आखिर क्यों और कैसे लगता हैं नासिक में महाकुम्भ और कैसे आई यहाँ गोदावरी नदी, कैसे प्रकट हुए भगवान् शिव त्र्यम्बकेश्वर रूप में

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Trimbakeshwar_nj
त्र्यम्बकेश्वर मंदिर

интимные фото девушек крупный план त्रयम्बक ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नासिक शहर से तीस किलोमीटर पश्चिम में स्थित त्र्यम्बकेश्वर के नाम से संसार का प्रसिद्द भगवान् शिव का मंदिर हैं जो कि भगवान् के शंकर के द्वादस ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं इसी मंदिर से कुछ दूरी में ब्रह्मगिरि पर्वत से गोदावरी नदी प्रकट होती हैं I

делаешь много добра http://yumeyoizakura.xyz/mail/test-mishlenie-i-rech.html тест мышление и речь गोदावरी का महत्त्व –

вырастить редис в домашних условиях जिस प्रकार से उत्तर भारत में माँ गंगा की पूजा की जाती हैं ठीक उसी प्रकार से पश्चिमी और दक्षिणी भारत भारत में गोदावरी का भी महत्त्व हैं, उत्तर भारत में माँ गंगा को जिस प्रकार से भागीरथी के नाम से पुकारा जाता हैं ठीक उसी तर्ज पर पश्चिम और दक्षिण भारत में गोदावरी को भी गौतमी गंगा कहा जाता हैं क्यों की जिस प्रकार से माँ गंगा भागीरथी की तपस्या का फल स्वरुप हैं ठीक उसी प्रकार से गोदावरी भी ऋषि गौतम की तपस्या का फल हैं I

http://for18.ru/owner/kak-nazivayutsya-igri-tri-v-ryad.html как называются игры три в ряд क्यों होता हैं गोदावरी के तट पर महाकुम्भ का आयोजन और हर बारहवें वर्ष पर ही क्यों क्या हैं इसका महत्त्व –

методы оценки продукта सम्पूर्ण भारत वर्ष में चार स्थानों पर महाकुम्भ लगता हैं जिनमें से एक स्थान नासिक का गोदावरी तट भी हैं प्रत्येक बारहवें वर्ष में जब सिंह राशि पर बृहस्पति राशि में प्रवेश करता हैं और भगवान् सूर्य भी सिंह राशि में स्थित होते हैं तभी गोदावरी के पावन तट पर महाकुम्भ का आयोजन होता हैं I उन दिनों गोदावरी के पवित्र जल में स्नान करने का अपना ही महत्त्व हैं I

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образец на реструктуризацию गोदावरी के प्रकट होने और भगवान् शंकर के यहाँ पर प्रकट होने का विस्तृत वर्णन श्री शिव महापुराण के कोतिरुद्र संहिता में उद्धृत किया गया हैं I

