स्वर्गीय पंडित रामानुज त्रिपाठी की पुण्य तिथि पर साहित्यकार सम्मान समारोह

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सुल्तानपुर(ब्युरो)- पंडित रामानुज त्रिपाठी सृजन संस्थान, गरएं द्वारा स्वर्गीय पंडित रामानुज त्रिपाठी की पुण्य तिथि पर साहित्यकार सम्मान समारोह, पुस्तक लोकार्पण एवं विचार गोष्ठी का आयोजन जिला पंचायत सभागार, सुलतानपुर में किया गया| इस अवसर पर देश प्रदेश के कई साहित्यकार भाग लिए | सम्पूर्ण कार्यक्रम दो सत्रों में विभाजित था जिसमें पहला सत्र बाल साहित्य पर और दूसरा सत्र नवगीतों पर आधारित था|

पहले सत्र में रामानुज त्रिपाठी के बालगीत संग्रह “जंगल का स्कूल” और मासिक पत्रिका “बालवाटिका” के जुलाई अंक का लोकार्पण और दूसरे सत्र में धीरज श्रीवास्तव एवं मंजू श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित गीत-पुस्तक “नेह के महावर” और रामानुज त्रिपाठी के नवगीत संग्रह “धुंए की टहनियां” का लोकार्पण हुआ| दोनों सत्रों के विचार पक्ष को विभिन्न साहित्यकारों ने सम्बोधित किया| दोनों सत्रों का कुशल संचालन युवा साहित्यकार ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह ‘रवि’ ने किया ।

बाल साहित्य की वर्तमान प्रासंगकिता पर बोलते हुये दिनेश प्रताप सिंह चित्रेश का कहना था “आज हम बच्चों को शिक्षा देने और उसे प्रौढ़ बनाने के नाम पर अधिक से अधिक बोझ के नीचे दबा रहे हैं| यहाँ बच्चे बौद्धिक न होकर कुंठित होने लगते हैं| हमें बच्चों को इस कुंठा से बचाने के लिए बाल साहित्य से जोड़ना होगा| इसे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि बाल साहित्य न के बराबर लिखे जा रहे हैं| घुमन्तू जातियों, दलितों और बंजारों पर तो लिखे ही नहीं जा रहें हैं| इसके लिए प्रत्येक प्रदेश सरकार को अपने अपने तरीके से प्रयत्न करना चाहिए|

लखनऊ के बंधु कुशावर्ती का कहना था ” रामानुज त्रिपाठी रामनरेश त्रिपाठी के बाद बाल साहित्य के इस जिले के बड़े महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं|” डॉ० शोभनाथ शुक्ल ने त्रिपाठी जी के बाल साहित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा “बाल साहित्य पढ़ते हुए मुझे हमेशा लगता है कि दो प्रकार के उद्देश्य होने चाहिए जिसमें पहला-बच्चों का मनोरंज करना और दूसरा ज्ञान देते हुए बच्चों को सचेत करना|

रामानुज त्रिपाठी के बाल साहित्य की बड़ी विशेषता रही है कि वे मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान देते हुए सचेत भी करती हैं|” मुख्य अतिथि के रूप में बालवाटिका पत्रिका के संपादक डॉ० भैरूं लाल गर्ग ने संस्मरण सांझा करते हुए कहा “रामानुज त्रिपाठी के बाल साहित्य से परिचय बालवाटिका पत्रिका से ही संभव हो सका|

उनकी चिट्ठियां बड़े आदरपूर्ण और सम्मान से सुन्दर हस्तलिखित प्रारूप में आती थीं| मैं सहसा देखकर यह विश्वास कर बैठता था की यह किसी मेहनती रचनाकार का खत है और उसे बड़े मनोयोग से प्रकाशित करता था|” विशिष्ट अतिथि के रूप में राजस्थान के फतह सिंह लोढ़ा ने संस्थान के अध्यक्ष अवनीश त्रिपाठी की प्रसंशा करते हुए कहा “भारतवर्ष में अनेक लेखक थे, हैं और रहेंगे लेकिन पिता के साहित्य को आगे लाने वालों को उँगलियों पर गिना जा सकता है|

रामानुज त्रिपाठी के साहित्य को जन-जन पहुंचाने में अवनीश त्रिपाठी का बड़ा योगदान रहा है इसीलिए वे बधाई के पात्र हैं|” प्रथम का सत्र का अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार आद्या प्रसाद सिंह ‘प्रदीप’ का कहना था कि “बाल साहित्य आज से नहीं आदि काल से रचा जा रहा है जिसे समृद्ध करने में रामानुज त्रिपाठी जी की बड़ी भूमिका रही है|”

द्वितीय सत्र में सुरेश चंद्र शर्मा ने रामानुज त्रिपाठी के नवगीतों में मानवीय संवेदना के पक्ष को रखते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला| डा.सुशील कुमार पांडेय का कहना था “पंडित रामानुज त्रिपाठी जी प्राचीन परम्पराओं के पथ पर अग्रसर हैं| उनके नवगीत कल के प्रतीक पर आज की सच्चाई है| इस सत्र के मुख्य अतिथि लखनऊ के सम्पादक आचार्य ओम नीरव ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए कहा कि “नवगीत और बाल कविता में उनका स्वरुप अलग दिखता है| बच्चे के अंदर प्रवेश करना परमहंस हो जाना है|

पंडित जी इसके अनुकरणीय उदहारण हैं| यह कार्यक्रम एक पुत्र द्वारा पिता जी को श्रद्धांजलि ही नहीं समाज पर भी एक उपकार है|” द्वितीय सत्र में विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर मंजू श्रीवास्तव रहीं और अध्यक्षता गुजरात के डॉ० सूर्यदीन यादव ने की| मंच का सञ्चालन युवा समीक्षक ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि और सरस्वती वंदना करुणेश भट्ट ने किया|

कार्यक्रम में आशुकवि मथुरा प्रसाद सिंह ‘ जटायु ‘ , डॉ० रामप्यारे प्रजापति, डॉ० करुणेश भट्ट, जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव, डॉ० देवनारायण शर्मा, डॉ० ओंकार नाथ द्विवेदी, मथुरा प्रसाद सिंह’जटायु’ डॉ० लक्षमण गांधी, सुधा त्रिपाठी, वीरेंद्र कुमार त्रिपाठी, प्रीती त्रिपाठी, रचना शुक्ला, आदि प्रमुख रुप से उपस्थित रहे|
आभार ज्ञापन आयोजक अवनीश त्रिपाठी ने किया ।

रिपोर्ट-संतोष यादव

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