शैल पुत्री जिनकी होती है आज के दिन पूजा

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आज से नवरात्रि का पावन पर्व प्रारंभ हो चुका है जिधर भी हिन्दुओ के घर की तरफ आप देखिये केवल और केवल पूजा और अर्चना की ही ध्वनि सुनाई पड़ेगी I इन पूरे 9 दिनों में माँ दुर्गा के 9 रूपों की प्रतिदिन पूजा-अर्चना की जाती है I

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माता शैलपुत्री (photo credit -www.totalbhakti.com)

ज्ञात हो कि माँ दुर्गा को सर्वप्रथम शैलपुत्री के रूप में पूजा जाता है, आज के ही दिन शैलपुत्री की पूजा होती हैं, इन्हें ही प्रथम दुर्गा भी कहा जाता है I शैल पुत्री दक्ष की पुत्री थी और हिमालय की गोद में जन्म लेने के कारण से इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था I इन्ही शैल पुत्री को सती भी कहा जाता हैं I देवी शैलपुत्री का वाहन वृषभ है और इनके दायें हाथ में त्रिसूल और बायें हाथ में कमल पुष्प शोभा पा रहा है I

शैलपुत्री का नाम सती कैसे पड़ा इसके पीछे एक मार्मिक कहानी छुपी हुई है –

देवी सती का जन्म भगवान् ब्रम्हा के मानस पुत्र दक्ष के यहाँ हुआ था I जब सती का जन्म हुआ तब दक्ष को प्रजापति बना दिया गया था I दुनिया भर से इतना बड़ा सम्मान मिल जाने के कारण धीरे-धीरे दक्ष को घमंड होने लगा I दक्ष को स्मरण हो आया कि उनके पिता भगवान ब्रह्मा के एक सर को भगवान् भोलेनाथ ने क्रोध में आकर अपने त्रिसूल से काट दिया था I बस इसी बात का बदला लेने के लिए दक्ष ने भगवान् भोलेनाथ से बैर ले लिया I

वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्

वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्

 सती के विवाह के उपरांत भी दक्ष का भोलेनाथ के प्रति वैर कभी कम नहीं हुआ अपितु बढ़ता ही गया I एक बार दक्ष ने अपने गृह पर एक भव्य यज्ञ का अनुष्ठान किया और उसमें उन्होंने सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया केवल भगवान् शंकर को छोड़कर I देवी सती को जैसे ही इस बात की जानकारी हुई कि उनके पिता के घर पर बहुत बड़े यज्ञ का अनुष्ठान किया गया हैं तो वह भी अपने पिता के घर जा पहुंची I

हालाँकि भगवान भोलेनाथ श्री शिवशंकर ने उन्हें समझाया था कि उनके पिता दक्ष के साथ उनकी बनती नहीं हैं इसीलिए उन्हें वहाँ पर नहीं जाना चाहिए लेकिन सती ने जब हठ किया तो भोलेनाथ ने उन्हें यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए पिता के घर जाने की आज्ञा दे दी I देवी सती जब अपने पिता के घर पहुंची तो उन्होंने पाया कि उनकी सभी बहनें और भी अन्य लोग एक केवल उनकी माता को छोड़कर सभी उनसे मुंह फुला कर ही मिल रही हैं I

सती ने इस जख्म को तो हजम कर लिया लेकिन जब उन्होंने यज्ञ शाला का निरिक्षण किया तो उन्होंने देखा कि वहाँ पर सभी देवी देवताओं का स्थान हैं नहीं हैं तो केवल और केवल शिव का I उन्होंने अपने पिता को समझाने की कोशिश की लेकिन जब वह नहीं माने तो सती अपने पति का अपमान न सह सकीं और उन्होंने वही उसी हवनकुंड में अपने आपको भष्म कर दिया I जब इस घटना की जानकारी भगवान् भोलेनाथ को हुई तो उन्होंने यज्ञ को नष्ट कर दिया और फिर वह सती के उसी अधजले शरीर को लेकर पूरी प्रथ्वी पर घूमने लगे I जिससे व्याकुल होकर सभी देवताओं की प्रार्थना पर भगवान श्री विष्णु ने देवी सती के कई टुकड़े कर दिए और वह टुकड़े और आभूषण जहाँ-जहाँ भी गिरे आज हर उस स्थान को शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है I

 

 

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