यूपी की मुलायम सरकार की वोट-बैंक की ओछी राजनीति पर ऊँगली उठाती एक कवि की कविता

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अभी बीते दो दिन पहले ही मथुरा में एक भीषण संग्राम की समाप्ति हुई है | जिसमें कुछ तथाकथित सत्याग्रहियों ने बीते 2 सालों से भगवान् श्रीकृष्ण की जन्म भूमि मथुरा में कुछ फिजूल मांगो को लेकर अपना डेरा जमा रखा था | दो दिन पहले जब पुलिस ने उन्हें वहां से हटाकर सरकारी जवाहर बाग़ को खाली करवाने का प्रयास किया तो तथाकथित सत्याग्रहियों ने पुलिस के ऊपर अचानक से फायरिंग शुरू कर दी | इस फायरिंग में फरह थाना के इंचार्ज संतोष कुमार यादव और एस पी सिटी मुकुल द्विवेदी शहीद हो गए थे |

इस पूरे मामले पर प्रकाश डालते हुए, प्रदेश सरकार की वोट बैंक और जातिवाद की राजनीति पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कवि गौरव चौहान की कविता – पढ़ें

(मथुरा में हुयी आगजनी,हिंसा और मौतों पर मथुरा की पीड़ा को दर्शाती मेरी नई कविता)

मैं मथुरा नगरी हूँ,घायल हूँ सत्ता की चोटों से,
कैसे कहूँ वेदना अपनी इन झुलसाये होठों से,
मैं तो प्रेम रंग में डूबी मदमस्तों की नगरी थी,
होली के रंगों में छायी प्रेम सुधा की बदरी थी,
वंशीवट पर बजी बांसुरी,मैं खुल कर इठलाई थी,
मैं कान्हा के बाल रूप पर मंद मंद मुस्काई थी,
मैं मीरा का प्रेम ग्रन्थ थी,सूर दास की स्याही थी,
वासुदेव की लीलाओं की पावन एक गवाही थी,
मैं यमुना के निर्मल तट पर ग्वालों के संग झूमी थी,
गोवर्धन से वृन्दावन तक कृष्णप्रेम मे घूमी थी,
लेकिन आज बहुत घायल हूँ,ह्रदय कष्ट में रोया है,
कांधों पर अपने मैंने चौबिस लाशों को ढोया है,
लुटी पिटी हूँ,पूछ रही हूँ लखनऊ के सरपंचो से,
मेरा सीना क्यों घायल है कट्टों और तमंचो से,
मोहन की मुरली को आखिर किसने चकनाचूर किया,
किसने दो सालों तक गुंडों को सहना मंजूर किया,
लगता है अपने ही कुत्ते पाल रहे थे नेता जी,
रामवृक्ष की जड़ में पानी डाल रहे थे नेता जी,
क्या कारण था,मथुरा की रखवाली नही करा पाये,
दो सालों से बाग़ जवाहर खाली नही करा पाये,
जिस में सारी खीर पकी है,बोलो बर्तन किसका था,
दो सालों तक इसके पीछे मौन समर्थन किसका था,
20 लाख में दो वर्दी वालों का मरण भुलाया है,
गौ भक्षी अख़लाक मरा तो,पूरा कोष लुटाया है,
ना तो ख़ान,हुसैन,अली,ना वोट बैंक के बिंदू थे,
जो कुर्बान हुए वर्दी वाले दोनों ही हिन्दू थे,
मुस्लिम होते तो सत्ता की अंतड़ियां तक फट जातीं,
चार फ़्लैट,रुपये करोड़,नौकरियां तक भी बंट जातीं,
अब गौरव चौहान कहे,वर्दी की यही कहानी है,
खुद नेता का हुक्म बजाएं,खुद देनी कुर्बानी है,
कब तक खेल चलेगा भईया,अब जवाब देना होगा,
आने वाले हैं चुनाव सबका हिसाब देना होगा,
—–कवि गौरव चौहान(मूलरूप में शेयर करें,फिर आपकी इच्छा)

रचनाकार-कवि गौरव चौहान इटावा उ प्र 9457678378,9557062060
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