आधा सैकड़ा से अधिक फैक्ट्रियों में पड़े ताले

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उरई : विकास की धुरी समझे जाने वाले उद्योग जो कि इस समय बुरी तरह से चौपट हो गए हैं और आधा सैकड़ा से अधिक फैक्ट्रियों में ताले पड़ गए। उनके जर्जर भवन खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं जो इंडस्ट्री एरिया प्रदेश सरकार द्वारा तैयार किया गया था उसमें करोड़ों रुपए लगाए गए थे। अब वहां मेंटीनेंस के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है अगर अभी भी ध्यान न दिया गया तो आने वाले समय में जो दो-चार उद्योग चल भी रहे हैं वह भी खत्म हो जाएंगे।

प्राप्त जानकारी के अनुसार इंडस्ट्री एरिया में लोहा पिघलाने वाले फैक्ट्रियां, सोयाबीन से तेल बनाने वाली इसके अलावा विभिन्न-विभिन्न माल तैयार करने के लिए जो करोड़ों रुपए की यूनिट उद्यमियों ने लगाई थी उन्हें समय से प्रदेश व केेंद्र सरकार द्वारा प्रोत्साहन न मिलने के कारण यह सब फैक्ट्रियां बंद हो गई। कई डिफाल्टर हुए तो किसी ने अपना धंधा बदल दिया। क्षेत्र के विकास के लिए कालपी रोड पर इंडस्ट्री एरिया तैयार किया गया था जिसमें करोड़ों रुपए खर्च हुए थे। आखिरकार ऐसी क्या वजह है जिसके कारण पूरा फैक्ट्री एरिया लगभग बंद हो गया है। जो हास्टल इंडस्ट्री एरिया में उद्यमियों के लिए तैयार किया गया था उसमें स्कूल संचालित हो रहा है। पानी की निकासी के लिए जो सरकारी ट्यूबवेल बने थे वह वीरान से नजर आ रहे हैं। रोडें बनाने में भी खानापूर्ति हुई है अगर कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि बंद उद्योग भी यूपीएसआईडीसी के लिए कमाई के साधन बन गए हैं। इतने उद्योग बंद होने से जहां लाखों लोग बेरोजगार हो गए और मजबूरी में वह पलायन करने के लिए विवश हुए। वहीं लोहा उद्योग के प्रदेश अध्यक्ष गनेश तिवारी से जब इस मामले में वार्ता हुई तो उन्होंने बताया कि बसपा और सपा के शासनकाल में बिजली की दरें अन्य प्रदेशों से इतनी महंगी रही कि उद्योग चलाना लोगों को भारी पड़ गया। यही कारण है कि यहां के उद्योग पनपने के पहले ही समाप्त हो गए। ऐसी परिस्थितियों में न तो औद्योगिक क्षेत्र में नए उद्योग आ रहे हैं वहीं कालपी, कोंच, माधौगढ़, जालौन आदि में जो औद्योगिक क्षेत्र बनाया गया है वह भी अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। इतना ही नहीं जहां पर उद्योग केेंद्र का कार्यालय स्थापित है वहां के आसपास उद्योग लगाने के लिए कुछ जगह आवंटित हुई थी। अब उस आवंटित जगह में उद्योग की जगह रिहायशी मकान बन गए हैं जिसको लेकर कभी कोई भी गंभीरता नहीं दिखाई गई। उद्योग विकास की पहली धुरी समझे जाते हैं परंतु सरकार की नीति के कारण इन उद्योगों पर ऐसा ग्रहण लगा कि वह अब तक नहीं पनप पाए अगर उद्योगों को वास्तविक रूप से संजीवनी देना है तो उनके लिए ऐसी नीति अपनानी होगी जिससे यहां के उद्योग पनप सके । पहले केेंद्र सरकार द्वारा उद्योग लगाने के लिए पच्चीस प्रतिशत की सब्सिडी दी जाती थी परंतु सन् 90 के दशक से यह बंद कर दी गई और सब्सिडी का रूप भी परिवर्तित किया गया। वहीं विद्युत से लेकर व्यापार कर में भी शत-प्रतिशत की उद्योग लगाने वाले को छूट मिलती थी। यह सब परिवर्तित होते ही उद्योग जगत को झटके लगने लगे। आज जो उद्योग चल भी रहे हैं वह भी करोड़ों के कर्ज में हैं। उन्हें चलाने के लिए उद्यमियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है। अरबों रुपए शासन का डूबा वहीं जो उद्यमियों मुजफ्फरनगर गोरखपुर आदि से उद्योग लगाने के लिए आए थे वह भी करोड़ों रुपए की पूंजी खत्म करकर वापस चले गए।

रिपोर्ट – अनुराग श्रीवास्तव

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