मानवता शर्मसार, 3 दिन से पीएमसीएच में लावारिस पड़ी है लाश

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धनबाद (ब्यूरो)- धनबाद की लाईफ लाईन कहे जाने वाली सरकारी अस्पताल पीएमसीएच जहां प्रतिदिन हजारों लोग अपने परिजनो का इलाज करा जीवन दान की उम्मीद लिए आते है। पर जीवन दाता हीं कभी कभार कुछ ऐसा कर देते है की मानवता शर्मसार हो जाती है ।करीब एक माह से धनबाद के झाडूडीह के रहने वाले 65 वर्षीय ओमप्रकाश शुगर एवं टीवी के बीमारी से ग्रसित थे। जिनका इलाज पीएमसीएच में चल रहा था। इलाज के दौरान तीन दिनो पहले उनकी मौत हो गई ।

मौत के बाद अस्पताल के कर्मचारियों ने शव को लावारिस अवस्था में आईसीयू एचडीयू के समीप छोड़ दिया। पहले तो दो दिनो तक जमीन के बैड पर लावारिस अवस्था में शव पड़ा रहा। उसके बाद अस्पताल के मरीजों द्वारा विरोध करने पर शाव को स्टेचर पर रख दिया गया। जैसे हीं पीएमसीएच में मीडिया कर्मी पहुंचे और अस्पताल के कर्मचारियों से शव के विषय में बात करनी चाही तो कर्मचारी कुछ भी बोलने से बचते रहे। पीएमसीएच अधीक्षक डॉ के विश्वास से बात करने उनके चेंबर पहुंचे तो वे वहां मौजूद नहीं थे। उनके चेंबर के बाहर बैठे कर्मचारी से बात करने पर उसने बताया की डॉक्टर साहब लंच के लिए गए हुए हैं।

दोपहर 1 बजे लंच करने गए और शाम 5 बजे तक अधीक्षक अपने चेंबर नहीं पहुंचे। अधीक्षक के अपने समय अंतराल में चेंबर में ना मौजूद होना इस बात को दर्शाता है कि पीएमसीएच में अफसरशाही अभी भी हावी है। जबकि विभाग द्वारा कर्मचारियों एवं अधिकारियों के अस्पताल आने जाने की और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बायोमेट्रिक मशीन लगाई गई है। अधिकारी के चेंबर में ना होने से बायोमेट्रिक मशीन पीएमसीएच में कितनी काम करती है इसका पता बखूबी चलता है।वही दूरभाष के जरिए अस्पताल अधीक्षक से संपर्क करने पर उनका फोन बंद आ रहा था। जिस कारण उनसे संपर्क नहीं हो पाया।

मीडिया कर्मियों द्वारा शव के बारे में पूछताछ होता देख अस्पताल के कर्मचारियों ने लावारिस पड़े शव को शवगृह मे सिफ्ट करवा दिया। वही अस्पताल में अपने परिजन का इलाज करा रहे सत्येंद्र गुप्ता ने बताया कि वो तीन दिनो से अपने परिजन से मिलने अस्पताल आ रहे है ।और रोजान लावारिस पड़े मृतक के शव को एक ही जगह पडा देख रहे है। अस्पताल की परिस्थिति और स्थिति ऐसी है कि नर्स से बात करने पर ये लोग मरीज के परिजनों से ठीक से बात नहीं करते और डांट कर भगा देते हैं। दवा की बात करें तो जो भी डॉक्टर मरीजों को देखते हैं वे दवाइयां हमेशा बाहर से ही लिख देते हैं। डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाइयां अस्पताल के दवाखाने में मौजूद नहीं होती है।

दवा खाने वाले बोलते हैं सर ने दवाई बाहर से लिखी है बाहर से जाकर केमिस्ट की दुकान से खरीद लें। करोड़ों रुपए की लागत से अस्पताल में आने वाली दवाइयां यहां इलाज करा रहे लोगों को नहीं मिलता तो आखिर वो जाता कहां है ?अब सोचने वाली बात यह है की क्या वाकही में लोग लापरवाह है या जान बुझ कर मानवता को शर्मसार करने पर तुले रहते है। अब तो पीएमसीएच के लिए आए दिन ऐसी घटनाएं आम बात हो गई है। पीएमसीएच किसी न किसी कारण से आए दिन अखबारों की सुर्खियों में अपनी शुमारी दर्ज कराता रहता है। स्वास्थ्य मंत्री एवं विभाग द्वारा कई बार पीएमसीएच का निरीक्षण किया गया और अस्पताल प्रबंधन को कई निर्देश दिए गए, लेकिन पीएमसीएच की स्थित जस की तस बनी हुई है।

रिपोर्ट- गणेश रावत

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