1200 साल पुराना एक ही पत्थर से बना दुनिया का सबसे विशाल और भव्य मंदिर

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भारत आर्यावर्त, हिंदुस्तान या फिर कितने भी नामों से हम इस धरती को पुकारे लेकिन इसकी पहचान हमेशा ही एक बेहद सहिष्णु, उत्सवधर्मी, ईश्वर में विश्वास करने वाले और प्रकृति को प्रेम करने वाले लोगों की धरती के रूप में जाना जाता रहा है और आगे भी जाना जाएगा I भारत वर्ष को यदि हम मंदिरों का देश कहें तो इसमें भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी I हमारे देश में आज से ही नहीं अपितु प्राचीन काल से मंदिरों की स्थापना करने और हमेशा उसमें पूजा अर्चना करने के लिए जाना जाता है I यदि हम सही मायनों में कहें तो यह हमें विरासत में मिला है I

प्राचीन काल में भारत वर्ष में अनेकों अनेक राजाओं, राजकुलों ने अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया है जो आज उस समय की भारत की भव्यता की गाथा का बखान करते है I इन मंदिरों की प्राचीरें आज भी दुनिया को चीख-चीख कर यह बताती है, समझाती है कि वास्तव में भारत की सभ्यता और ज्ञान की कोई पराकाष्ठा कभी नहीं थी I हाँ अनेकों कालों में इसने उतार चढाव जरूर देखें है I भारत के भव्य मंदिर, भवन और प्राचीन इमारतें दुनिया के बदलते हुए समय और अनेकों राजकुलों आतताइयों के अत्याचार और प्रेम सभी का गवाह बनी है I

एक पत्थर से बना है दुनिया का सबसे विशाल कैलाश मंदिर –
आज हम आपको देश के एक ऐसे भव्य मंदिर के बारे में बता रहे जिसके बारे में बताया जाता है कि यह एक ही पत्थर को काटकर बनाया जाने वाला दुनिया का सबसे विशाल मंदिर है I आपको बता दें कि यह मंदिर है भारत के पश्चिमी छोर पर स्थित महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद जिले में एलोरा की गुफाओं में स्थित भगवान् महादेव का कैलाश मंदिर I

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इस मंदिर का निर्माण बताया जाता है कि राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण (प्रथम) (760-753 ई0) ने निमित्त कराया था I बताया जाता है कि इस मंदिर को बनाने में एक समूचे पहाड़ को ही काटा और तरासा गया है I इस मंदिर को बनाने अनुमान लगाया जाता है कि तक़रीबन 40 हजार टन पत्थर को काट-काट कर इससे अलग किया गया है I इस मंदिर के निर्माण में आजके यदि अनुमानों की मानें तो तक़रीबन 150 वर्ष लगे होंगे और 7000 मजदूरों ने प्रतिदिन लगातार 150 वर्षों तक इस मंदिर में काम किया है तब जाकर कहीं इस भव्य मंदिर का निर्माण हुआ है I

भगवान् भोलेनाथ महादेव का यह मंदिर एक ही शिलाखंड को काटकर बनाया जाने वाला दुनिया का सबसे अप्रतिम, सबसे दुर्लभ और सबसे भव्य मंदिर है I यह मंदिर दोमंजिला बना हुआ है I इस मंदिर में कहीं से एक ईंट भी अलग से जोड़ी नहीं गयी है I इसका निर्माण करने में सबसे पहले बताया जाता है अनुमान लगाया जाता है कि पहाड़ को चारों तरफ से काटकर अलग कर दिया गया था और उसके बाद मंदिर का प्रांगण तैयार किया गया था I

उसके बाद उस ठोस पहाड़ को काटकर शिल्पकारों ने दुनिया के इस सबसे अप्रतिम मंदिर का निर्माण किया था I आपको बता दें कि यह मंदिर एलोरा की गुफा संख्या 16 में स्थित है I इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे भगवान् शंकर के कैलाश से प्रेरित होकर बनाया गया था I इस मंदिर में शिल्पकारों ने कैलाश की हूबहू छवि को उकारने का अद्भुद भागीरथ प्रयास किया था I इस मंदिर के भीतर शिल्पकारों ने भगवान् भोलेनाथ के कई रूपों को बहुत प्रेम और समर्पण के साथ चरितार्थ किया है I

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भगवान् महादेव का तांडव स्वरुप देखकर मन में भय उत्पन्न होता है तो वही उनके बगल में बैठी माता पार्वती की शांत बेहद भव्य मूर्ति को देखकर मन शांत हो जाता है I शिव-पार्वती का परिणय भावी सुख की मर्यादा बाँधता है, जैसे रावण का कैलाशत्तोलन पौरुष को मूर्तिमान कर देता है। उसकी भुजाएँ फैलकर कैलाश के तल को जैसे घेर लेती हैं और इतने जोर से हिलाती हैं कि उसकी चूलें ढीली हो जाती हैं और उमा के साथ ही कैलाश के अन्य जीव भी संत्रस्त काँप उठते हैं। फिर शिव पैर के अँगूठे से पर्वत को हल्के से दबाकर रावण के गर्व को चूर-चूर कर देते हैं। कालिदास ने कुमारसंभव में जो रावण के इस प्रयत्न से कैलाश की संधियों के बिखर जाने की बात कही है, वह इस दृश्य में सर्वथा कलाकारों ने प्रस्तुत कर दी है। एलोरा का वैभव भारतीय मूर्तिकला की मूर्धन्य उपलब्धि है।

कैलाश मंदिर को हिमालय के कैलाश का रूप देने में एलोरा के वास्तुकारों ने कुछ कमी नहीं की। कैलाश के इस परिवेश में, समीक्षकों का अनुमान है, समूचा ताज मय अपने आँगन में रख दिया जा सकता है। एथेंस का प्रसिद्ध मंदिर ‘पार्थेनन’ इसके आयाम में समूचा समा सकता है और इसकी ऊँचाई पार्थेनन से कम से कम ड्योढ़ी है। कैलाश के भैरव की मूर्ति जितनी भयकारक है, पार्वती की उतनी ही स्नेहशील है और तांडव का वेग तो ऐसा है, जैसा पत्थर में अन्यत्र उपलब्ध नहीं।

यूनेस्को द्वारा 1983 से ‘विश्‍व विरासत स्‍थल’ घोषित किए जाने के बाद अजंता और एलोरा की तस्‍वीरें और शिल्‍पकला बौद्ध धार्मिक कला के उत्‍कृष्‍ट नमूने माने गए हैं और इनका भारत में कला के विकास पर गहरा प्रभाव है।

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