कारगिल शहीद कैप्टन सौरभ कालिया केस पर मोदी सरकार का यह कैसा रुख …???

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कारगिल युद्ध को लगभग 16 साल बीत गये हैं और इतना ही समय बीत चुका हैं हिमांचल प्रदेश के एक परिवार को अपने बेटे के लिए न्याय की आशा से बदलती हुई सरकारों की तरफ देखते हुए, गौरतलब हैं कि वर्ष 1999 में जब सत्ता में एन.डी.ए. की सरकार थी और देश की सत्ता श्री अटल बिहारी वाजपेई जी के हाथों में थी उसी समय में भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल का युद्ध हुआ था I

शहीद कैप्टन सौरभ कालिया फोटो में और शहीद बेटे के लिए न्याय मांगते माता और पिता
शहीद कैप्टन सौरभ कालिया फोटो में और शहीद बेटे के लिए न्याय मांगते माता और पिता

उसी कारगिल युद्ध के दौरान सबसे पहले पाकिस्तानी घुसपैठियों की खबर को भारत को देने वाले कैप्टन थे सौरभ कालिया, सौरभ कालिया जिस समय कारगिल सेक्टर में अपने साथियों अर्जुन राम, भवंर लाल बघेरिया, बीकाराम, मूलाराम, नरेश सिंह के साथ पेट्रोलिंग कर रहे थे उसी समय पकिस्तान के सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया था और पाकिस्तानी सैनिकों के द्वारा भयंकर यातनाएं दी गयी सूत्रों से प्राप्त खबर के अनुसार उनकी आँखें तथा और महत्त्वपूर्ण अंग शरीर से अलग कर दिए गये थे और बाद में भारत की सीमाओं में उन लाशों को फेंक दिया गया था I

जब कारगिल समाप्ति के कुछ वर्षों बाद शहीद कैप्टन के पिता श्री नरेंद्र कुमार कालिया ने अपने बेटे को न्याय दिलाने के लिए सरकार से अपील की थी तब विपक्ष में बैठी एन.डी.ए. की सरकार ने यू.पी.ए. सरकार को खूब कोसा और घेरा था, लेकिन आज जब सत्ता में खुद ही एन.डी.ए. की सरकार हैं तो संसद में एक प्रश्न के जवाब में सरकार की तरफ जवाब दिया गया कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को उठाना मुमकिन नहीं I

इन्ही सब बातों से परेशान होकर और सरकार की तरफ कोई सही रुख न देखते हुए शहीद कैप्टन के पिता श्री नरेंद्र कुमार कालिया में वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था और उन्होंने मांग की थी कि विदेश मंत्रालय इस मुद्दे को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस के सामने उठाये ताकि जिन पाकिस्तानी सैनिकों और अफसरों ने उनके बेटे के साथ ऐसा ब्यवहार किया हैं उन्हें उचित दंड दिया जा सके, उनका मानना हैं कि पकिस्तान के अफसर और सैनिकों ने जेनेवा समझौते का उलंघन किया हैं, जेनेवा समझौते के अनुसार कभी भी किसी भी युद्ध बंदी सैनिक के साथ अमानवीय बर्ताव नहीं होना चाहिए I

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