मुसलमान होना समस्या नहीं, और अधार्मिक होना समाधान नहीं

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आज एक समाचार चैनल पर ज़ावेद अख्तर साहब के एक संवाद के संदर्भ में कुछ बातें आपके समक्ष रखना चाहता हूँ | पहली बात तो चूंकि उक्त संवाद असहनशीलता के बारे में था, आयें ये जानने के कोशिश करे की आखिर मुद्दा क्या है ?

Renzo piano case असहनशीलता अफ़वाह या हक़ीकत –

मौजूदा परिपेक्ष्य में अगर देखें तो बात बिल्कुल साफ़ है | एक राजनीतिक दल लगभग आधी सदी के शासन के बाद सत्ता के निष्कासित हुआ हैं, तो जाहिर है की उसने अपने इस लम्बे शासनावधि दौरान बहुत सारे निष्ठावान लोगों को जन्म दिया होगा तथा परिपोषित किया होगा | अब जाहिर तौर पर अपनी राजनीतिक जमीन पुनर्प्राप्ति के लिये हरसंभव प्रयास करने के दौरान वह इन पोषित निष्ठावानो का इस्तेमाल भी करना चाहेगा | इसको बिलकुल देखा और समझा जा सकता है की क्यों राहूल गाँधी को स्वछता अभियान में भी बुराइयां ही नजर आती हैं | खैर हो सकता है की सत्ता पक्ष के हर काम की बुराई करना ही शायद आजकल के विपक्ष की धर्म बन गया हो |

दूसरा राजनीतिक दल वर्षो के संघर्ष के बाद सत्ता में इतनी सशक्त रूप से स्थापित हुआ है तो स्वभाविक की इतने सारे लोगों के समूह में कुछ लोग अहंकार में आ जाये, कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत द्वेष और मुद्दों को ध्यान में रखकर सत्ता का इस्तेमाल करें | और यह भी संभव है की कोई तीसरी ताक़त इस स्थिति का दुरुपयोग करके देश और इसके समाज को विभाजित भी करना चाहे |

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उपरोक्त स्थिति पर विचार करें तो समझ में आता है की देश और दुनिया की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था कही न कही ऐसे स्थिति को प्रायोजित कर रही है | यधपि उपरोक्त एक सतही सच्चाई है फिर भी मैं सारा दोष राजनीतिक व्यवस्था को ही नही नहीं दूंगा बल्क़ि मैं इस बात को कहना और जानना चाहूँगा की एक समाज, एक देश और हर तरह के शासकीय व्यवस्था का मूल उद्देश्य होने के वावजूद, आज हम खुद को इतना साध्य एवं लाचार क्यों पातें हैं | मैं इस बात पर मजबूती विश्वास करता हूँ की राजनीति भी वैसी ही होती हो जैसा की समाज खुद होता है | आखिरकार फिर कारण क्या है और ध्यान देने वाले तथ्य क्या हैं |

सामाजिक, धार्मिक एवं वैश्विक वस्तुस्थिति –

भारत में आज़ादी के समय से ही कुछ ऐसी स्थितियां बनी चली आ रहीं की समाज सम्प्रद्यों का कलह का अखाड़ा बना हुआ है | हालाँकि आज़ादी के समय के संघर्षों को बाद कुछ समय तक समाज बहूत विकासोन्मुखी रहा है और जाहिर तौर पर भारत सामाजिक समरसता उदहारण रहा है| परन्तु कुछ छोटी-छोटी बातें जो पहले शायद दबी थी, हसियें पर थी, आज वो मुद्दा बन के उभर रही हैं | मैं एक छोटा सन्दर्भ देना चाहूँगा | पिछले दिनों एक विडियो की काफी चर्चा हुई | WorldNetDaily पर इस संदर्भ छपे इस लेख के अनुसार

