विद्यालय संचालकों द्वारा छात्रों को अधिक अंक देकर अभिभावकों को लुभाया जा रहा है

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चकरनगर/इटावा (ब्यूरो)- निजी विद्यालयों के संचालकों द्वारा अपने विद्यालय की छवि को निखारने के लिए विद्यालय के छात्रों को स्थानीय परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिका में अधिक अंक देकर अभिभावकों को गुमराह करने का प्रयास किया जा रहा है ताकि अभिभावक अपने बच्चों की प्रवेश सूची को देखकर खुश हो जाएं और बच्चों को उसी स्कूल में अध्ययन कराते रहें।

प्राप्त जानकारी के अनुसार नगर व ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित अनेक निजी विद्यालयों में शिक्षा की पवित्रता और उद्देश्यों को ताक पर रखकर राष्ट्र के निर्माता कहे जाने वाले चंद शिक्षक निहित स्वार्थों के लिए विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने पर तुले हुए हैं कमजोर छात्रों को अच्छे अंक देना उनकी मजबूरी है। बोर्ड परीक्षाओं की कॉपियों का मूल्यांकन करते समय तो विशेष उदारता बरती गई है 300 से 15 सौ तक की राशि पर नौकरी करने वाले शिक्षक अच्छे से अच्छा परिणाम बनाने में लगे हुए हैं। अच्छे परीक्षा परिणाम को प्रचारित कराकर वह विद्यालय की छबि को निखारने का प्रयास करते प्रतीत हो रहे हैं। प्रतिवर्ष खुलने वाले नवीन विद्यालयों ने पुराने संस्थानों की परेशानियों को बढ़ा दिया है।

मजबूरन नए-पुराने संस्थान इन ऊंचे हथकंडों को अपनाने पर मजबूर हैं निजी संस्थानों के शिक्षक अच्छे परिणाम को भी प्रवेश का आधार मानते हैं। उनका कहना है कि विद्यार्थी के अभिभावक अधिकांश इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें बच्चे की दैनिक प्रगति को देखने का समय ही नहीं होता। उनके लिए परिणाम ही निर्णय होता है। शिक्षकों की इस बात से अभिभावकों के प्रति सोची समझी षड्यंत्र की बू आती है वैसे इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को प्रथम श्रेणी पास देखकर बच्चे की असली योग्यता जाने बिना ही संतुष्ट हो लेते हैं परिणाम बनाते समय ट्यूशन पढ़ने वाले छात्रों पर शिक्षकों की विशेष मेहरबानी का कारण भी समझ आता है।

अपने टूशन की आवश्यकता और महत्व को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है ट्यूशन वाले छात्रों को सौ में से 98 व 99 और 50 में से 49 तक अंक दिए जाते हैं। विद्यार्थी के लिए 95 से 98% तक अंक आना आम बात होती जा रही है हिंदी, समाजशास्त्र, इतिहास, भूगोल, राजनीति शास्त्र, नागरिक शास्त्र जैसे लेख में माने जाते टॉपिकल सब्जेक्ट विषयों में 99% अंक प्राप्त करना एक बहुत बड़ी बात प्रतीत होती है। इतना ही नहीं जो विद्यार्थी अत्यंत कमजोर पढ़ाई में हैं और किसी तरह से पास नहीं हो पा रहे हैं उन्हें डोनेशन एवं विशेष सिफारिश से उत्तीर्ण किया जा रहा है। ट्यूशन वाले शिक्षक तो घर पर मूल्यांकन कार्य करते समय ट्यूशन वाले विद्यार्थी से घर पर दोबारा कांपी/उत्तर पुस्तिका लिखवा लेते हैं। कुछ एक स्कूल ही परीक्षाओं में पूर्ण पारदर्शिता अपना रहे हैं। लेकिन ऐसे स्कूलों की संख्या बहुत कम है कुल मिलाकर अपने स्वार्थों के लिए कमजोर विद्यार्थियों पर भी होशियार विद्यार्थी की मोहर लगाकर उनके पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम तेजी से हो रहा है। पर इस ओर शिक्षा विभाग का ध्यान नहीं है।

सचिंद्र सिंह चौहान युवा नेता व प्रधान अवनींद्र सिंह चौहान का मानना है कि जब सरकारी विद्यालयों में अध्यापकों की कमी आई तथा अध्यापकों के सर पर तमाम सरकारिया काम लाद दिए गए फिर शिक्षा को तो चौपाटी होना ही है इन तमाम समस्याओं से निपटने के लिए निजी स्कूलों का प्रचलन हुआ जिससे वाकई छात्रों के भविष्य में निखार आया। चलते समय यह भी संस्थाएं एक मूल व्यवसाय में बदल गईं पहले तू मोटी फीस दीगर स्रोतों से पैसे वसूलना एवं छात्रों की वजीफा राशि हड़पना इस प्रकार से यह निजी संस्थाएं भी अब बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बनाए हुए हैं निजी विद्यालयों में जो खैरात के अंक बांटे जा रहे हैं व विद्यालयों की श्रेणी सुधारी जा रही है, यह कोई अच्छी बात तो नहीं बल्कि एक विडंबना साबित हो रही है। हालांकि यह सभी निजी संस्थाएं ऐसा करना उचित नहीं मानती पर ज्यादातर संस्थाएं ऐसा करना ही बिधिमान्य मानतीं हैं।

बताते चलें कि इस वर्ष बोर्ड परीक्षाएं जो संपन्न कराई गई हैं उनमें सरकार के द्वारा चलते पारदर्शिता के लाखों छात्रों ने परीक्षाएं देने की हिम्मत नहीं जुटाई और मुख मोड़ लिया क्योंकि ऐसे छात्रों के पास पढ़ाई का भंडार नहीं था और उन्होंने यह सोचकर कि सहारा नकल का था। सीसीटीवी कैमरे लगने के परिणाम स्वरुप नकल होना संभव नहीं है अतः उन्होंने या तो प्रवेश पत्र लेकर सेंटर पर जाना उचित ही नहीं समझा और कुछ परीक्षार्थियों ने केंद्र में तो प्रवेश ले लिया लेकिन चलते पारदर्शिता के हिम्मत पतली हो गई और परीक्षा छोड़ दी।

यह सब गुनाही का कारण उन्हीं अध्यापकों पर जाता है कि जिन्होंने इन्हें बहुत सुंदर बगैर पढ़े-लिखे पैसे के दम पर अंकों की भरमार कर सर्वोच्च स्थान देकर पास किया लेकिन उनके पास ज्ञान का भंडार ना होने के कारण परीक्षा देने की हिम्मत ने साथ नहीं दिया और इस प्रकार से लाखों छात्रों ने पेपर छोड़ कर घर बैठ गए। यहां तक कि कुछ ने तो आत्महत्याएं भी कर लीं। शिक्षा विभाग को चाहिए ऐसी निजी संस्थाओं की परख करें और जालसाजी पाए जाने पर सख्त कानूनी कार्यवाही अमल में लाई जाए।

रिपोर्ट- रामकुमार राजपूत

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