नव साम्यवाद और समाजवाद के प्रति मेरा नज़रिया…

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समाज में समय के साथ – साथ सामाजिक चिंतन का तरीका भी बदला है I 18 वीं सदी की औद्योगिक क्रांति ने जहां व्यापक पैमाने पर उत्पादन को बढ़ावा दिया और पूंजी के मालिको को एक अच्छा प्रतिफल दिया वहीं दूसरी तरफ इसी पूंजीवाद ने उत्पादन अधिशेष (Production Surplus) के लिए व्यापक पैमाने पर मजदूर वर्ग का शोषण किया और उन्हें उनके उत्पादन के लिए अनैतिक रूप से न्यूनतम मजदूरी प्रदान की I अधिशेष (surplus) के इसी बंदरबाट ने मजदूर वर्ग के असंतोष में गंभीर रूप से वृद्धि की जिसने उत्पादन और सामाजिक चिंतन को एक नया आयाम दिया और एक नए सामाजिक चिंतन की विचारधारा के रूप में साम्यवाद (Communism) का प्रादुर्भाव हुआ I सामाजिक चिंतन की इस नयी साम्यवादी विचारधारा की नीव कार्ल मार्क्स ने The Communist Manifesto (1848) में रखी I साम्यवाद जिसका मूल आधार ”वर्ग संघर्ष पर आधारित” था, ने सामाजिक व्यवस्था में व्यापक सुधार किया और सामाजिक संतुलन का एक नया मार्ग प्रशस्त किया I इस नयी साम्यवादी विचारधारा ने सर्वहारा वर्ग (Proletarian) की सामाजिक और आर्थिक दशाओं में महत्वपूर्ण सुधार किये I
विचारधारा कितनी भी उपयुक्त क्यूं ना हो किन्तु वो सर्वकालिक नही हो सकती, ”समय की ताकत” के कारण वो क्षीण पड़ती जाती है और उस पर पुनर्विचार की आवश्यकता पड़ती है, तो साम्यवाद भी एक सर्वमान्य और सर्वकालिक विचारधारा कैसे हो सकती है…? समय के साथ साथ इस विचारधारा में भी समयानुकूल परिवर्तन होना अतिआवश्यक था किन्तु ऐसा अपेक्षित परिवर्तन नही हो पाया और साम्यवाद अपनी वर्गवाद की उसी रूढ़िवादी विचारधारा पर कायम रहा I
अगर हम नव साम्यवादिओं और समाजवादिओं की रूढ़िवादी विचारधारा को वर्तमान परिस्थिओं में देखे तो शायद इसे हम नीचे दिए गये उदाहरण से बेहतर रूप से समझ सकते है…
“साम्यवादी विचारधार का मूल हीं असंतोष और विरोध से शुरू होता है I समाज के हर विषय पर असंतोष ज़ाहिर करना आज एक साम्यवादी, समाजवादी और बौद्धिक परम्परा सी बन गई है I अपनी इसी नकारात्मक भावना के कारण ये एक विनाशक और अनुत्पादक विचारधारा मात्र बनकर रह गई है और समाज के विकास में इसका नकारात्मक योगदान रहा है और इसने वर्ग द्वेष की भावना क़ो बढ़ाकर सामाजिक सौहार्द क़ो भयानक ढंग से चोट पहुंचायी है I इनकी विचारधारा में इतनी गिरावट आयी है की आज अगर एक साम्यवादी से एक मुर्दे के लिए कब्र खोदने के लिए बोला जाये तो वो एक लम्बी बौद्धिक बहस के बाद एक महान निष्कर्ष पर आयेंगे की “हम आज तक इन कमजोर कौमों क़ो मरने के बाद गड्ढे (कब्र में दफनाते रहें हैं) में गिराते रहें हैं और जीते जी हमारी पूंजीवादी व्यवस्था तो उन्हें इन गड्ढो में गिराती ही रही हैं…तो क्यों ना हम इन्हें आज अभी से उठाने (uplift) की शुरुआत करें…और वो (साम्यवादी) अपनी इसी क्रन्तिकारी सोच के साथ खुले आसमान के नीचे एक ऊँचा सा मचान बनाकर उस मुर्दे क़ो रख देंगे…शायद इन साम्यवादिओं की नज़र में कम से कम अब तो इन दबे हुए वर्ग क़ो सूर्य की रोशनी नसीब हो सकेगी जो उसने जीने के दौरान कभी नही देखी…!!

By – संजय प्रताप सिंह

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