कैसे बन जाते है फटीचर से करोड़पति प्रधान, अधिकारों व पैसे ने बढ़ाया प्रधानी का आकर्षण

0
110

बछरावां/रायबरेली (ब्यूरो)- पंचायती राज व्यवस्था में प्रधानों को वर्ष 1985 से पहले न तो आज की तरह बजट आता था और न ही आज की तरह अधिकार प्राप्त थे। सरकारी योजनाओं को लागू होने के बाद सबसे पहले 1995 में चुनाव कराए गए। तब से प्रधानों का कद दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। प्रधान बनने वाले को भले ही अपने अधिकारों व विकास योजनाओं की जानकारी न हो, पर वो आने वाले बजट का बराबर इंतज़ार करते रहते है।

सत्ता विकेन्द्रीयकरण पंचायतीराज व्यवस्था में प्रधान का पद अधिकार और पैसे के कारण और महत्वपूर्ण हो गया है। विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन से लेकर स्वास्थ्य, शिक्षा, निर्माण कार्य, राशन दुकान, पेंशन योजनाओं का निर्धारण आदि के लिए प्रधानों के पास धनवर्षा होती रहती है। इसी के चलते प्रधान बनते ही पाँच साल में प्रधान फटीचर से लखपति बन जाता है। जिनको कभी साइकिल नही नसीब होती वो प्रधान बनते ही चार पहिया वाहन मालिक बन जाते है। और जिनकी आँखों का चीपर नही छूटता था वो हजारों का चश्मा लगाकर घूमने लगते है।

प्रधान के साथ ही ग्रामविकास अधिकारी व ग्रामपंचायत अधिकारी भी मालामाल हो जाते है। तथा करोड़ो की कोठी बनवा लेते है। जिसकी बानगी बछरावां विकासखण्ड में देखी जा सकती है। जब प्रधान पाँच साल में लखपति बन सकता है तो सोचिये  ?

पंचायत मन्न्त्रियो व ग्रामविकास अधिकारियों की क्या शान होगी। क्योंकि विकासखण्ड में कार्यरत किसी भी ग्रामपंचयत अधिकारी/ग्रामविकास अधिकारियो के पास 5 से 6 ग्रामपंचयते है। इसी के चलते विधायक से लेकर राष्ट्रीय नेता तक अपने आदमी को प्रधान बनाना चाहता है। विभिन्न योजनाओं से लाखों रुपये ग्रामपंचयत को हर साल विकास के लिए आवंटित किया जाता है। इसमें मिड डे मील, बीआरजीएफ, मनरेगा, ग्यारहवे वित्त,बारहवे वित्त आयोग का लाखों रुपया हर साल   ग्रामपंचयत द्वारा खर्च किये जा रहे है।

इस बजट से गाँव की राजनीति का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया है। वर्ष 2005 व 2007 से ग्रामपंचायतों में विकास के लिए कुबेर जा खजाना आज्ञा है। मनरेगा के तहत गाँवो में विकास कार्य कराने के लिए डिमांड के अनुरूप लाखों रूपया प्रतिमाह दिया जाता है। विद्यालय में बच्चों को दोपहर का भोजन दिलाने की जिम्मेदारी प्रधान को ही दी गयी है। मिनी सचिवालय निर्माण के लिए बीआरजीएफ योजना के तहत लग-भग 10 लाख रुपये की धनराशि आवंटित की जाती है। गाँवो की गलियों को अंधेरा मुक्त करने के लिए जो भी स्ट्रीट लाइटे लगवाई जाती है उनमें भी जमकर  खेल खेला जाता है।

अगर किसी भी ग्रामपंचयत में प्रधानों द्वारा लगवाई गयी स्ट्रीट लाइटे की जांच निष्पक्षता से कराई जाए तो इन भ्रष्टाचार के तवे पर रोटियां सेंकने वालों की कलई खुलते देर नही लगेगी। सवाल यह उठता है कि बिल्ली के गले मे घण्टी बाँधेगा कौन, क्योकि सारे कुँए में ही भांग पड़ी है। क्या भारत को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने वालों, सबका साथ-सबका विकास व अच्छे दिनों का सपना आमजनमानस को दिखाने वालों की नज़र पाँच साल में प्रधान बनने के बाद फटीचर से लखपति बने लोगों पर पड़ेगी ।

रिपोर्ट-जयसिंह पटेल

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY