अइसन व्यवस्था मा गरीब कै लरिका कइसन पढ़ी पइहें

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बछरावाँ/रायबरेली (ब्यूरो)–  जनपद में अंग्रेजी शिक्षा के नाम कुकुरमुत्तों की तरह फैले नर्सरी स्कूलों के प्रबंधको एवं बुक सेलरो द्वारा अभिभावकों के खाते पर डाका डाला जा रहा है। हर तथाकथित स्कूलों में चलने वाले कोर्स निर्धारित किताबो की दुकानों पर ही मिलेगा। हर कोर्स पर तय कमीशन स्कूल प्रबंधको के पास एकमुश्त पहुँच जाता है। स्कूल प्रबंधको द्वारा बच्चो के एडमिशन कराने गये अभिभावकों को एक पर्ची पकड़ाकर हिदायत दे दी जाती है कि फ़ला दुकान से ही किताबे खरीदना । इन किताबो पर रेट इतना पड़ा होता है कि जिससे पचास से साठ प्रतिशत तक कमीशन स्कूल संचालक वसूलते है।

इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को दूसरे वर्ष भी न सौ तक गिनती याद हो पाती है और न ही दस तक का पहाडा। कई किताबें तो साल भर खोली ही नही जाती है। इन स्कूलों में जहाँ कोर्स से लेकर फीस तक के नाम पर अभिभावकों की जेब पर डाका डाला जाता है वही दो से ढाई हज़ार रुपये मासिक पर शिक्षिकाएं रखकर उनसे बंधुवा मजदूरों की भांति काम लिया जाता है। भले ही उन्हें अंग्रेजी न आती हो लेकिन उन्हें अंग्रेजी मीडियम के विद्यालय में नौकरी आसानी से मिल जाती है और वे धड़ल्ले से वहां पढ़ाती भी है |

कस्बा बछरावाँ से लेकर ग्रामीण क्षेत्रो तक इन तथाकथित नर्सरी स्कूलों की बाढ़ सी आ गयी है। पांच छः साल के नन्हे- मुन्ने बच्चो की पीठ पर भारी- भरकम बैग का वजन जिसे लादकर कुछ कदम चलना भी दूभर होता है। अंग्रेजी माध्यम के नाम पर अभिभावकों की जेब पर खुलेआम डाक डाला जा रहा है। यूकेजी, एलकेजी का कोर्स 3000 रूपये का होता है। वही इन कक्षाओं की फीस 350-400 रूपये होती है। अगर रिक्शा या वैन की सुविधा ली तो 200 से 300 रूपये और बढ़ जायेगे। इन तथाकथित स्कूलों में पढ़ने वाले नन्ने- मुन्ने बच्चो की पीठ पर लादे जाने वाले बैग में भरे कोर्स की कीमत पौने तीन हजार रूपये होती है। हर विद्यालय ने एक बुकसेलर से समझौता कर रखा है कि जिससे तहत कोर्स उसी दूकान पर मिलेगा। दूसरे बुकसेलर की दूकान पर नही।

सूत्रों की माने तो पचास से सत्तर प्रतिशत कमिशन पर आने वाली किताबो में कितने प्रतिशत बुकसेलर का होगा और कितने प्रतिशत स्कूल प्रबंधक का होगा। यह सब शिक्षण सत्र शुरू होने के पहले ही तय हो जाता है। जोकि अंत में बुकसेलर प्रबंधक को मोटी रकम के रूप में पंहुचा देता है। फीस एवं कोर्स के नाम पर ये स्कूल जहाँ अभिभावकों की जेबो पर डाका डॉल रहे है। लेकिन पढाई का स्तर कितना अच्छा व कितना ऊंचा है, बच्चो को पहाडे व गिनती आती है या नही इससे कोई मतलब नही होता है।

स्कूल प्रबंधको व बुक सेलरो की इस लूट का पता लगाने संवादाता जब क्षेत्र में गया तो एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि, “साहेब हमार लरिकवा बछरावाँ मा याकन नामी स्कूलवा मा पढ़त है वि स्कूलवा की फीस अतनी ज्यादा हवय कि जतना हम कमाइत हनि उतनी म मुश्किल से फिसवा कितबवा खरीद पाइत हनि। जेतना हम मजूरी कैकई कमाइत हनि सब लरिकवा के पढाई मा चुकि जात हवय। लेकिन का करी कौनी तरह पढ़ौबै करब। लेकिन हमका लागत हवय कि अइसन ब्यवस्था म हमार लरिकवा का पढ़ी पाई। इस तरह से एक गरीब व्यक्ति ने संवाददाता को अपनी पीड़ा बताई। सवाल यह उठता है कि सूबे के नए निज़ाम भ्रस्ट्राचार,ऐंटिरोमिओ स्क्वायड,का गठन कर लड़कियों कि सुरक्षा,एंटी भूमाफिया स्क्वायड की स्थापना कर भू माफियाओ पर नकेल कसने की बात करना, स्वच्छता अभियान को बढ़ावा देने जे साथ- साथ अवैध बूचड़ खानो पर पाबन्दी लगाकर ,नकल माफियाओ पर नकेल कसने की बात करते है। क्या योगी जी की नज़र प्रदेश में कुकुरमुत्तों की तरह पनप चुके अंग्रेजी मीडियम व नर्सरी स्कूलों के प्रबंधको तथा बुक सेलरो द्वारा अभिभावकों की जेबो पर जो डाका डाला व अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर अभिभावकों से जो वसूली की जा रही है। उस तरफ भी जायेगी, देखते है |

रिपोर्ट- जय सिंह

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