मानवता अभी ख़त्म नहीं हुई है, वह चुपचाप अपना जादू बिखेरती रहती है |

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15 साल पहले जब मै यहाँ टहलने के लिए आया करती थी, मैंने एक बुज़ुर्ग को 5 बच्चों के एक ग्रुप को पढ़ते देखा, तब मै रिज़र्व बैंक में नौकरी करती थी और उन बच्चों को देखकर मुझे मेर बचपन याद आ जाता था जब पापा के काफी पैसे शेयर मार्किट में डूब जाने के बाद हम बहुत ही बुरे हालतों से गुजरना पड़ा था, जब मै 6 साल की थी हमारी आंटी हमसे मिलने के लिए आई और हमारे लिए एक पाताखों का डिब्बा लेकर आयीं |

उस वक़्त हमारे पास ठीक से खाने और पढने का बंदोबस्त नहीं था और मैंने मेरी माँ को कहते सुना काश आंटी इन पटाखों की जगह किताबें या कुछ खाना ले आती | उन परिस्थितियों के कारण मै अपनी पढाई पूरी कर पाने में भी सक्षम नहीं थी और तब से मै इस तरह के बच्चों की मदद करना चाहती थी |

कुछ समय के बाद मैंने अनुभव किया की उन बुजुर्ग ने यह आकर पढ़ना बंद कर लिया है तो उनकी जगह मैंने इस काम को जारी रखने की ठानी, मैंने इस गली में 5 बच्चों के साथ इस काम की शुरुवात की, आज हमारे पास करीब 230 बच्चे और कई कार्यकर्त्ता हैं, बच्चे यह इंग्लिश और गणित पढने आते हैं और आप यकीन नहीं करेंगे पर हर दिन उनके पास खाने के लिए कुछ न कुछ होता है, ऐसा नहीं है की ये सब मै उन्हें देती हूँ बल्कि शहर से लोग केले, चोकलेट, टॉफी, डाल और चावल लेकर आते हैं ताकि ये बच्चे पह्दै के साथ सेहत में भी विकास करें |

मानवता अभी ख़त्म नहीं हुई है यह बिना किसी शोर के अपना जादू दिखाती रहती है |

 

Via – Humans of Bombay

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