 

islamआर्थात, ” लोग चाहे या न चाहे पर जर्मनी पर इस्लाम का कब्ज़ा हो जायेगा, और यह कब्ज़ा युद्ध के द्वारा नहीं किया जायेगा बल्कि सच्चाई ये है की जर्मन लोग बच्चे पैदा नहीं करते और एक मुसलमान के सात से आठ बच्चे होते है । सिर्फ इतना ही नहीं आपकी बेटियां दाढ़ी वाले मुसलमानो से विवाह करेंगी और हिज़ाब भी पहनेगी और उनके बच्चे भी दाढ़िया रखेंगे। मुसलमान चार शादियाँ करेंगे और 27 बच्चे पैदा करेंगे। जर्मन लोगो के पास क्या होगा एक बच्चा और शायद एक पालतू कुत्ता ? जर्मन लोगो ने मुसलमानो का बहुत लम्बे समय तक फायदा उठाया है ताकि वे अपनी मर्सिडीज़ चला सके अब इस्लाम आ रहा है और आपकी बेटियां हिज़ाब पहनेंगी । हा। … ”

इस रिपोर्ट के अनुसार बहुत सारे यूरोपियन देश अपने सीमाओ पर तार बंदी और सुरक्षा के इंतज़ाम कड़े कर दिए हैं और लेखक तो शरणार्थी संकट को गृहयुद्ध तक से जोड़ के देख रहे है |

हालाकि इसमें दो राय नहीं की उपरोक्त खबर या विडियो से भारतीय समाज का कुछ बहूत ज्यादा सरोकार है, परन्तु आज के युवा समाज एवं सुचना क्रांति के माहौल में ये ख़बर उनके पास भी पहुच रही है जहाँ नही जानी चाहियें | और फिर इसके दुष्प्रभाव को हम नकार नहीं सकतें | इसी खबर में रिपोर्ट किया गया है की अतंकिंत ऑस्ट्रिया के लोगों में शॉटगन ख़रीदने को होड़ सी मच गयी है | आगे यह बात भी महत्वपूर्ण है कि सर्वविदित रूप से भारत सबसे युवा देशों में से एक है, अर्थात् भारत की अधिकांश जनसख्या युवा है तो स्वभाविक है की यह जनसंख्या सबसे सक्रिय भी होगी | कार्य तो होगा, चाहे वह कार्य अच्छा हो या बुरा, सकारात्मक हो या नकारात्मक, दुसरे शब्दों में जितने उद्धम होने की संभवना है, उतने ही उत्पात भी हो सकतें हैं | ये संसार का शाश्वत नियम है, की उर्जा हैं तो गति है, और गति को जो भी दिशा मिले वह उसी तरफ चल निकलेगी | ऐसे में कोंई एक व्यक्ति भी अगर इन वैश्विक स्थितियों का दुरुपयोग कर समाज को बाटने का प्रायस करे तो सारे कारक उसके पक्ष में होंगे | टेलीविज़न पर एक खबर चलती है की देश में मुस्लिम समुदाय की आबादी बढ़ी और युवा विकिपीडिया छान मारतें हैं की इसका पिछला ट्रेंड क्या रहा है | और फ़िर उन्हें क्या मिलता है ? BBC की रिपोर्ट और गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड बुक के अनुसार इस्लाम दुनिया का सर्वाधिक तेजी से बढता हुआ धर्म है चाहें यह बढ़ोतरी धर्मान्तरण के वजह से हो या जनसंख्या वृद्धि से (Growth of Islamic population) | अब इसका क्या प्रभाव होगा दुसरे समुदाय के विचारों पर, ख़ास कर जब कोई धार्मिक कट्टरता की बात छेंड दें | जाहिर तौर पर ऐसे में समाज विशेष या लोगों का किसी धार्मिक नेता के बातों में आ जाने की संभावना कई गुना बढ़ जाति है |