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http://futterstube-freischnauze.de/owner/stolitsa-s-novosti-proisshestviya.html столица с новости происшествия कालांतर में जग प्रसिद्द ऋषि अपनी धर्मपत्नी अहल्या के साथ यहाँ रहा करते थे। उन्होंने इसी ब्रह्मगिरि पर्वत पर दस हज़ार वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या काल में ही एक समय वहाँ सौ वर्षों तक सूखा पड़ गया और लगातार वर्षा न होने के कारण चारों तरफ की वनस्पतियाँ तथा नदी नाले सभी सूख गए, सब जगह सूखा पड़ने के कारण जीवधारी बेचैन हो गए । जल के आभाव में और वनस्पतियों के नष्ट हो जाने पर मनुष्य, मुनि, पशु, पक्षी तथा अन्य जीवनधारी भी जल के आभाव में उस स्थान को छोड़कर अलग-अलग दिशाओं में चले गए । जब कुछ समय बाद ऋषि गौतम ने अपनी तपस्या का समापन किया तब यह दृश्य देख वह दुखी हुए और उन्होंने ने छ: महीने तक कठोर तपस्या करके वरुण देव को प्रसन्न किया । गौतम ऋषि ने तब वरुण देव से जल बरसाने की प्रार्थना की, तो इस वरुण देव ने कहा कि मैं देवताओं के विधान के विपरीत वृष्टि नहीं कर सकता, किन्तु मैं आपकी तपस्या और निःस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न हुआ हूँ इसलिए आपकी इच्छा की पूर्ति हेतु मैं आपको ‘अक्षय’ जल प्रदान करता हूँ। अतः आप उस जल को रखने के लिए एक गड्ढा तैयार करो। वरुण देव के आदेश के अनुसार ऋषि गौतम ने एक हाथ गहरा गड्ढा खोद दिया, जिसे वरुण ने अपने दिव्य जल से भर दिया। उसके बाद उन्होंने परोपकार परायण ऋषि गौतम से कहा– ‘महामुने! यह अक्षुण्ण जल कभी नष्ट नहीं होगा और तीर्थ बनकर इस पृथ्वी पर तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगा। इसके समीप दान-पुण्य, हवन-यज्ञ, तर्पण, देव पूजन और पितरों का श्राद्ध, सब कुछ अक्षय फलदायी होंगे। उसके बाद उस जल से ऋषि गौतम ने बहुतों का कल्याण किया, जिससे उन्हें सुख की अनुभूति हुई।

http://autofelszereles-szeged.hu/owner/tablitsa-razmerov-odezhdi-britaniya.html таблица размеров одежды британия इस पवित्र जल के आने से पुनः समस्त क्षेत्र में हरियाली आ गयी और एक बार फिर से क्षेत्र में सभी ऋषि मुनि और लोग अपने परिवार सहित वापस आकर खुसी से रहने लगे लेकिन मनुष्य के स्वाभाव के अनुसार जैसा अक्सर होता हैं कुछ लोगों को गौतम ऋषि से ईर्ष्या होने लगी और उन सब ने यह निर्णय लिया की गौतम ऋषि को नुकशान पहुचाया जाय I इसीलिए उन सभी ने मिलकर भगवान श्री गणेश की उपासना की उनकी उपासना से प्रसन्न होकर भगवान् गणेश ने उन सभी को आशीर्वाद देते हुए वर मांगने के लिए कहा लेकिन जब उन लोगों ने ऋषि गौतम को नुकसान पहुंचाने की बात की तो उस भगवान् श्री गणेश ने उन्हें समझाते हुए कहा कि जो कभी आपको आश्रय दाता और या फिर अन्न दाता हो उसे कभी भी नुकशान नहीं पहुंचाना चाहिए लेकिन वह नहीं माने I

नाशिक का दृश्य महाकुम्भ के दौरान
नाशिक का दृश्य महाकुम्भ के दौरान

http://leonberger.ru/owner/kinoteatr-aladdin-raspisanie-seansov.html кинотеатр аладдин расписание сеансов तो अपने भक्तों की मुराद पूरी करने के लिए भगवान् गणेश ने एक बहुत ही कमजोर गाय का रूप धारण कर लिया और सीधे गौतम ऋषि के खेतों में पहुँच गयी, जब ऋषि ने देखा गाय को नुकसान करते हुए तो दयालु ऋषि ने घास की ही डंडी से उस गया को भगाने लगे लेकिन यह क्या हुआ जैसे ही ऋषि ने गाय को छुआ ही था कि तुरंत ही गया जमीं पर गिर गयी और उसका प्राणांत हो गया I

финансирование образования тест यह देखकर ऋषि काफी भयभीत हुए और उन्हें लगा कि यह तो उनसे घोर पाप हो गया हैं, अतः उन्होंने गौ हत्या के पाप से मुक्ति पाने के उपाय के बारे में सोचा, लेकिन तब तक सभी धूर्त पड़ोसियों को यह बात पता चल चुकी थी और उन्होंने ऋषि को सपरिवार वहां से जाने को कह दिया I काफी अनुनय विनय करने के बाद उन सभी लोगों ने ऋषि को गौ हत्या से मुक्ति का बहुत कठिन मार्ग बतलाया I

