पारिजात वृक्ष – जिसे छूने मात्र से ही मिट जाती है सारी थकान – महाभारत काल से है इसका संबध

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диаметр бревна таблица पारिजात वृक्ष जैसा नाम वैसी ही कीर्ति वैसे तो पारिजात के वृक्ष पूरे हिंदुस्तान में अलग-अलग स्थानों पर पाए ही जाते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किंटूर में स्तिथ इस पारिजात वृक्ष की प्रसिद्धि सम्पूर्ण जगत में फैली हुई है I आपको बता दें की यह पारिजात वृक्ष उत्तरप्रदेश के बाराबंकी के जिला मुख्यालय से 38 किलोमीटर की दूरी पर स्थित किंटूर नामक गाँव में है I

http://constell-group.com/priority/skolko-stoit-vstavit-zub-v-tveri.html сколько стоит вставить зуб в твери आपको बता दें कि इस स्थान का नाम किंटूर पाण्डवों कि माता कुन्ती के नाम पर रखा गया था I ऐसा कहा जाता है कि यहाँ पर पाण्डवों ने अपनी माता कुन्ती के साथ अपना अज्ञातवास का समय बिताया था। और यहीं इसी किंटूर गाँव में भारत का एक मात्र पारिजात का पेड़ पाया जाता है। और कहते है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से सारी थकान मिट जाती है।

http://zuzmonster.ru/owner/prikaz-mz-308-ot-2110-1997.html приказ мз 308 от 21.10 1997 पारिजात वृक्ष का महत्त्व

погибший друг стих जैसा कि आमतौर पर दुनिया भर में देखा जाता है कि पारिजात के वृक्ष ज्यादा से ज्यादा 10 फीट से 25 फीट से ज्यादा ऊँचे नहीं होते हैं लेकिन यहाँ पर किंटूर में जो पारिजात का वृक्ष है उस वृक्ष की उंचाई तक़रीबन 45 फीट और तक़रीबन इसकी मोटाई 50 फीट है I यह पारिजात वृक्ष पूरी दुनिया में अपने आप में एक बिलकुल अलग ही वृक्ष है क्योंकि आपकी जानकारी के लिए हम आपको बता दें कि इस पारिजात वृक्ष की कलम भी कभी तैयार नहीं होती है I पारिजात वृक्ष  पर जून के आस पास बेहद खूबसूरत सफ़ेद रंग के फूल खिलते है। लेकिन पारिजात के फूल केवल रात कि खिलते है और सुबह होते ही यह अपने आप ही मुरझा जाते है। पारिजात के फूलों का लक्ष्मी पूजन में विशेष महत्तव है। परन्तु आपको यह ज्ञात होना चाहिए कि लक्ष्मी की पूजा में पारिजात के जिन पुष्पों को चढ़ाया जाता हैं वह पुष्प कभी भी वह नहीं होते जो पेंड कर लगे हुए होते है बल्कि यह वह पुष्प होते है जो अपने आप ही जमीन पर टूट कर गिर जाते है I

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http://jcidesigngroup.com/library/otzivi-po-rasskazam-gorkogo.html отзывы по рассказам горького अगर हम धार्मिक महत्त्व की बात करें तो पारिजात वृक्ष का वर्णन हिन्दुओं के प्रसिद्द हरिवंश पुराण में भी इसका जिक्र किया गया है I हरिवंश पुराण के अनुसार इस वृक्ष को देवता लोग कल्प वृक्ष के नाम से जानते थे और इसलो उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय बतायी गयी है I ऐसा कहा जाता है कि समुद्र मंथन के बाद जब सभी चीजों का बंटवारा देव और दानवों में हो रहा था तभी इस पेंड को देव लोक में स्थापित कर दिया गया था और इसके छूने मात्र से ही देव नर्तकी उर्वशी की सारी थकान समाप्त हो जाती थी I

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http://sportklick.ru/mail/skolko-m-futbolnoe-pole.html देव लोक का यह अद्भुद वृक्ष कैसे आया म्रत्यु लोक में –

