उस नर्क से निकलना मुश्किल था, पर उस नर्क में रहने से ज्यादा मुश्किल नहीं

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domestic voilence

जब मै अपने जिंदगी के पिछले 49 सालों को देखती हूँ, की मैने खुद को संभाला और मेरे वर्तमान को बेहतर बनाया तो मै यकीन से ख सकती हूँ की ना सिर्फ मै बल्कि भारत की हर महिला जिंदगी की इन परेशानियों से निकलकर दृढ़ता के साथ जी सकती है, मात्र 17 साल की उम्र में मेरी शादी हो गयी थी मेरे ऊपर एक शादी-शुदा जीवन की सारी जिम्मेदारियां आ गयीं मुझे याद है 1983 में मुझे स्कूल से निकाल लिया गया मैंने कई बार मेरे पापा को मेरी का उत्पीड़न करते हुए देखा था, और हर बार यह मेरे मैन को जख्मी करता था, मैंने खुद को घरेलु हिंसा के इस माहौल से दूर करने के लिए मैंने शादी का रास्ता चुना, बिना कुछ जाने-बुझे पूरी तरह से असहाय मै घरेलु हिंसा से प्रबल रूप से प्रभावित एक नए घर में पहुँच गयी

यह निराशा से भी बढ़कर कुछ था, मेरी साडी कल्पनाएँ जो मैंने किताबों में परी कहानियों पढकर बनाई थीं साड़ी गलत साबित हो रहीं थीं, मेरी शादी के दुसरे ही दिन मेरी नन्द ने मुझे बुरी तरह से पीटा, मेरे पति ने भी मुझपर हावी होते हुए मुझे पीटकर मेरी जिन्दगी को जीते जी नर्क बना दिया, तलाक के समय की शर्त के अनुसार उसने हमें उपयुक्त वित्तीय सहायता भी नहीं दी खैर आपको जीवन को उसी तरह स्वीकार करना होता है जैसा वो आपके सामने आता है…. चीज़ें इतनी बुरी ही गयीं थी कि मै आत्महत्या के बारे में सोचने लगी लेकिन तबतक मै एक बच्चे को जन्म दे चुकी थी और मेरे बच्चे का भविष्य और परवरिश मेरी सबसे बड़ी चिंता थी और उसे पूरा करने के लिए मैंने नौकरी करने का फैसला किया मेरे काम करने जगह एक दूसरा नर्क थी बहुत कम पढ़ा लिखा होने और बिना किसी अनुभव की वजह से मै मेरे सीनियर्स के सामने हँसी का पात्र बन जाती थी, और उनका यह व्यवहार मेरे जीतने की चाह को और भी दृढ कर देता था |

सन 2000 में मै पैरालिसिस का शिकार हुई लेकिन फिर भी मैंने हार नहीं मानी, मैने 15 दिनों के अंदर खुद को ठीक किया, पर अंत यहाँ नही था, मुझे उन प्रताडनाओं की वजह से पिछले 12 साल से मिर्गी के दौड़े आ रहे थे जिसकी वजह से सन 2003 में एक दिन के अंदर मेरी तीन सर्जरी हुईं, मेरे पास पैसों का आभाव था लेकिन डाक्टर और अस्पताल प्रबंधन ने 75 हज़ार के बिल में से सिर्फ 8000 रुपए का चार्ज लिया |

मेरे अमानवीय मालिक ने मुझे 15 दिनों के अंदर वापस काम पर ना आने की स्थिति में निकल देने की धमकी दी हलांकि मेरा बेटा ट्यूशन पढ़कर कमाने लगा था फिर भी मै नौरी खो देने का जोखिम नहीं उठा सकती थी मेरी इच्छाशक्ति ने एक चमत्कार का काम किया और मुझे बुलंदियां चुने के लायक बनाया, इस देश ने भले ही मुझसे बहुत कुछ लिया हो पर इसने मुझे लदकर जीतने की शक्ति भी दी है, आज मेरे पास एक सुशिक्षित बेटा और हमारे जीवन को चलने के अच्छा खासा कैटरिंग का बिजनेस है और मै भारत की एक सबल नारी हूँ |

मै एक बैंक के सत्यापन विभाग में काम करती थी, लेकिन माँ बनने के बाद मैंने ये नौकरी छोड़ दी, मै जानती थी कि मुझे कुछ ऐसा करना है जो मुझे काम के साथ – साथ मेरे बच्चे के साथ रहने की इजाजत दे, इसलिए मैंने स्वीट कॉर्न बेचना शुरू किया, बहुत से लोग कहते हैं कि यह काम मेरे पिछले काम से तुच्छ है, शायद आप विश्वास न करें पर मै यहाँ अपने बैंक की नौकरी से ज्यादा काम लेती हूँ, वैसे ये सब मै अधिक पैसों के लिए नहीं करती और जिंदगी का मतलब यह नहीं है की वही करो जो समाज को अच्छा लगे, कभी – कभी लोग क्या कहेंगे यह सोचना छोड़कर वही करना चाहिए जो आपके और आपकी जिंदगी के लिए सही हो |

