मकर संक्रान्ति, जाने है क्या

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सूर्य और उसके किरणो से उत्पन्न ऊर्जा समस्त स्रष्टि की जनक एंव उसकी पोषक है,खगोल शास्त्र के दृष्टी से पृथ्वी को बारह अक्षांस भाग मे अथवा राशियों में विभक्त व चिन्हित किया गया है।और इन्ही बारह राशियों में एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश को संक्रांति कहते है,तथा प्रवेश की अवधी को संक्रांति काल के नाम से मनीषियो एंव वैज्ञानिको ने सम्बोधित किया है,पैराणिक एंव अध्यात्मिक दृष्टी कोण से आदि काल से आज तक चली आ रही है,मान्यतायें जो विभिन्न उत्सवों एंव पर्वो के रुप मे समाज एंव व्यक्ति को संयोजित एंव सुसंस्कृत किये जाने का प्रयास किया गया है,जिसमे वैज्ञानिक दृष्टी कोण भी समाहित है,वर्तमान में विभिन्न कारणों से प्रभावित हो कर भले ही हमारे भारतीय औपचारिकता तक सिमित रह गया है लेकिन उसकी प्रसंगिकता आज भी तर्क संगत है।

यहा हम वस्तुत:मकर संक्रान्ति और उसके वैज्ञानिक विश्लेषण की बात कर रहे है,जैसा कि उपर के कथन में सूर्य के बारह राशियों मे प्रवेश की बात कही गई है,तदानुसार सूर्य के उत्तर से दक्षिण की ओर बढने को दक्षिणायन एंव दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ने को उत्तरायण होना कहा गया है,आज के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है और यह मात्र एक खगोलीय घटना नही है इसके प्रवेश अवधि मे उससे उत्पन्न किरणों और पृथ्वी पर पडने वाले प्रभावों से जीवों को संरक्षित करने और उसके दुष्परिणामों को निष्प्रभावी करने के प्रयास को ही पर्व के नाम से संम्बोधित किया गया है,स्नान, दान अथवा अर्ध देना उन्ही प्रयासो का एक स्वरुप है।जिन्हें हम मकर संक्रान्ति कहते है।

रिपोर्ट–दीपनारायण यादव

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