ज्वालामुखी देवी मंदिर – इन्होने ही तोडा था अकबर का घमंड

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ज्वालामुखी देवी मंदिर हिमांचल प्रदेश के कांगड़ा घाटी से तक़रीबन 30 किमी. की दूरी पर हिमांचल प्रदेश के दक्षिणी कोने में स्थित अति प्राचीन पवित्र हिन्दू तीर्थ स्थान है Iज्वालामुखी देवी का यह पवित्र मंदिर भारत के प्रसिद्द 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है I इस पवित्र मंदिर को ज्वालामुखी मंदिर या फिर जोत वाली माता का मंदिर और नगरकोट नामों से भी जाना जाता है I कहा जाता है कि इस पवित्र मंदिर की खोज पांडवों ने की थी I

हिन्दू धर्म के अनुसार ऐसी मान्यता है कि जब भगवान् शंकर देवी सती को लेकर हिमांचल के घर अर्थात उनके पिता के घर जहाँ पर उन्होंने अपने आपको यज्ञ कुंड में भष्म करने के लिए कूद गयी थी और जब भगवान् भोले नाथ को इस बारे में जानकारी प्राप्त हुई तो वह बहुत ही क्रोध में निकले और उन्होंने दक्ष की यज्ञ को नष्ट कर डाला और उस यज्ञ से जलती हुई सती को लेकर अपने कंधे पार लाद कर चल दिए I ऐसी मान्यता है कि भगवान् भोलेनाथ जिन-जिन रास्तों से देवी सती को लेकर गए थे और जहाँ-जहाँ उनके अंग जमीन पर गिर गए थे आज वही वही शक्तिपीठ माने जाते है I कहते है कि ज्वालामुखी जी आज जहाँ पर है वहां पर देवी सती की जीभ गिर गयी थी I

इस मंदिर में देवी एक ज्योति के स्वरुप में विद्यमान है I मंदिर के कुछ दूरी पर ही बाबा गोरख नाथ का मंदिर भी जिसे आजकल गोरखडिब्बी के नाम से भी जाना जाता है I ऐसा बताया जाता है कि इस मंदिर का सबसे पहले निर्माण राजा भूमिचंद ने करवाया था और उसके बाद महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसारचंद ने इसका निर्माण 1835 ई. के आस-पास करवाया था I आपको बता दें कि इस मंदिर के अन्दर माता ज्वालामुखी देवी की नौं ज्योतियाँ विद्यमान है |

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 ज्वालामुखी माता से सम्बंधित ऐतिहासिक कथायें

जैसा की आप सभी जानते है कि सर्वप्रथम इस मंदिर की खोज पांडवों के द्वारा बताई जाती है तो एक बात सिद्ध हो जाती है कि यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है I आपको बता दें कि इस प्राचीन मंदिर से जुडी हुई अनेकों अनेक कथायें भी प्रचलित है I जैसे –

 

गाय के दूध की कथा –

 

एक बार हिमांचल में जहाँ पर यह मंदिर है वहीँ के आस-पास रहने वाले एक गाँव के किसान की गाय ने अचानक से ही दूध देना बंद कर दिया I वह किसान जिसके बच्चों का एक मात्र सहारा ही वह गाय थी उसने सोचा कि पता लगाते है कि आखिर इस गाय ने अचानक से दूध देना क्यों बंद कर दिया I एक दिन गाय का पीछा करते हुए जब वह उसी पहाड़ी पर गया जहाँ पर आज देवी विराजमान है उसने देखा कि एक छोटी सी बालिका उस गाय का दूध पी ले रही है I वह आश्चर्य चकित हो गया और उसने इस बात की जानकारी राजा को दी I प्रथम तो राजा को किसान की इस बात पर भरोसा न हुआ और उसने फिर भी अपने सैनिक को गाय का पीछा करने और रहस्य को उजागर करने की बात कही I उस सिपाही ने छिपकर भी वही घटना देखी और उस सिपाही ने किसान की बात की पुष्टि कर दी I तब राजा ने तय किया कि यहाँ पर माता का एक विशाल मंदिर बनवाया जाएगा I

