महकलंकित मजहब है, उस मजहब को धिक्कार लिखूं |

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muslim militants
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धुन शांति की गाने वालों, आंखें अपनी खोलो अब,
मानवता दम तोड़ रही है, उसपर भी कुछ बोलो अब |
फतवे जारी करने वाले, मौन पड़े या मूर्छित हैं,
कितनों की ही साँसें अटकी, कितने सड़कों पर मृत हैं |
बच्चों की किलकारी भी बन सिसकी जब दम तोड़ रही,
बेबस निर्दोषों की काया, कफ़न जहाँ पर ओढ़ रही |
कैसे फिर शांति वो देगा, उसका मै व्यभिचार लिखूं
महा कलंकित मजहब है, उस मजहब को धिक्कार लिखूं |
चकित देखती दुनिया सारी, वहशी पाँव पसार रहे,
मानवता का गला दबा है, बेबस जन को मार रहे |
शैतानी को बता इबादत, किया कलंकित मजहब को,
निर्दोषों की पीड़ा कैसे, प्यारी हो सकती है रब को |
वो शैतानी मजहब है, जहाँ मानवता का नाम नहीं,
जुल्म सितम कर कहर ढहाना, इंसानों का काम नहीं,
आज उठी जब लौह लेखनी, क्यों ना मै अंगार लिखूं,
महाकलंकित मजहब है, उस मजहब को धिक्कार लिखूं |
लेखक – बृजेश दुबे

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