मानदेय न मिलने से आंसूओं के रूप में छलका रसोइये का दर्द

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कालाकांकर/प्रतापगढ़ (ब्यूरो)- देश में आज़ादी के बाद से लेकर अब तक अगर सरकारी आँखों ने सबसे अधिक गौर से किसी चीज को देखने का प्रयास किया है तो वह शिक्षा विभाग | सरकार ने जनता के खून-पसीने की कमाई से इक्कठा किया हुआ बहुत सारा सरकारी स्कूलों को सुधारने तथा देश में शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने में खर्च कर दिया है, विभिन्न सरकारों ने समय-समय पर देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार और देश में शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने के लिए अनेकों कार्यक्रम चलाये है | वर्तमान समय में विद्यालय में सरकार द्वारा किताबे, ड्रेस और भोजन की भी व्यवस्था भी की जा रही है|

स्कूलों में रखी गयी खाना बनाने वाली-
ज्ञात हो कि सरकार द्वारा सभी प्राइमरी विद्यालयों में बच्चों को दोपहर का भोजन देने के लिए रसोई की व्यवस्था की गयी और खाना बनाने के लिए एक महिला रसोइये की | हालाँकि इन महिला रसोइयों को सीधे सरकार के द्वारा नहीं अपितु निजी संस्थाओं के द्वारा रखा जाता है लेकिन इन रसोइयों की तरफ सरकरी नज़रे ऐसा लगता है कि न के बराबर है|

मात्र 1000 ही मिलती है सैलरी लेकिन वह भी कब मिले पता नहीं –

आपको बता दें कि वैसे तो इन महिला रसोइयों को संस्था के द्वारा मात्र 1000 रूपये ही मासिक वेतन मिलता है लेकिन यह भी बता देते है कि वह वेतन कब मिलेगा इसका पता न इन्हें होता है और न ही इन्हें रखने वाली संस्थाओं को ही | दरअसल आपको बता दें कि आज जिले के कालाकांकर ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय भक्तन के पुरवा बाराबीघा रामपुर गड़ौली मे जब अखंड भारत की टीम ने जानकारी के लिये पहुंची तो वहॉ रसोईये ने अपना दर्द जाहिर किया|

उस महिला ने बताया कि, हमें मात्र हमारे काम के लिए एक हजार रुपया प्रति माह की दर से मिलता है लेकिन वह कब मिलेगा इसका हमें खुद आज तक कोई अंदाजा नहीं लग सका है | उन्होंने बताया कि इस वर्ष में हमें मात्र 1 महीना का और पिछले साल का मात्र 5 महीने का ही वेतन मिला है बाकी कब मिलेगा इसका ईश्वर ही मालिक है कि मिलेगा भी या नहीं | उन्होंने बताया कि पैसे के लिये हम जब कहते है तो जबाब मिलता है कि जब पैसा सरकार देगी तभी तो मिलेगा |

अब यहॉ पर लापरवाही सरकार की है या विभाग की लेकिन पिसना तो गरीब को ही है। सोचने वाली बाली बात यह भी है कि सरकार स्कूल मे खाना बनाने वाली गरीब महिलाओ के साथ ऐसा व्यवहार कब तक करती रहेगी ?

रिपोर्ट- विश्व दीपक त्रिपाठी/ पंकज मौर्या
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