उपरोक्त का सन्दर्भ इसलिए जरूरी है क्योकि यूरोपीय एवं अरब देशो जारी धार्मिक उन्माद एवं उथल- पुथल के इस दौर में एक युवा देश होने के नाते, और विश्व के एक वैश्विक गाँव समझे जाने के नाते और एक बहु संप्रदायीक समाज होने के नाते हमारा जोख़िम बहुत ज्यादा हैं | ऐसे में असहनशीलता का ढोल पीट कर समाधान नहीं होने वाला, बल्कि इससे समाज और बटेंगा | लोगों अंदर छिपी हुईं भावनाएं, डर आशंकाये और बलवती होंगी | सांप्रदायिक एवं सामाजिक ध्रुवीकरण होगा | यहाँ पर यह बात ध्यान रखना आवश्यक की आज के युवा के पास विकिपीडिया है | एक क्लिक उसे पता लग जाता है की 2004 से लेकर 2014 तक कितने नरसंहार हुए हैं | और ब्लकि यह भी की इस तरह के दंगो का क्या इतिहास रहा है | फिर ऐसे चंद तथाकथित बुद्धिजीवी सम्मान लौटाऊ लोगों के कारण हो सकता है कि आने वाले समय में लोग अपने आदर्श रहे लोगों की इज्ज़त करना छोड़ दें | बल्कि ये भी संभव है की वाज़िब मुद्दों में भी लोगों को कोई राजनीतिक षणयंत्र नज़र आने लगे | भारत का इतिहास और पिछले दिनों अन्ना हजारे जी के आन्दोलनों ने ये फ़िर से साबित कर दिया है की भारतीय जनतंत्र में सरकार और सत्ता ही सब कुछ नहीं है| अगर आपके मुद्दे में सच्चाई हो तो सारा समाज सबकुछ भूल कर सड़को पर उतर आता है | ऐसे में अगर असहनशीलता है भी तो सम्मान वापस करके सिर्फ़ मीडिया में कुछ चर्चाएं कराईं जा सकती हैं या ज्यादा से ज्यादा संसद का एक सत्र कुछ बाधित करवाया जा सकता है | इन सभी नतीजों से देश का बस नुकसान ही होता है | धरातल पर कुछ सकारात्मक बदलाव नहीं होते |

 

 

समाधान –

अब सवाल यह उठता है कि क्या करें | एकदम साफ, सीधा है समाधान है, हमें समाज के हर समुदाय के भय को खत्म करना होगा | खासकर धार्मिक एवं सामाजिक कट्टरपंथ के वज़हों को खत्म करने के क़दम जैसे कट्टरपंथी बयानबाजी पर नियंत्रण, सामान नागरिक संहिता, कानून व्यवस्था में सूधार, एवं सामान शिक्षा एवं सामान अवसर आदि | हमें यह समझाना होगा की समाज के किसी एक तबके में भी डर, या असंतोष बना रहेगा तो दुसरे भी अछूते नहीं रहेंगें |

कैसे करें | अगर हम तत्कालिक भुत (recent past) पर नज़र डाले तो धर्मिक कट्टरपंथ ने भारतीय समाज को सबसे ज्यादा नुकसान पहुचाया है | खास कर हिन्दू मत एवं मुस्लिम मत | मुस्लिम धर्मगुरु कहता है की परिवार छोटा मत रखो इस्लाम ख़तरे में है मगर वो ये नहीं सोच पाता की कल हिन्दू धर्मगुरु भी तो यही कहेगा की हिन्दू ज्यादा बच्चे पैदा करें | आखिर परिवार बड़ा करना किसी एक मत एकल अधिकार तो है नहीं | और सबसे बड़ी बात हमारा कानून जनतंत्र के नाम पर ये सारा होने देता है| गाय के सुरक्षा का कानून है, पर जनसँख्या नियंत्रण का कोई कानून नहीं है | कहने का तात्पर्य ये हैं कि धर्म पर केंद्रित कानूनों के बजाय सामाजिक सरोकारों पर केंद्रित कानून बनाने का समय आ गया है | दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की अभी हमारा समाज शिक्षित तो क्या पुर्णतः साक्षर भी नहीं हो पाया है | ऐसे में एक ऐसी भीड़ जो युवा है, उर्जावान है, और अशिक्षित है, एक ऐसी भीड़ जो चूहे छोड़ने के विवाद में हत्या कर दे, गोमांस के अफ़वाह पर जान ले ले, इस भीड़ के सामने कोई उन्मादी बयानबाजी करे तो, कोई उसकी व्यक्तिगत निराशा को कोई धार्मिक रंग दे डाले तो | जरूरत है कि कानून इसका संज्ञान ले | जैसा की पुर्वोल्लेख्खित है, युवा, उर्जावान एवं सक्रीय लोग, जितने उद्धम की संभवना उतनी ही उत्पात की आशंका, पर क्या कानून व्यवस्था को लागू करने वाली हमारी संस्थाये उतनी ही सक्षम हैं एवं सक्रीयहैं जितना की हमारी जनसंख्या ? मुझे लगता है की अगला आन्दोलन इन संस्थाओ के सूधार के लिये होना चाहिए |

