चार महीने पहले बनाया डीएम, अब बना दिया सीडीओ

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देहरादून(ब्यूरो)- प्रदेश में अराजकता का आलम क्या है इसकी एक बानगी बीते रोज तब देखने को मिली जब सरकार द्वारा किए गए प्रशासनिक फेरबदल की सूची सामने आई। इस फेरबदल के तहत पांच आईएएस तथा दस पीसीएस अफसरों के दायित्व बदले गए। इस सूची में सबसे हैरतभरा फेरबदल आईएएस अधिकारी नितिन भदौरिया और आईएएस अधिकारी विनीत कुमार के दायित्वों को लेकर रहा।

साल 2011 बैच के आईएएस नितिन भदौरिया जो कि मिशन निदेशक, एनएचएम परियोजना निदेशक, उत्तराखंड हैल्थ सिस्टम डेवलपमेंट प्रोजक्ट तथा संयुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी का दायित्व देख रहे थे, को हरिद्वार का मुख्य विकास अधिकारी बना दिया गया। साल 2013 बैच के आईएएस अधिकारी विनीत कुमार को संयुक्त मजिस्ट्रेट देहरादून के पद से मुक्त करते हुए मुख्य विकास अधिकारी की जिम्मेदारी दे दी गई। सामान्य तौर पर मुख्य विकास अधिकारी के पद पर पीसीएस अफसरों को तैनात किए जाने की परंपरा रही है। ऐसे में इन दो आईएएस अफसरों को यह जिम्मेदारी दिए जाने से कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। नितिन भदौरिया को हरिद्वार जिले का सीडीओ बनाए जाने का सरकार का फैसला ज्यादा हैरान करने वाला है।

इसकी वजह ये है कि पिछले साल सितंबर में नितिन भदौरिया को राज्य सरकार ने पिथौरागढ का जिलाधिकारी बनाने का फैसला किया था। तब व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए भदौरिया ने ज्वाइनिंग नहीं ली थी, जिसके बाद उन्हें देहरादून में ही दूसरी जिम्मेदारी दी गई थी। तब से अब तक वे कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि एक आईएएस अधिकारी जिसे सरकार डीएम जैसे महत्वपूर्ण पद पर तैनात करने का फैसला ले चुकी हो को, उससे कई निचले रैंक की पोस्ट देना कितना सही है? हालांकि यह भी दीगर बात है कि अधिकारियों की पोस्टिंग से जुड़े फैसले पूरी तरह सरकारी की मर्जी पर निर्भर करते हैं।

सरकार को पूरा अधिकार है कि वह किस अधिकारी को क्या जिम्मेदारी दे। मगर साथ ही सरकार से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह अधिकारियों की वरिष्ठता का सम्मान करते हुए उन्हें तैनाती दे। मसलन किसी जिले में डीएम और एसएसपी की तैनाती में यह ख्याल रखा जाता है कि एसएसपी रैंक का अधिकारी डीएम से बाद के बैच का हो। इसी तरह सचिवों, विभागाध्यक्षों तथा निदेशकों की तैनाती में भी इस बात का ध्यान रखा जाता है। मगर ‘सुटेबिलिटी’ के फेर में सरकारें कई बार इसकी परवाह नहीं करती और अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर अधिकारियों की तैनाती करती है। प्रदेश की अब तक की सभी सरकारें इस ‘सुटेबिलिटी’ के आधार पर काम करती आई हैं। नई सरकार भी इसी राह पर जाती दिख रही है।

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