एच आई वी‬ संक्रमण का क्या है आयुर्वेद में इलाज |

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aids-virus-shutterstock_एच आई वी‬ संक्रमण- यह एक ‪‎वाईरल‬ संक्रमण होता है जो कि शरीर की रोग ‪‎प्रतिरोधक‬ प्रणाली को धीरे धीरे खत्म कर देता है, फ़लस्वरुप रोगी विभिन्न रोगों से ग्रसित होकर ‪‎मृत्यु‬ का ग्रास बन जाता है ।
एच आई वी संक्रमित व्यक्ति अपनी जिन्दगी सामान्य रुप से जी सकता है , बस उसको जरुरत है सजग रहने की
‪‎आयुर्वेद‬ मे लगभग सभी ‪‎संहिताओं‬ मे ‪‎ओज‬ का वर्णन किया है , यही मनुष्य का बल होता है यह ओज ही शरीर को रोगों से लडने का बल प्रदान करता है । इस रोग मे इस ओज का ही क्षय होता है, जिसके कारण मनुष्य अकाल मृत्यु का ग्रास बन जाता है । हजारों साल् पहले ही इस रोग का वर्णन आयुर्वेद मे किया गया है ।
एच आई वी संक्रमण कैसे होता है, वैसे तो रोग प्रतिरोधक क्षमता एक भगवान की देन होती है ।
मुख्य कारण-
यौन संबंध- असुरक्षित योन संबध
पहले से प्रयोग की गई सिरिंज से
संक्रमित रक्त से
संक्रमित माता के दुध से उसके बच्चे मे

योन संबंध — असुरक्षित योन संबध ही मुख्य कारण होता है , इसमे असुरक्षित योनि मैथुन, गुदा मैथुन, मुख्य है
गुदा मैधुन अत्यधिक गंभीर होता है । मुख मैथुन इनकी आपेक्षा बहुत ही कम गंभीर होता है ।
मुख मैथुन से एच आई वी संक्रमण बहुत ही विरले केस मे मिला है ।
एच आई वी वाईरस के वाहक– संक्रमित व्यक्ति का तरल —
*.रक्त
*.योनि तरल
*.गुदा तरल
*.प्लास्मा
*.वीर्यमुख के तरल ( सलाईवा)मे

एच आई वी वाईरस नग्न्य होता है
एच आई वी संक्रमण संक्रमित व्यक्ति के वाईरल लोड पर निर्भर रहता है , यदि वाईरल लोड ज्यादा रह्ता है तो संक्रमण का ज्यादा खतरा रहता है ।
एच आई वी संक्रमित व्यक्ति विना कुछ लक्षणॊ के भी संक्रमण कर सकता है ।
यदि आपने असुरक्षित योन संबध किया है तो तुरंत ही आप एच आई वी का टेस्ट करवाएं , जल्दी पता लगने पर आप् की चिकित्सा संभव है और एक् बेहतर जीवन जी सकते हो ।
एच आई वी संक्रमण के मुख्य लक्षण–
यद्यपि एच आई वी संक्रमित व्यक्ति कई सालो तक बिना लक्षणॊं के रह सकता है , लक्षण भी एक समान नही होते हैं । एच आई वी स्ंक्रमण की अंतिम अवस्था एड्स के नाम् से जानी जाती है लेकिन आजकल बेहतर इलाज होने के कारण इस अवस्था से बचा जा सकता है ।
*.बार बार सर्दी जुकाम लगना
*.लो ग्रेड फ़ीवर यानि लगातार बुखार का बना रहना
*.शरीर मे फ़ोड़े फ़ुन्सियों का अधिक निकलना
*.अतिसार होना ।
*.शरीर का अचानक भार कम हो जाना ।ये लक्षण मुख्य रुप से होते हैं , पर् जरुरी नही है कि ये लक्षण हो , या ये लक्षण हो तो जरुरी नही है कि संक्रमण हो ।
निश्चय् तो टेस्ट करवाने से होता है ।
आयुर्वेदिक उपचार के साथ-साथ, पौष्टिक आहार, व्यायाम और योगा, अवसरवादी संक्रमण के लिए समय पर एलोपेथिक उपचार और नियमित रूप से परामर्श लेना एड्स के रोगियों के प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण हैं। एचआईवी/एड्स के उपचार के लिए आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली जड़ी बूटी में, अमालाकी, अश्वगंधा, और तुलसी है। आयुर्वेदिक दवाओं का उपयोग रोगियो में एड्स के वायरस को खत्म करने, इम्यून डेवलपर, या शरीर को साफ करने के लिए किया जा सकता है।
वायरस किलर के रूप में आयुर्वेदिक दवाएं :विभिन्न आयुर्वेदिक दवाइयां जैसे कि ऐरी चथुरा, त्रिफला, सक्षमा त्रिफला शक्तिशाली वायरस किलर है जो एचआईवी वायरस को भी मार सकते है। ये दवाएं संयुक्त हो सकती है या एलोपेथिक दवाओं के साथ इस्तेमाल में लाई जा सकती है।
इम्यून डेवलपर्स के रूप में आयुर्वेदिक दवा:ये आयुर्वेदिक दवाएं इम्यूनिटि को बढ़ाती है, सीडी4 सेल के साथ साथ सीडी8 कोशिका को भी एचआईवी से लड़ने के लिए जाना जाता है। च्यवनप्राश, अश्वगंधा रसायन, अजमामसा रसायन, कनमाड़ा रसायन, शोनिथा बस्कारा अरिश्ठा ऐसी दवाए है जो कि प्रतिरक्षा को बढ़ावा देती है।
शारीरिक क्लींसर के रूप में आयुर्वेदिक दवा:इन आयुर्वेदिक दवाओं शरीर को साफ करने, नसों, यहां तक कि कोशिकाओं को साफ करती है। शोनीथा बस्कारा अरिष्ठा, ननार्य अरिष्ठा, क्शीरा बाला कुछ आयुर्वेदिक दवाएं है जोकि प्रतिऱक्षा को बढ़ाती है और बॉडी क्लींसर के रूप में कार्य करती है।
आयुर्वेद के साथ सावधानीःआयु्र्वेदिक दवाएँ एचआईवी/एड्स के रोगियों के उपचार में उपयोगी है लेकिन ये दवाएं पूरी तरह से इलाज नही कर सकती। एंटीरिट्रोवाइरल औषधियां के विपरित वे जल्दी असर नही दिखाती है। कुछ आयुर्वेदिक दवाएं आपके एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी से सबंधित हो सकती है। आयुर्वेदिक दवाओं के चयन से पहले अपने डॉ. से पूछे बिना एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी लेना बंद न करें।

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