मैनपुरी का तेल कलकत्ते की कढ़ाई में लगाता था छोंक, दो आम सरसों का तेल बंगाल में था प्रचलित

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मैनपुरी(ब्यूरो)- कभी नीम की निवोली और मूगफली के तेल की झरपें जब बंगाल की कड़ाईयों में झरप मारती थी तो बरबस ही लोगों को इस धरती में पैदा होने वाली पीली सरसों, नीम की निवोली और मूंगफली की पैदावार याद आने लगती थी। आज न तो इन उपजों की कोई पैदावार है और न ही शुद्ध कडवा तेल बनाने की कोई तिलियानी और कोलहू यहां के दो बड़े तेल मिल गुमनामी के गर्त में समा चुके है। यहां अब जो तेल विकता है वह उत्तम क्वालिटी का न होकर विदेशी जीन्सों पर आधारित स्वास्थ्य के लिये हानिकारक माना जाता है।

सब्जी की कड़ाई में तेल का तड़का जब तक न लगे फिर सब्जी का स्वाद ही क्या आज मिलावट और प्रतिस्पर्धा के जमाने में भले ही अंतर्राष्ट्रीय और बड़े घराने आकर्षक पैंकिग में तेल बेचने का कारोबार कर रहे हों परन्तु इस तेल में वो बात कहां जो वर्षो पहले कचहरी रोड़ स्थिति सेठ महावीर प्रसाद के तेल मिल से उत्पादित दो आम ब्राण्ड सरसों के तेल में हुआ करती थी। मैनपुरी का तेल जब कलकत्ते की कड़ाई में मछली का सालन बनाता था तो अंग्रेज हुकूमत भी अंगुली चाटने को मजबूर हो जाया करती थी। वहीं हरी बजाज और शोभाचन्द तापड़िया के मिल से नीम की खली का तेल भी बंगाल की धरती पर मैनपुरी की पहचान बताता था। समय के थपेडों ने जहां सरसों की पैदावार पर गृहण लगाया वहीं मूंगफली और नींम की निवोली का संग्रह करने वाले लोगों की विमुखता के चलते जहां व्यापार मन्दा होता चला गया। वहीं प्रतिस्पर्धा और समय के गरत ने महावीर मिल, शोभा चन्द तापड़िया मिल एवं हरी बजाज के खली मिल को गुंमनामी के अंधेरे में धकेल दिया।

अब जनपद में तेल मिल की पहचान भले ही समाप्त हो गई हो पर कुछ स्पेलर आज भी सरसों का शुद्ध तेल पेरने का दावा करते है। यदि खाद्य अपमिश्रण विभाग की माने तो खाद्य तेलों में बड़े पैमाने पर आरजीमोन, पामोलिन और केमिकल से तैयार किा गा। अखाद्य तेल मिलाकर जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया जा रहा है।

रिपोर्ट- दीपक शर्मा 

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