आंचल पांधी के बहाने सोशल मीडिया का दायरा बढ़ा

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देहरादून (ब्यूरो)- आंचल पांधी इस दुनिया को अलविदा कह चुकी है। वह कभी लौटकर नहीं आएगी। दून के राजपुर रोड स्थित एक अपार्टमेंट में 13 फरवरी की रात उसने बेहद संदिग्ध हालात में दम तोड़ा था। पति राहुल की मानें तो आंचल ने फांसी लगाकर आत्महत्या की जबकि मृतका के पिता अनिल कोहली इस घटना को जघन्य हत्या करार दे रहे हैं।

सही कौन और गलत कौन, इसका फैसला अदालत करेगी। पर सवाल यह था कि आंचल की आवाज अदालत तक कैसे पहुंचे। पति के प्रभावशाली रसूख के कारण पुलिस मामले में दिलचस्पी नहीं ले रही थी। बेबस पिता की आवाज नक्कार खाने में तूती की आवाज की तरह नाकाफी साबित हो रही थी। साफ लग रहा था कि एक लाचार पिता की इंसाफ मांगने की ख्वाहिश अदालत से पहले दम तोड़ देगी। पीड़ित पक्ष के समर्थन में कुछ लोगों ने कैंडल मार्च निकालना चाहा तो जिला प्रशासन ने इसकी अनुमति भी नहीं दी। पुलिस और प्रशासन की ओर से पैदा किये गये हालात के बीच एक बेबस पिता कमजोर होने लगा था। परंतु एन वक्त पर सोशल मीडिया इस परिवार का संबल बना।

ह्वाट्सएप से लेकर ट्विटर तक पर आंचल के परिजनों को इंसाफ दिलाने की बात की जाने लगी। जस्टिस फार आंचल यानी आंचल को इंसाफ दो नाम से सोशल मीडिया पर एक पेज बनाया गया।  फेसबुक पेज को पांच दिन के अंदर छह हजार लोगों ने लाइक किया। पूरी खामोशी और शांति के साथ चलाए गये इस अभियान ने अपना असर दिखाया और राजपुर थाना पुलिस को हरकत में आना पड़ा। अब पुलिस कहती है कि आंचल के ससुरालियों से पूछताछ की जा चुकी है। अपार्टमेंट के आसपास के कई लोगों से भी पूछताछ हुई है। आंचल की मौत के संबंध में कुछ ठोस क्लू मिले हैं। इससे केस पुख्ता हो सकता है। यानी उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में सोशल मीडिया ने  ऐसा माहौल बनाने में मदद की जिससे आंचल के परिजनों को इंसाफ मिल पायेगा।

दरअसल सोशल मीडिया की यही ताकत है और उसका मकसद भी यही है। अभी तक उत्तराखंड में सोशल मीडिया आपसी गप्पबाजी और सूचनाओं के आदान प्रदान तक सीमित था। कई बार तो इसने अपनी हदें भी पार की। कुछ ऐसी सूचनाओं को भी फ्लैश किया गया जो न केवल अपुष्ट थी बल्कि समाज के हित में भी नहीं थी। बीते रविवार को ही लें। किसी ने राज्यपाल केके पाल को हटाये जाने की न्यूज उड़ा दी। सोशल मीडिया पर यह खबर इस तेजी से वायरल हुई कि सोमवार की अपराह्न तक राज्यपाल आवास में तैनात सूचना विभाग के अधिकारी और कमर्चारी इसका खंडन करते रहे।

हालिया विधानसभा चुनाव में भी सोशल मीडिया ने अपनी हदें लांघी। हरीश रावत को कभी बाहुबली अवतार में तो कभी राउडी अवतार में भाजपा के दिग्गज नेताओं की पीटते हुए दिखाया गया। क्या यह उचित था, हरीश रावत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हैं। क्या एक मुख्यमंत्री को शोभा देता है कि वह रजनीकांत या अक्षय कुमार या सलमान खान के स्टाईल में प्रधानमंत्री मोदी या भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पीटते हुए दिखाई दें। माना कि यह सब काल्पनिक था परंतु इससे भावनाओं का प्रकटीकरण तो हो ही जाता है और दुखद यह है कि हरीश रावत की भावनाओं को दिखाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया गया। ऐसे तमाम उदाहरण हैं जिसमें सोशल मीडिया का दुरुपयोग हुआ है। तीन वर्ष पूर्व मुजफ्फरनगर में भड़का दंगा भी सोशल मीडिया के दुरुपयोग का ही नतीजा था।  परंतु संशय, अविश्वास और दुविधा के बीच उत्तराखंड में सोशल मीडिया ने आंचल के बहाने एक अच्छी पहल की है। इस पहल का असर भी हुआ है। इस अच्छी पहल का चाहें तो हम सभी भागीदार बन सकते हैं।

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