नौनेर में भी पानी का गम्भीर संकट, ईशन नदी सूखी, कुऐ और तालाव हो गये लापता

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मैनपुरी (ब्यूरो)- नौ सौ कुआं, नवासी पोखर, भोला तेरी अजब गढ़ी नौनेर नाम की देश में सबसे बड़ी ग्राम सभा का सम्मान पाने वाली क्षत्रीय बाहुल्य धरती भले ही विकास के नक्शे पर दौड़ने का प्रयास कर रही है। परन्तु इस क्षेत्र में लगातार गिरते जा रहे जल स्तर और सूखती जा रही नदियों के हलक से धरती का सीना फटने लगा है। जानवर पानी की तलाश में कहीं नदी की ओर तो कहीं रजवाहे की ओर भागते है और उसमें उड़ती धूल देख वापस लौट आते है।

आगरा रोड़ स्थिति दन्नाहार थाना क्षेत्र से औंछा और कई थानों की सीमा में जुडी आजाद भारत की सबसे वड़ी ग्राम सभा नौनेर बदहाली के आंसू रो रही है। इतिहास के पन्नों में कई दिलचस्प कहानियां समेटे बीर धरती नौनेर के हालात जल स्तर गिर जाने से खराब होते जा रहे है।

ग्रामीणों का कहना है कि कभी यहां नौ सौ कुआं और नवासी पोखरों के अलावा एक कौने से निचती गंगा नहर और दूसरे कौने से नगरिया रजवाह निकलने से यहां की ऊर्वरा धरती सदैव हरी भरी रहती थी। यहां के ऊसर को भी लोग जब राह चलते देखते थे तो उनके मूंह से निकलता था कि ऊसर जब हरा है तो खेत कितने ऊर्जावान होगें।

कभी सरकार ने इस ऊसर में एक विशाल हवाई पट्टी बनवाने का निर्णय लिया था। परन्तु सीमांकन में 700 वें मीटर पर उच्चशक्ति प्रवाहित विद्युत लाइन गुजरने से यहां की हवाई पट्टी वाली फाइल कूडे़ में डाल दी गईं। शासन की नजर में चढ़े इस ऊसर में भले ही हवाई जहाज न उतरे परन्तु यूपी सीएल का पावर सव स्टेशन बन जाने के बाद यहां विकास की रोशनी तेज गति से बड़ा दी गई। कई बड़े शिक्षण संस्थान के अलावा इंजीनियरिंग काॅलेज, सैनिक स्कूल और भी कई निजी क्षेत्रों की योजनायें यहां धरातल पर उतरती दिखाई दे रही है। परन्तु जल संसाधन सिमट जाने की बजह से कृषि उत्पादन अब लगातार गिरता जा रहा है। इस क्षेत्र के अधिकांश गांवों में अब चार नम्बर मशीन बाला हैण्ड पम्प सपने की बात हो चुकी है।

ईशन का भी इतिहास है दर्ज नौनेर में –
अलीगढ़ के पनैठी तालाब से निकलकर कानपुर के बांगरमऊ घाट पर गंगा में गिरने वाली जीवन दायनी नदी ईशन का अधिकांश विचरण इसी क्षेत्र में होता था। कहावत है कि सीमा पर बसी रियासत रिजौर से मैनपुरी रियासत में नाव से हर रोज दूध आता था और उसी नाव से व्यापार किया जाता था। किसी बात को लेकर दोनों राजाओं में जब तनाब हुआ तो नौनेर के समीप एक किसान ने इस नदी पर इतना बड़ा बांध लगा दिया कि जलधारा उलटी बहने लगी और जब रिजौर डूवने लगा तो समझौते के तहत नदी को खोला गया। इसे ढौला का आंध कहा जाता है।

नौ नदियों के हृदय में भी पानी का संकट –
कहने को तो जनपद में काली, ईशन, कक, अरिन्द, सिरसा, सैंगर, आव गंगा और यमुना नदी सहित नौ नदियां और दर्जनों विशाल तालाव हुआ करते थे। जिनमें बरसाती पानी एकत्र होकर जमीन में प्रवेश कर जाता था। आज भूमाफियांओं और जमीन पर कब्जा करने वालों ने तालावों पर विशाल भू-खण्ड खड़े कर दिये और कहीं तालावों की सीमा काटकर अपने खेतों में मिला ली है। जनपद का एंेतिहासिक समान तालाव, सौज का तालाव, मारकंड का तालाव, सोमनाथ का ताल, राजा का ताल, रानी का ताल, करीमगंज की झील जैसे तमाम जल श्रृोत पूरी तरह लापता हो चुके है।

रिपोर्ट- दीपक शर्मा

 

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