कथा देवी ज्वालामुखी की और अकबर के अभिमान की –

 

हजारों साल पुराने इस दिव्य मंदिर के बारे में जानकार प्राचीन काल से ही भारत के कोने-कोने से लोग यहाँ पर देवी के दर्शन करने के लिए आते-जाते रहते थे I इसी क्रम में एक भक्त माता के जिनका नाम था “ध्यानु भक्त” एक बार वह अपने काफिले के साथ देवी के दर्शन करने के लिए जा रहे थे उस समय दिल्ली के सिंघासन पर अकबर का राज्य था I

जैसे ही भक्त ध्यानु और उनकी टोली दिल्ली से होकर गुजरने लगी अकबर के सिपाहियों ने उन्हें पकड़ लिया और अकबर के सामने पेश किया गया I अकबर ने भक्त ध्यानू से पूछा की कहाँ जा रहे हो ? भक्त ने जवाब दिया, “माता ज्वालामुखी के दर्शन को जा रहे हैI”

अकबर ने भक्त से कहा कि तुम्हारी माता क्या कर सकती हैं ? भक्त ने जवाब दिया कि, “यह जो कुछ भी है सब माता का ही तो है वह जो चाहे वह सब कुछ कर सकती है I अकबर ने तुरंत ही अपने सिपाही को आदेश दिया और कहा कि इसके घोड़े की गर्दन को काट दिया जाय और वैसा ही हुआ I अकबर ने भक्त से कहा कि अगर तुम्हारी माता में शक्ति है तो इस घोड़े की गर्दन को पुनः जोड़ कर दिखायें I इतना सुनकर भक्त ध्यानू ने अकबर से निवेदन किया कि, “कैसे भी कर के 7 दिनों तक इस घोड़े के शरीर और गर्दन को सुरक्षित स्थान पर रखवा दिया जाय I”

अकबर ने बात मान ली और भक्त ध्यानू वहां से अपनी टोली के साथ चल दिए I माता ज्वालामुखी के दरबार में पहुँच कर भक्त ने सबसे पहले शाम और सुबह की आरती ली और उसके बाद माता से निवेदन किया कि माँ भक्त की लाज खतरे में है कृपया उस घोड़े को जिला दें I और वैसा ही हुआ देखते ही देखते घोडा हिनहिना कर उठ कर बैठ गया और अकबर का सारा का सारा घमंड एक मिनट से भी कम समय में टूट गया I

अकबर ने तुरंत ही अपनी सेना सजाई और माता के दर्शन करने के लिए निकल पड़ा I लेकिन मंदिर के समीप पहुँचते हुए अकबर के मन में एक बार फिर संदेह हो गया और उसने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि इतना पानी भर दो कि यह ज्योति बुझ जाय लेकिन उसके लाख प्रयास करने से भी ऐसा न हो सका और ज्योति वैसे की वैसे ही जलती रही I अब तो अकबर को पूरा भरोषा हो चुका था I अकबर अपने साथ जो डेढ़ मन का सोने का छत्र लेकर गया था उसे चढाने का निश्चय किया और उसने देवी के ऊपर वह छत्र चढ़ा भी दिया लेकिन देवी कृपा से वह छत्र टूट कर जमीन पर गिर गया और ऐसी किसी धातु में परिवर्तित हो गया जिसके बारे में आज तक किसी को भी कोई जानकारी नहीं है कि वह किस धातु का छत्र है !

ऐसा पावन और परम शक्तिशाली विशाल धाम है माता ज्वालामुखी देवी का I जहाँ पर रोजाना लाखों की तादात में लोग दर्शन करते है और अपने मन चाहे मुरादे पाते है I

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