तिल-तिल सिमट रहा मैला ताल का अस्तित्व

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तेजवापु/(बहराइच) ब्यूरो) संरक्षण व देख-रेख के अभाव में बौंडी थानाक्षेत्र के मैला सरैया तालाब का अस्तित्व संकट में है। वर्षों से सैकडों परिवारों की आजीविका का साधन बना मैला सरैया तालाब तिल-तिल सिमटता जा रहा है। कभी यहां खिले कमल के फूल व उसकी पत्तियां तो आमदनी का जरिया बनती ही थी। साथ ही किनारे उगे नरकुल भी लोगों को बेहतर आमदनी देता था। तालाब में उगने वाली जलीय वनस्पतियों से कई गरीबों के परिवार चल रहे थे, लेकिन तालाब के अस्तित्व के साथ लोगों की आजीविका भी सिमट कर रह गई।बौंडी-मरौचा मार्ग पर जिला मुख्यालय से बीस किमी दूर स्थित यह तालाब हरदी, बौंडी व देहात कोतवाली थाना क्षेत्र में हजारों बीघे में फैला हुआ है। यह तालाब प्राकृतिक जलस्त्रोतों में से एक है।

बुजुर्ग बताते हैं कि पहले रंग-बिरंगे प्रवासी पक्षी यहां आया करते थे, किंतु अनुकूल वातावरण व तालाब की बदहाली के कारण यहां से प्रवासी पक्षियों ने भी मुंह मोड़ लिया। जल संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला यह तालाब अब अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। तालाब में बेहया, खर-पतवार व जलकुम्भी जैसी जंगली वनस्पतियों के हो जाने से यह सरोवर न होकर बीहड़ के रूप में नजर आ रहा है। तालाब पर भू माफियाओं की भी नजर लगी हुई है।इस तालाब का उपयोग वर्षों से धार्मिक अनुष्ठानों में होता चला आ रहा है।शादी-विवाह, मुंडन के साथ-साथ तीज-त्यौहारों पर इस तालाब के किनारे लोग स्नान व पूजन-अर्चन करते चले आ रहे है, किंतु अब 989 बीघे के रकबे वाले तालाब का वजूद धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। जानवरों को नहलाने व पानी पिलाने के लिए यह तालाब अब उपयुक्त नहीं रह गया है। पूरा तालाब कीचड़ व दलदल में परिर्वितत हो चूका है ।इस तालाब से प्राप्त होने वाली मछलियां भी आमदनी का जरिया हुआ करती थी। यहां का पानी अब मछलियों के लायक भी नहीं रह गया है। करीब सात वर्ष पूर्व इस तालाब के किनारे सायंकाल जिले के विभिन्न क्षेत्रों से लोग आकर यहां का नजारा लेते थ । अब यह बीते दिनों की बात हो गई है। तालाब के चारों ओर कूड़ा-करकट डालकर पाटा जा रहा है। यदि लगातार इसी तरह अतिक्रमण चलता रहा तो वह दिन दूर नही जब जिले के मानचित्र से एक और तालाब ओझल हो जाएगा ।

रिपोर्ट – राकेश मौर्य

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