सबसे महत्वपूर्ण बात जिसके कारण मैं ये लेख लिखने के लिये प्रेरित हुआ | हमें नए ज़माने के कबीर, राजा रामोहन राय और विवेकानंद चाहिए | जाति, वर्ण और धार्मिक मत समाज की एक सच्चाई है इसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता | अब जरूरत है इसे गले लगाने की और सही दिशा दिखाने की | मैं जावेद अख्तर साहब का संवाद देख रहा था, उन्हें कहना कुछ और था पर पहले उन्हें यह कहना पड़ा की मैं धर्म को नहीं मानने वालो (atheist) में हूँ | मैंने ये खुद से पूछा की क्या ये वही देश है जहां कहा जाता था “जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान” |

कुरान पढने के बाद मुझे बस इतना ही समझ में आया की शरिया उस समय के सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप होंगी | यह उस समय के समाज के लिये उचित पद्धति रही होगी | मेरे लिये ये समझ पाना या जान पाना की Gabriel ने पैगम्बर मुहम्मद साहब को कौन सी बात किस संदर्भ कही, पैगम्बर साहब ने कौन सी बात किस सन्दर्भ में अपने अनुयायियों लिखवाया जो की बाद संकलित हो कर पवित्र कुरान के रूप में मौजूद है, एक व्यापक शोध और विचार का विषय है, परन्तु एक बात में मुझे कोई संदेह नहीं की उनकी बातें जरूर कल्याण करी रही होंगी, समाज को और इंसान को जोड़ने से संबंधित रही होंगी | वर्ना ऐसे ही कोई इतना स्वीकार्य कैसे हो सकता है | और इस विचार से मुझे भारतीय इस्लाम पर गर्व होता है | सारे धर्म पंथो में समय-समय पर सूधार-बदलाव की जरूरत पड़ती रही है, और भारत का इस्लाम बहूत हद तक समकालीन परिस्थितियों के अनुरूप बदला है | भारतीय इस्लाम ने मूर्तिपूजक महिलाओं को पटरानियाँ बनाया है | भारतीय इस्लाम टेलीविज़न और सिनेमा को हराम नहीं मानता | हाँ परन्तु अब वैश्विक परिस्थितियों देखते हुये ख़ासकर खाड़ी देशो में जारी कट्टरपंथ, और सुचना के आसान उपलब्धता के कारण, अब हमें अपनी मूल्यों को पुनर्स्थापित करने की जरूरत है | हमें हर उस वजह को खत्म करना होगा जो किसी भी तरह से समाज में निराशा, डर, आशंका के कारण बन सकतें है | ऐसे कारणों के लिये सरकार के तरफ से, कानून व्यवस्था में सूधार, कट्टरपंथी बयानबाजी पर पाबंदी (zero talerance), धर्मान्तरण कानून, जनसंख्या नियंत्रण अधिनियम, समान नागरिक संहिता आदि कदमों का उठाया जाना जरूरी हो गया है | अब हम उस समाज में निर्वाह नहीं कर सकते जहाँ सम्प्रदायों के बीच जनबल बढ़ाने की होड़ मची हो और धार्मिक एवं राजनीतिक कट्टरपंथी इसे हवा दे रहें हो, या फिर महिलाएं पुरुषों से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ती हों | हमें सुनिश्चित करना होगा की महिलाये भावी पीढी को सुसंस्कृत करने के लिये उपलब्ध हों और अधिनायक सिर्फ़ समाज को जोड़ने का कार्य करें | इन सारी बातों को सुनिश्चित करने के लिये कोई बहूत बड़ा उपाय करने की जररूत नहीं है, बस बिना राजनीति किये ऐसे कानून बने और कानून बिना पक्षपात के अपना काम करें |