расписание электричек нижний суроватиха завтра उनकी दीनता पर तरस खाते हुए उन मुनियों ने कहा– ‘गौतम! तुम अपने पाप को प्रकट करते हुए अर्थात किये गये गोहत्या-सम्बन्धी पाप को बोलते हुए तीन बार पृथ्वी की परिक्रमा करके फिर एक महीने तक व्रत करो। व्रत के बाद जब तुम इस ब्रह्मगिरि की एक सौ एक परिक्रमा करोगे, उसके बाद ही तुम्हारी शुद्धि होगी। ब्राह्मणों ने उक्त प्रायश्चित का विकल्प बतलाते हुए कहा कि यदि तुम गंगा जी को इसी स्थान पर लाकर उनके जल में स्नान करो, तदनन्तर एक करोड़ पार्थिव लिंग बनाकर महादेव जी की उपासना (पार्थिव पूजन) करो, उसके बाद पुन: गंगा स्नान करके इस ब्रह्मगिरि पर्वत की ग्यारह परिक्रमा करने के बाद एक सौ कलशों (घड़ों) में जल भर पार्थिव शिवलिंग का अभिषेक करो, फिर तुम्हारी शुद्धि हो जाएगी और तुम गो हत्या के पाप से मुक्त हो जाओगे।’ गौतम ने उन ऋषियों की बातों को स्वीकार करते हुए कहा कि वे ब्रह्मगिरि की अथवा पार्थिव पूजन करेंगे। तत्पश्चात उन्होंने अहल्या को साथ लेकर ब्रह्मगिरि की परिक्रमा की और अतीव निष्ठा के साथ पार्थिव लिंगों का निर्माण कर महादेव जी की आराधना की।

मुनि गौतम द्वारा अटूट श्रद्धा भक्ति से पार्थिव पूजन करने पर पार्वती सहित भगवान शिव प्रसन्न हो गये। उन्होंने अपने प्रमथगणों सहित प्रकट होकर कहा- ‘गौतम! मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। गौतम शिव के अद्भुत रूप को देखकर आनन्द विभोर हो उठे। उन्होंने भक्तिभाव पूर्वक शिव को प्रणाम कर उनकी लम्बी स्तुति की। वे हाथ जोड़कर खड़े हुए और भगवान शिव से बोले कि ‘आप मुझे निष्पाप (पापरहित) बनाने की कृपा करें।’ भगवान शिव ने कहा– ‘तुम धन्य हो। तुम में किसी भी प्रकार का कोई पाप नहीं है। संसार के लोग तुम्हारे दर्शन करने से पापरहित हो जाते हैं। तुम सदा ही मेरी भक्ति में लीन रहते हो, फिर पापी कैसे हो सकते हो? उन दुष्टों ने तुम्हारे साथ छल-कपट किया है, तुम पर घोर अत्याचार किया है। इसलिए वे ही पापी, हत्यारे और दुराचारी हैं। उन सब कृतघ्नों का कभी भी उद्धार नहीं होगा, जो लोग उन दुरात्माओं का दर्शन करेगें वे भी पापी बन जाएँगे।’

