किडनी पर भारी पड़ रही है सार्वजनिक शौचालयों की कमी |

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प्रतीकात्मक फोटो
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प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की जयंती के दिन शुरू किया गया ‘स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत’ अभियान की पूरी तरह हवा निकल गई। जिले के आला अफसर और जनप्रतिनिधियों ने जोर-शोर से जगह-जगह सफाई की, लेकिन धरातल पर वह कहीं भी दिख नहीं रही है। यह वाकई दुखद और निराशाजनक ही कहा जाएगा एक तरफ जहाँ भारत सरकार हर तरफ स्वच्छ भारत का ढिंढोरा पीट रही है वही उत्तर प्रदेश के जनपद प्रतापगढ़ के गङवारा जो कि पूर्व मे एक विधानसभा के तौर पर जाना जाता था।

इस 10,000 की घनी आबादी वाले क्षेत्र में जिसमे प्रतिदिन हजारों की संख्या में बाहरी लोगों का आना जाना लगा रहता है। वहा पर सार्वजनिक स्तर पर ना तो मूत्रालय है ना ही एक भी शौचालय ही है और सफाईकर्मियों की तो बात ही क्या करना है। प्रशासन का यह दायित्व है कि आमजन को कम से कम जरूरी सुविधाएं तो उपलब्ध करवाए।

एक दो जगह हैं पर दुर्गंध और बरसात की वजह से बढ़ रही गंदगी की हालत यह है कि आस-पास से लोगों का चलना और निकलना नामुमकिन हो जाता है | आबादी में इजाफा हुआ है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। लोगों को साफ सफाई, पानी, प्रकाश सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की दरकार है।

सुलभ शौचालयों की समस्या बहुत पुरानी –
साथ ही साथ सुलभ शौचालय की तो सबसे अधिक जरूरत है | पर इस ओर ध्यान देना किसी ने मुनासिब नहीं समझा है। ज्ञात हो कि कोई भी शौच या मूत्र को अधिक देर तक नहीं रोक सकता है। इन दोनों ही के निष्पादन के लिए उसे एक विशेष स्थान की आवश्यक्ता होती है। घरों में शौचालय या बाथरूम का उपयोग चौबीस घंटे में महज दस से पंद्रह मिनट के लिए ही होता है पर घरों के निर्माण के समय इनकी कभी भी अनदेखी नहीं की जाती है।

ठीक इसी तरह एक स्वच्छ गाँव के विकास के लिए मल त्यागने या मूत्र विसर्जन के लिए स्थान सुनिश्चित किया जाना अत्यंत आवश्यक है। सड़कों के किनारे लोग पाखाना करते अक्सर सुबह दिख जाते हैं। सड़कों पर पड़ी मल की गंदगी दिन भर आने जाने वालों को परेशान किया करती है।

गड्वारा बाजार में है सार्वजनिक शौचालयों की अत्यधिक आवश्यकता –
गङवारा में मूत्रालय की आवश्यकता सबसे अधिक है। बाजार में महिलाओं के लिए पृथक से मूत्रालय की व्यवस्था ना होने से महिलाओं विशेषकर ग्रामीण अंचलों से आने वाली महिलाओं को परेशानी का सामना करना पड़ता है। पुरूष वर्ग तो निस्तार के लिए कहीं भी खड़े हो जाते हैं पर महिलाओं की पीड़ा को आखिर कौन समझेगा? महिला संगठन, ग्राम सभा की महिला प्रधान भी इस ओर ध्यान देना मुनासिब नहीं समझती हैं। स्वच्छता की कमी की समस्या इतनी विकराल है कि सन् 2019 तक का प्रधानमंत्री का लक्ष्य पूरा हो पाएगा इसका आश्चर्य होता है ?

प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान को देश और विदेशों में सराहा गया है पर इससे कुछ विवाद भी जुड़े हैं। इससे मिलते जुलते अभियान पहले भी शुरु किए गए पर वह सफल नहीं हुए, जैसे उदाहरण के तौर पर निर्मल भारत अभियान। विवाद इसलिए भी उठा क्योंकि स्वच्छ भारत अभियान यूपीए के निर्मल भारत अभियान जैसा ही है। उस समय भी बहुत धन उसमें लगाया गया था। उससे क्या हासिल हुआ? वह सारा पैसा कहां गया?

सच तो यह है कि ऐसे अभियान पर विवाद पैदा नहीं होने चाहिये। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान को राजनीति से परे और देशभक्ति से प्रेरित बताया था।

सिर्फ अभियान शुरू करने से नहीं होगा समस्या का समाधान –
सिर्फ अभियान शुरु करना ही काफी नहीं है, परिणाम मायने रखता है। सिर्फ सरकार इसे सफल नहीं बना सकती, लोगों की भागीदारी सबसे जरुरी है। इस कार्यक्रम के लिए विस्तृत ब्लू प्रिंट बनाना जरुरी है। समग्र तरीके से स्वच्छ भारत अभियान को लागू करने, सरकार और लोगों के प्रयासों से आने वाले सालों में भारत अवश्य एक स्वच्छ देश बन सकता है।
किडनी की समस्या के लिए भी है जिम्मेदार-
भारत में लगातार बढ़ रहे किडनी की बीमारी के मामलों की एक मुख्य वजह पर्याप्त संख्या में पब्लिक टॉयलेट का न होना।पब्लिक टॉयलेट न होने की वजह से लोग घर से बाहर निकलने से पहले और बाहर होने के दौरान पानी नहीं पीते और शरीर में पानी की कमी किडनी की बीमारी को न्यौता देती है। इतना ही नहीं घर से बाहर निकलने पर पब्लिक टॉयलेट की सुविधा न होने पर अक्सर लोग घंटों यूरिन को रोके रहते हैं, जो बेहद खतरनाक है।उधर गङवारा वासियों को अपने
युवा एवं उर्जावान जिला कलेक्टर साहब “डा०आदर्श सिंह” जी  से अपेक्षा है कि बाजार  में मूत्रालय और शौचालयों की कमी को गंभीरता से लेते हुए इनकी व्यवस्था सुनिश्चित करवाने के लिए प्रशासन को निर्देशित करेगे। साथ ही साथ इनके निर्माण में इस बात का भी विशेष ध्यान रखा जाए कि इनके निर्माण के चलते कहीं आवागमन, जनभावनाएं, धार्मिक भावनाएं आहत ना हों।

रिपोर्ट- राजाराम वैश्य (प्रतापगढ़) गङवारा

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