पारिजात का प्रसिद्द वृक्ष जमीन यानी म्रत्यु लोक पर कैसे पहुंचा इस सम्बन्ध में एक बहुत ही रोचक कथा वर्णित है जिसके अनुसार, “एक बार देवऋषि नारद जब धरती पर श्री कृष्ण से मिलने आये तो अपने साथ पारिजात के सुन्दर पुष्प वह देव लोक से कृष्ण को अर्पित करने के लिए ले कर आये थे ।  उन्होंने वे पुष्प श्री कृष्ण को भेंट कर दिए I और भगवान् श्री कृष्ण ने पुष्पों को साथ ही बैठी अपनी पत्नी रुक्मणि को दे दिए। लेकिन जब इस बात की जानकारी भगवान् श्री कृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा को हुई और उन्हें पता चला कि स्वर्ग से आये पारिजात के सारे पुष्प श्री कृष्ण ने रुक्मणि को दे दिए तो उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने श्री कृष्ण के सामने जिद पकड़ ली कि उन्हें अपनी वाटिका के लिय  पारिजात वृक्ष चाहिए।  श्री कृष्ण के लाख समझाने पर भी सत्यभामा नहीं मानी।

अंततः सत्यभामा कि ज़िद के आगे झुकते हुए श्री कृष्ण ने अपने दूत को स्वर्ग से पारिजात वृक्ष लाने के लिए भेजा पर इंद्र ने पारिजात वृक्ष देने से मना कर दिया।  दूत ने जब यह बात आकर श्री कृष्ण को बताई तो उन्होंने स्व्यं ही इंद्र पर आक्रमण कर दिया और इंद्र को पराजित करके पारिजात वृक्ष को जीत लिया।  इससे रुष्ट होकर इंद्र ने पारिजात वृक्ष को फल से वंचित हो जाने का श्राप दे दिया और तभी से पारिजात वृक्ष फल विहीन हो गया। श्री कृष्ण ने पारिजात वृक्ष को ला कर सत्यभामा कि वाटिका में रोपित कर दिया पर सत्यभामा को सबक सिखाने के लिए ऐसा किया कि जब भी पारिजात वृक्ष पर पुष्प आते तो गिरते वो रुक्मणि कि वाटिका में। और यही कारण है कि पारिजात के पुष्प वृक्ष के नीचे न गिरकर वृक्ष से दूर गिरते है। इस तरह पारिजात वृक्ष स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गया।

इसके बाद जब पाण्डवों ने कंटूर में अज्ञातवास किया तो उन्होंने वहाँ माता कुन्ती के लिए भगवन शिव के एक मंदिर कि स्थापना कि जो कि अब कुन्तेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है।  कहते है कि माता कुन्ती पारिजात के पुष्पों से भगवान् शंकर कि पूजा अर्चना कर सके इसलिए पांडवों ने सत्यभामा कि वाटिका से पारिजात वृक्ष को लाकर यहाँ स्थापित कर दिया और तभी से पारिजात वृक्ष यहाँ पर है।

पारिजात वृक्ष के ऐतिहासिक महत्तव व इसकी दुर्लभता को देखते हुए सरकार ने इसे संरक्षित घोषित कर दिया है। भारत सरकार ने इस पर एक डाक टिकट भी जारी किया है।

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जानें क्या हैं पारिजात वृक्ष के औषधीय गुण
पारिजात वृक्ष को आयुर्वेद में हरसिंगार वृक्ष के नाम से भी जाना जाता है I इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है। इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम औषधी माने जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर यदि इन फूलों का या फिर फूलों के रस का सेवन किया जाए तो हृदय रोग से बचा जा सकता है। इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खाँसी ठीक हो जाती है। इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो जाते हैं। पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोंपल को यदि पाँच काली मिर्च के साथ महिलाएँ सेवन करें तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है। वहीं पारिजात के बीज जहाँ बालों के लिए शीरप का काम करते हैं तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर देता है।

 

 

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