विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालय और ज्ञान के सबसे बड़े केंद्र नालंदा का हुआ जीर्णोद्धार, मोदी सरकार ने दिए 26 अरब…

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विश्व का सबसे प्राचीन नालंदा विश्व विद्यालय तक़रीबन 8०० सालों बाद एक बार फिर खुल गया है । पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने वर्ष 2005 में नालंदा विश्व विद्यालय को फिर से हक़ीक़त का जामा पहनाने की योजना बनाई थी । आज भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक भारत रत्न डाक्टर एपीजे अब्दुल कलाम का वह सपना पूरा हो चुका है । आज एक बार फिर दुनिया का सबसे प्राचीन सभ्यता और ज्ञान का केंद्र दुनिया भर के विद्यार्थियों का बाहें फैलायें स्वागत करने के लिए तैयार हो चुका है ।

पहले सत्र में दाख़िले के लिए 1000 आवेदन –
बता दें कि डाक्टर कलाम का सपना ना केवल तैयार ही हो चुका है बल्कि नालंदा विश्व विद्यालय में पहले सत्र के लिए कक्षाएँ भी शुरू हो चुकी है । पहले सत्र के लिए इस विश्व विद्यालय को कुल 1000 आवेदन प्राप्त हैं लेकिन केवल 15 विद्यार्थियों को ही यहाँ पर प्रवेश दिया गया है । अभी प्रारम्भ में इस विश्व विद्यालय के लिए 10 बेहतरीन प्रोफ़ेसर्स की नियुक्ति भी की जा चुकी है । प्राप्त जानकारी के आधार पर बताया जाता रहा है की अभी विश्व विद्यालय में जो विद्यार्थी पढ़ाई कर रहे है इनमें से एक विद्यार्थी भूटान से तथा एक जापान से है ।

केंद्र सरकार ने दी है 26 अरब रुपए की मदद –
बताते चले की डाक्टर कलाम के इस सपने को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है । दुनिया के इस सबसे प्राचीन विश्व विद्यालय को सबसे आधुनिक विश्व विद्यालय बनाने के लिए केंद्र सरकार ने 26 अरब रुपए की भारी भरकम धनराशि की मंजूरी दी है ।

विश्व विद्यालय में होंगे कुल 7 विभाग –
बता दें कि इस विश्व विद्यालय में कुल 7 विभागों की फ़िलहाल स्थापना की गयी है । इन ७ विभागों में विज्ञान, दर्शन, आध्यात्मिकता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट तक की पढ़ाई हो सकेगी ।

प्राचीन काल में शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र था नालंदा –
ज्ञात हो कि प्राचीन भारत में नालंदा विश्व विद्यालय उच्च शिक्षा का दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र था । इस विश्व विद्यालय में पूरी दुनिया के छात्र शिक्षा पाने के लिए आया करते थे । नीति शास्त्रों, अर्थ शास्त्र के रचियता आचार्य चाणक्य इसी विश्व विद्यालय के आचार्य थे । उन्ही आचार्य चाणक्य के दिखाए रास्ते पर आज भी दुनिया चल रही है आज भी दुनिया की ऐसी कोई भी नीति नहीं है जो आचार्य चाणक्य के द्वारा नीति सिद्धांतों से परे हो या फिर ऐसी कोई ही नीति नहीं है जिसका तोड़ आचार्य चाणक्य की पुस्तक में ना हो ।

450 से 470 ईसवी में हुई थी स्थापना –
बता दें कि दुनिया के इस अति प्राचीन विश्व विद्यालय की स्थापना 450 से 470 ईसवी में हुई थी । इतिहासकार बताते है कि बारहवीं सदी में यहाँ पर 2000 से अधिक आचार्य और 100,000 से भी अधिक छात्र हुआ करते थे ।

बताया जाता है की यह विश्व विद्यालय स्थापत्य काला का बेजोड़ नमूना था । यह पूरा परिसर विशाल दीवारों से घिरा हुआ था । विद्यालय में प्रवेश करने के लिए मात्र एक ही मुख्य द्वार था । विद्यालय में उत्तर से दक्षिण की ओर अनेकों मठों की कतार थी और उनके ठीक सामने मंदिर हुआ करते थे । उन मंदिरों में भगवान बद्ध की बेहद सुंदर मूर्तियाँ हुआ करती थी ।

केंद्रीय विद्यालय परिसर में 300 कमरे हुआ करते थे जहाँ बाहर से आए हुए विद्यार्थी हमेशा अध्ययन में लगे रहते थे । अब तक जितनी खुदाई कीं जा चुकी है उसमें 13 मठ मिल चुके है । आपको बता दें की इस अति प्राचीन विश्व विद्यालय में विज्ञान, व्याकरण, दर्शन शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, योग शास्त्र आदि अनेकों विषयों को पढ़ाया जाता था । यहाँ से पढ़ें हुए विद्यार्थियों ने पूरे विश्व में अपने ज्ञान का लोहा मनवाया है ।

इस प्राचीन विश्व विद्यालय में खगोल शास्त्र को पढ़ाने के लिए अलग से ही एक पूरे विभाग को बनाया गया था । बता दें कि भारत के मशहूर गणितज्ञों में से एक आचार्य आर्यभट्टा ने यही से पढ़ाई की थी और वे भी यहाँ प्राचार्य हुआ करते थे । लेकिन मुग़ल काल के दौरान इस अति प्राचीन विश्व विद्यालय को नष्ट कर दिया गया और यहाँ के सभी मठों को जला दिया गया था ।

इतने सालों तक बार-बार अलग अलग राजाओं और देशों की ग़ुलामी के बाद आज़ाद हुए भारत के स्वर्णिम इतिहास की बातें मानो अब लग रहा है की पुनः दोहराई जा सकेंगी क्योंकि इतिहास का सबसे बड़ा नाता अगर कही से है तो वह यही से है ।

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