अपने अस्तित्व की लड़ाई में लगा बनारस

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वाराणसी(ब्यूरो)- वरुणा और अस्सी नदी के बीच गंगा तट पर बसा सांस्कृतिक एवं धार्मिक नगरी वाराणसी प्राचीन काल से ही विभिन्न मत-मतान्तरों की संगम स्थली रही है। विधा के इस पुरातन और शाश्वत नगर ने सदियों से धार्मिक गुरूओं, प्रचारकों एवं सुधारको को अपनी ओर आकृष्ट किया है। चाहे वह भगवान बुद्व, शंकराचार्य, रामानुज, संतकबीर, गुरूनानक, तुलसीदास, चैतन्य, महाप्रभु, रैदास हो सभी किसी ना किसी प्रयोजन हेतु इस देवनगरी से जुडे़ रहे। आज यह नगर अपनी पहचान के अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है।

वाराणसी में बहने वाली असी नदी जो कभी वाराणसी के नाम का हिस्सा थी आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। आज असी नदी नाला बना दी गई है । इसे नाला घोषित करने के बाद तो मानो इस पर कब्जा करने की होड़ लग गयी। वरुणा एवं अस्सी जिनके योग से वाराणसी नाम पड़ा नाले के रुप में परिवति॔त हो चुकी है। इन दोनों नदियों में पानी कम कचरा अधिक नजर आता है। उधर से गुजरने वाले लोग बदबू के चलते नाक पर कपड़ा रखने को मजबूर होते हैं।

असी नदी में शहर के बड़े हिस्से का गंदा पानी बह रहा है। वरुणा में बड़े-बड़े गन्दे नाले बेरोकटोक गिर रहे हैं। नदी के दोनो किनारों पर अवैध कब्जा कर अट्टालिकाएं बन रही है। कालोनियों का सारा गंदा पानी नदी में गिर रहा है यही नही शहर का सारा कचरा इनके किनारों पर डाला जा रहा है। इसके लम्बे चौड़े पाट-किनारों पर भू-माफियाओं की निगाह ऐसी गड़ी कि मात्र पिछले 10 वर्षों में ही इन भू-माफियाओं, धन पिपासुओं ने इसे नाले से नाली में बदल दिया। सब ने असी को सुखाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखा । पैसा देकर सरकारी कागजातों में असी नदी के प्रवाह मार्ग के सूखे भूखण्ड पर अवैध तरीके से पहले व्यक्तिगत नाम चढ़वाए गए, फिर पुलिस-प्रशासन और सत्ता की आड़ लेकर इन भूखण्डों पर कब्जा किया गया।

विडम्बना तो यह है कि यह प्रक्रिया उस राज में ज्यादा परवान चढ़ी जिन्होंने हिन्दू सभ्यता और संस्कृति के नाम पर एक प्रकार से पिछले पन्द्रह वर्षों से वाराणसी पर अपना शासन जमा रखा था। वाराणसी नगर निगम पिछले एक दशक से भाजपा के पास है, वाराणसी लोकसभा की सीट तो दो दशक से भाजपा के पास रही और आज राज्य और केंद्र दोनों में भाजपा की सरकार है लेकिन किसी को फिक्र नहीं कि दम तोड़ चुकी असी का जीर्णोद्धार कर सके।

लोगों के सामने भी लाख टके का एक सवाल अनुत्तरित है कि असी (अस्सी) नदी गई कहां। हैरत की बात भी हैं। मसलन कुआं, सडक, खेत, खलिहान यहां तक कि पगडंडियों व नाला-नालियों तक का हिसाब रखने के लिए पटवारी से लगायत कलेक्टर तक के भारी भरकम अमले की नजर के सामने से अचानक एक मुकम्मल नदी असी गायब हो गई, कैसे…..? सवाल का जवाब नदारद है। असी नदी के अवसान की दर्द भरी दास्तान कोई पौराणिक युग की घटना नहीं है। यह सब कुछ हुआ है चार पांच दशक के अंदर।

आश्चर्य इस बात का है कि आज जब सामान्य सी बरसात भी हो जाए तो यह नदी अपना पूर्व रूप लेने लगती है जिसके कारण नदी भू-भाग पर अवैध कब्जा कर अट्टालिकाओ में रहने वालो को जन -धन का खतरा बराबर बना रहता है फिर भी लोग विपदा और खतरे को भाँप नहीं पा रहे है ।

रिपोर्ट- सर्वेश कुमार यादव 

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