लगातार किसानों की हो रही आत्महत्या, लोकतंत्र को संकट में भी डाल सकती हैं –

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बड़े शर्म की बात हैं कि जिस देश की 60% से अधिक आबादी आज भी खेती और किसानी पर ही निर्भर है और इतना ही नहीं जिस देश की संसद में आज भी कम से कम 60% ऐसे लोग बैठे हैं जो खुद प्रत्यक्ष या फिर अप्रत्यक्ष तौर पर खेती-किसानी से ही जुडें हुए हैं I फिर भी उस देश का किसान आत्महत्या पर मजबूर होता हैं यह बड़े शर्म की बात हैं ! यह उस देश के लोकतंत्र और उसे बनाने वाले उन महापुरुषों के उन पवित्र संकल्पों के ऊपर एक सीधे प्रहार की तरह है, जिन्होंने कभी इस देश के संविधान की रचना करते हुए, सरकारों का गठन करते हुए और सत्ता का संचालन करते हुए हमेशा से ही किसानों को सर्वोपरि माना था I

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आज उस “महात्मा” की आत्मा उस राजघाट के मैदान में बनी उस एकांत समाधि के भीतर रो रही होगी और कह रही होगी कि क्या हमनें इसी देश की कल्पना की थी ? क्या हमारे अनेकों देश भक्तों ने इन मुट्ठीभर लोगों के लिए ही अपनी जान दी थी ? क्या सरदार वल्लभभाई पटेल ने इन्ही किसानों की दशा सुधारने के लिए आन्दोलन किये थे ?

अरे आज के नेताओं इन किसानों के जीवन को इतना भी आसान न समझो, इनकी शहादत ने अंग्रेजों के तख्ते को भी पलट दिया था !

पढ़ें छोटी सी कविता –

सरकारें बदलती रही, चेहरे बदलते रहे पर
हम तो आज भी वहीँ हैं जहाँ पहले हुआ करते थे…!
वादें तो सबने खूब किये, तरह तरह के सपने भी दिखाए लेकिन
सहारे आज भी हमारे वही हैं जो कल हुआ करते थे…!
वही पेंड की डाल, वहीँ अपनी बेजां सी जमीं, वहीँ अपने गमक्षे का फंदा ..!

सरकारें बदलती रही, चेहरे बदलते रहे पर …

हम तो आज भी वहीँ हैं जहाँ पहले हुआ करते थे…!

कितने ही चेहरों पर कितनी भी बार हमनें किया भरोषा था

पर आज हमारे जाने पर भी वह अपनी सियासत के रंग में ही रंगे नजर आये

आखिर क्या हमारा यही कुसूर हैं कि हम पालनहार का सपना जो पाल बैठे हैं !

क्या हम कोई चौसर की मुहरे है बस जो हर चाल पर चलते जाय, बस चलते जाय !!

हमारी मौत पर यह मत सोचना कभी कि हम ख़ाक में मिल जायेंगे !

हमनें तो दी है कुर्बानी, मरकर भी इस धरती के काम आयेंगे !!

इतिहास गवाह है जब भी किसी मजबूर के खून का स्वाद इस धरती ने चखा हैं

सैलाभ आया है, तख्ते पलट गयें हैं, वह लोग जो हम पर हुकुमत करते थे कभी

आज महासभाओं में, सम्मेलनों में हमारी पीढियों के सामने झुके नज़र आयें हैं !!

 

***धर्मेन्द्र सिंह ***

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