 

जब मै अपने जिंदगी के पिछले 49 सालों को देखती हूँ, की मैने खुद को संभाला और मेरे वर्तमान को बेहतर बनाया तो मै यकीन से ख सकती हूँ की ना सिर्फ मै बल्कि भारत की हर महिला जिंदगी की इन परेशानियों से निकलकर दृढ़ता के साथ जी सकती है, मात्र 17 साल की उम्र में मेरी शादी हो गयी थी मेरे ऊपर एक शादी-शुदा जीवन की सारी जिम्मेदारियां आ गयीं मुझे याद है 1983 में मुझे स्कूल से निकाल लिया गया मैंने कई बार मेरे पापा को मेरी का उत्पीड़न करते हुए देखा था, और हर बार यह मेरे मैन को जख्मी करता था, मैंने खुद को घरेलु हिंसा के इस माहौल से दूर करने के लिए मैंने शादी का रास्ता चुना, बिना कुछ जाने-बुझे पूरी तरह से असहाय मै घरेलु हिंसा से प्रबल रूप से प्रभावित एक नए घर में पहुँच गयी

यह निराशा से भी बढ़कर कुछ था, मेरी साडी कल्पनाएँ जो मैंने किताबों में परी कहानियों पढकर बनाई थीं साड़ी गलत साबित हो रहीं थीं, मेरी शादी के दुसरे ही दिन मेरी नन्द ने मुझे बुरी तरह से पीटा, मेरे पति ने भी मुझपर हावी होते हुए मुझे पीटकर मेरी जिन्दगी को जीते जी नर्क बना दिया, तलाक के समय की शर्त के अनुसार उसने हमें उपयुक्त वित्तीय सहायता भी नहीं दी खैर आपको जीवन को उसी तरह स्वीकार करना होता है जैसा वो आपके सामने आता है…. चीज़ें इतनी बुरी ही गयीं थी कि मै आत्महत्या के बारे में सोचने लगी लेकिन तबतक मै एक बच्चे को जन्म दे चुकी थी और मेरे बच्चे का भविष्य और परवरिश मेरी सबसे बड़ी चिंता थी और उसे पूरा करने के लिए मैंने नौकरी करने का फैसला किया मेरे काम करने जगह एक दूसरा नर्क थी बहुत कम पढ़ा लिखा होने और बिना किसी अनुभव की वजह से मै मेरे सीनियर्स के सामने हँसी का पात्र बन जाती थी, और उनका यह व्यवहार मेरे जीतने की चाह को और भी दृढ कर देता था |

सन 2000 में मै पैरालिसिस का शिकार हुई लेकिन फिर भी मैंने हार नहीं मानी, मैने 15 दिनों के अंदर खुद को ठीक किया, पर अंत यहाँ नही था, मुझे उन प्रताडनाओं की वजह से पिछले 12 साल से मिर्गी के दौड़े आ रहे थे जिसकी वजह से सन 2003 में एक दिन के अंदर मेरी तीन सर्जरी हुईं, मेरे पास पैसों का आभाव था लेकिन डाक्टर और अस्पताल प्रबंधन ने 75 हज़ार के बिल में से सिर्फ 8000 रुपए का चार्ज लिया |

मेरे अमानवीय मालिक ने मुझे 15 दिनों के अंदर वापस काम पर ना आने की स्थिति में निकल देने की धमकी दी हलांकि मेरा बेटा ट्यूशन पढ़कर कमाने लगा था फिर भी मै नौरी खो देने का जोखिम नहीं उठा सकती थी मेरी इच्छाशक्ति ने एक चमत्कार का काम किया और मुझे बुलंदियां चुने के लायक बनाया, इस देश ने भले ही मुझसे बहुत कुछ लिया हो पर इसने मुझे लदकर जीतने की शक्ति भी दी है, आज मेरे पास एक सुशिक्षित बेटा और हमारे जीवन को चलने के अच्छा खासा कैटरिंग का बिजनेस है और मै भारत की एक सबल नारी हूँ |अगर सच कहूँ तो जीवन में कोई भी पल उतना बुरा नहीं रहा जितना उस घर कहे जाने वाले नर्क में था |

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VIA- Humans of India

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