हमारे अपने देश के लोगों ने ही अपने देश में जन्मी इस कला को महत्व देना बंद कर दिया है

0
307

lala

हमारे अपने लोगों ने ही उस कला को अहमियत देना जो उनके ही देश में जन्मी है, मेर नाम लाला भाट है, मै एक कठपुतली नाचने वाला हूँ जिसने राष्ट्रीय अवार्ड जीता है और स्वर्गीय कलाम साहब के द्वारा भी सम्मानित किया गया है मै जन्म से ही दिल्ली की कठपुतली कॉलोनी में रह रहा हूँ जैसा की मेरे दादा जी ने बतया था यह कॉलोनी करीब 50 साल पहले बनी थी, बहुत से छोटे – छोटे कलाकार जैसे कठपुतली का खेल दिखने वाले, लोकगीत गाने वाले राजस्थान से काम की तलाश में यह आते हैं और यहीं बस जाते हैं, यहाँ बहुत से ऐसे कलाकार है जो कम से कम एक बार अपनी कला प्रदर्शन के लिए विदेश जाकर आये हैं और मै दावे के साथ कह सकता हूँ की यहाँ रहने वाले आधे से अधिक लोगों के पास पासपोर्ट ज़रूर होगा क्योकि बाहरी देशों जैसे फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया आदि में हमारी कला बहुत प्रसिद्ध है

यहाँ कला की भरमार है बस उसे और निखारने की ज़रुरत है लेकिन हमारी सरकार की तरफ से सहायता हमेशा से ही नदारद रही है हमारे पास बहुत सी लोककथाएँ हैं जिन्हें अपनी कठपुतलियों के द्वारा हम बहुत ही अच्छे ढंग से मंच पर प्रस्तुत कर सकते हैं पर जब हमारे पास कठपुतली बनाने का सामान खरीदने तक के पैसे नहीं है तो हम अपना खुद का मंच बनाने के बारे में कैसे सोंच सकते हैं |

जो बात मुझे सबसे ज्यादा दुःख पहुंचती है वह ये की विदेशियों के मन में हमारी कला के प्रति बहुत सम्मान और लगाव है और ये कला ही है जो वे भारतीय संस्कृति की इतनी सराहना करते हैं पर हमारे अपने देशवासियों ने ही उनके अपने देश में जन्मी इस कला को अहमियत देना ही बंद कर दिया है पर अंत में हम कलाकार हैं और हमें अपनी कला के प्रदर्शन के अलावां और कुछ नहीं आता

हमने इस बात को भी स्वीकार कर लिया है कि जीवन एक संघर्ष है जिसमे कभी तुम जीतते हो तो कभी हारते हो पर तुम कोशिश करना बद नहीं कर सकते और यही कारण है की हमने आज भी किसी तरह अपनी इस कला को जीवित रखा है और हम आगे भी ऐसा करते रहेंगे |

 

Via – Humans of India

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

fourteen − 4 =