http://www.cambodiavanticket.com/priority/zhenskaya-konsultatsiya-podolsk-kirova-38-raspisanie.html женская консультация подольск кирова 38 расписание भगवान शिव की बात सुनकर ऋषि गौतम आश्चर्यचकित हो उठे। उन्होंने शिव को पुन:-पुन: प्रणाम किया और कहा– ‘भगवान्! उन्होंने तो मेरा बड़ा उपकार किया है, वे महर्षि धन्य हैं, क्योंकि उन्होंने मेरे लिए परम कल्याणकारी कार्य किया है। उनके दुराचार से ही मेरा महान कार्य सिद्ध हुआ है। उनके बर्ताव से ही हमें आपका परम दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो सका है।’ गौतम की बात सुनकर भगवान शिव अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे बोले– विप्रवर! तुम सभी ऋषियों में श्रेष्ठ हो, मैं तुम पर अतिशय प्रसन्न हूँ, इसलिए तुम कोई उत्तम वर माँग लो।’ ऋषि गौतम ने महेश को बार-बार प्रणाम करते हुए कहा कि लोक कल्याण करने के लिए आप मुझे गंगा प्रदान कीजिए। इस प्रकार बोलते हुए गौतम ने लोकहित की कामना से भगवान शिव के चरणों को पकड़ लिया। तब भगवान महेश्वर ने पृथ्वी और स्वर्ग के सारभूत उस जल को निकाला, जो ब्रह्मा जी ने उन्हें उनके विवाह के अवसर पर दिया था। वह परम पवित्र जल स्त्री का रूप धारण करके जब वहाँ खड़ा हुआ, तो ऋषि गौतम ने उसकी स्तुति करते हुए नमस्कार किया। गौतम ने गंगा की आराधना करके पाप से मुक्ति प्राप्त की। गौतम तथा मुनियों को गंगा ने पूर्ण पवित्र कर दिया। वह गौतमी कहलायी। गौतमी नदी के किनारे  assassins creed 3 контракты त्र्यंबकम शिवलिंग की स्थापना की गई, क्योंकि इसी शर्त पर वह वहाँ ठहरने के लिए तैयार हुई थीं।

गौतम ने कहा– ‘सम्पूर्ण भुवन को पवित्र करने वाली गंगे! नरक में गिरते हुए मुझ गौतम को पवित्र कर दो।’ भगवान शंकर ने भी कहा– ‘देवि! तुम इस मुनि को पवित्र करो और वैवस्वत मनु के अट्ठाइसवें कलि युग तक यहीं रहो।’ गंगा ने भगवान शिव से कहा कि ‘मैं अकेली यहाँ अपना निवास बनाने में असमर्थ हूँ। यदि भगवान महेश्वर अम्बिका और अपने अन्य गणों के साथ रहें तथा मैं सभी नदियों में श्रेष्ठ स्वीकार की जाऊँ, तभी इस धरातल पर रह सकती हूँ।’ भगवान शिव ने गंगा का अनुरोध स्वीकार करते हुए कहा कि ‘तुम यहाँ स्थित हो जाओ और मैं भी यहाँ रहूँगा।’ उसके बाद विविध देवता, ऋषि, अनेक तीर्थ तथा सम्मानित क्षेत्र भी वहाँ आ पहुँचे। उन सभी ने आदरपूर्वक गौतम, गंगा तथा भूतभावन शिव का पूजन किया और प्रसन्नतापूर्वक उनकी स्तुति करते हुए अपना सिर झुकाया। उनकी आराधना से प्रसन्न गंगा और गिरीश ने कहा – ‘श्रेष्ठ देवताओं! हम तुम लोगों का प्रिय करना चाहते हैं, इसलिए तुम वर माँगो।’

देवताओं ने कहा कि ‘यदि गंगा और भगवान शिव प्रसन्न हैं, तो हमारे और मनुष्यों का प्रिय करने के लिए आप लोग कृपापूर्वक यहीं निवास करें। गंगा ने उत्तर देते हुए कहा कि ‘मैं तो गौतम जी का पाप क्षालित कर वापस चली जाऊँगी, क्योंकि आपके समाज में मेरी विशेषता कैसे समझी जाएगी और उस विशेषता का पता कैसे लगेगा? सबका प्रिय करने हेतु आप सब लोग यहाँ क्यों नहीं रहते हैं? यदि आप लोग यहाँ मेरी विशेषता सिद्ध कर सकें, तो मैं अवश्य ही रहूँगी।’ देवताओं ने बताया कि जब सिंह राशि पर बृहस्पति जी का पदार्पण होगा, उस समय हम सभी आकर यहाँ निवास करेंगे। ग्यारह वर्षों तक लोगों का गो-पातक यहाँ क्षालित होगा, उस पापराशि को धोने के लिए हम लोग सरिताओं में श्रेष्ठ आप गंगा के पास आया करेंगे। महादेवी! समस्त लोगों पर अनुग्रह करते हुए हमारा प्रिय करने हेतु तुम्हें और भगवान शंकर को यहाँ पर नित्य निवास करना चाहिए।’

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