होली के दिन होली न मनाने के बारे में कई कहावतें जिसमें पहली यह है कि जलालपुर धई के शासक धईसेन की रियासत पर मुगल सैय्यद जलालुद्दीन की बुरी नजर थी। इसलिए वह इस रियासत को हथियाने के लिए रणनीति बना रहा था। जब उसे गुप्तचरों से मालूम चला कि धई का शासक होली के दिन प्रजा के बीच निहत्थे होकर होली मनाता है तो वह उसी मौके का फायदा उठाने के लिए रणनीति चलने लगा। उसने अपनी सेना को रातो-रात जलालपुर धई गांव के लिए लेकर चल पड़ा और रात में ही गांव के बाहर गन्ने के खेतों में सेना सहित छिप गया। होली की सुबह जब जनता के साथ राजा भी होली की मस्ती में डूब गया।

आनन-फानन में राजा धईसेन की सेना ने मोर्चा संभाला लेकिन जलालुद्दीन के षडयंत्र के आगे धईसेन की सेना की नही चली। युद्ध में राजा धईसेन वीरतापूर्वक लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। तभी से यहां ये लोग इस दिन शोक मनाते है। ग्रामीणों का कहना है कि राजा धईसेन ने कुछ बुजुर्गो को स्वप्न में होली मनाने के लिए कहा था उन्होंने कहा कि वे होली जलने के आठवें या सातवें दिन पहले पड़ने वाले शुक्रवार या सोमवार को यहां आएंगे। तब से यहां के ग्रामीण इंतजार के बाद इसी दिन होली मनाते है। वहीं दूसरी कहावत है कि यहां के ग्राम देवता भुइयां बाबा जो गांव के किनारे रहते थे।

इन्हें घमेरी का राजा होली की रात उठा ले गया था। जब ग्रामीण इन्हें गांव में नहीं पाते तो होली नहीं मनाने का निर्णय लेते हैं। तब दूसरे दिन ग्राम देवता कुछ ग्रामीणों को स्वप्न देकर कहते हैं कि वह होली जलने के सातवें दिन पड़ने वाले पहले सोमवार या शुक्रवार को गांव में रहेंगे। तब से होली जलने के सातवें निर्धारित दिन सोमवार या शुक्रवार जो भी पहले पड़ता है उस दिन गांव में होली मनाई जाती हैं। वहीं दूसरी ग्राम पंचायत खजुरी के निवासी अध्यापक गंगा बख्श सिंह बताते हैं कि यहां भर शासकों का किला था जिसको मुगल शासकों ने होली के दिन ही आक्रमण करके किले को ध्वस्त कर दिया था। तभी से इस गांव में भी होली के दिन शोक मनाया जाता है और होली में अष्टमी के बाद सोमवार या शुक्रवार को ही होली खेली जाती है। गांव के बुजुर्गों ने बताया कि कई बार यहां इस परम्परा को बदलने की च्येष्ठा भी की गई, लेकिन हर दम कोई न कोई अप्रत्याशित घटना घट जाती है जिससे होली के दिन शोक भी मनाना पड़ता है। इसलिए यह परम्परा अभी भी चल रही है।

रिपोर्ट – राजेश यादव

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