एक बात और जो मैं इस देश के बुद्धिजीवी वर्ग के सामने रखना चाहूँगा | हम इस देश नागरिक भर नहीं हैं बल्कि हम इस देश के कर्जदार भी है | अगर हम सिर्फ़ शासन व्यवस्था के भरोसे रहेगें तो शायद यह नाइंसाफ़ी होगी | हमारे पास युवा और उर्जावान राष्ट्र और समाज है, ऐसे में ये जरूरत भी है और हमारा कर्तव्य भी, कि हम इस उर्जा को सही दिशा प्रदान करें | सिर्फ़ विरोध करने से, सम्मान वापस करने से, किसी व्यक्तिगत आशंका को सार्वजानिक मंचो से बयान करने से बस निराशा फैलेगी | कट्टरपंथ को और बल मिलेगा और समाज में नकारात्कता और गहरे घर करेगी | मै जावेद अख्तर साहब को कहना चाहूँगा की ये समय अधार्मिक होने का नहीं बल्कि धार्मिक होने का है | आप जैसे लोग समाज के नायक है और इस समय समाज को अपने नायको की सबसे ज्यादा जरूरत है | अगर समाज इस्लाम की भाषा समझता है तो हमें मुसलमान बन कर इस्लाम को शायद दुबारा परिभाषित करना पड़ेगा | उसी परिधि में रह कर नयी मान्यताओ को गढ़ना पड़ेगा, नये मूल्यों को स्थापित करना होगा | अगर समाज हिंदुत्व की भाषा समझता है तो हिन्दू बनकर समझाना होगा | उसके अपने मूल्यों को पुन्रउजागर और पुनर्स्थापित करना पड़ेगा | और सबसे महत्वपूर्ण रूप से कुरीतियाँ, गलतफहमियां, और भटकाव को जन्म देने वाले कारकों को खत्म करना होगा | मैं आम़िर खान साहब, एवं अन्य गणमान्य लोगों से कहना चाहूँगा की अगर किसी तरह का डर या आशंका है तो अब समय है की हम आगे आ कर इसके निदान की बात करे | सार्वजानिक मंचो पर ऐसी बातें करना शायद समस्या को और महिमामंडित और समाज को और नकारात्मक एवं भयाक्रांत कर दे | अगर लोग हमारी बात मानते हैं, हमारा जनमानस पर प्रभाव है, तो क्यों ना हम उनके साथ जा कर उन्हें सही दिशा दें | उनके उनके डर को समाप्त करने का प्रयास करें | उनके अंदर एक सकारात्मक एवं विकासोन्मुखी विचार पैदा करें | इतिहास साक्षी है की हर तरह के समाज को समय-समय के अंतराल पर, मसीहों की, पैगम्बरों की, ऋषियों की, दार्शनिकों की, नायकों की, की जरूरत पड़ती रही है, जो मौजूदा परीवेशों के अनुसार मूल्यों को स्थापित करतें रहे है | मैं इस बात को लेकर काफ़ी आशान्वित हूँ कि, बुद्ध, कबीर, नानक, महावीर, राजा राममोहन राय, और मौलाना आज़ाद की इस धरती पर सच्चे नायकों की कमी नहीं होंगी और साथ ही आप सबको आमंत्रित भी करता हूँ कि ये देश, ये समाज, ये लोग, ये जरूरत, और ये जिम्मेदारी हमारी अपनी है, आगे बढ़े और आगे बढ़ाये |

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