संसद का शीतकालीन अधिवेशन 26 नवम्बर से 23 दिसंबर, 2015 तक |

0
483

parliament of india

संसदीय मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीपीए) की आज बैठक आयोजित हुई जिसमें सरकारी कार्य की अनिवार्यता के लिए संसद का शीतकालीन अधिवेशन 26 नवम्बर से 23 दिसंबर, 2015 तक बुलाने की सिफारिश की गई। संसदीय कार्य मंत्री श्री एम वेंकैया नायडू ने मीडिया को यह जानकारी दी।

श्री नायडू ने यह भी जानकारी दी कि संसद के दोनों सदनों की अलग-अलग विशेष बैठकें शीतकालीन सत्र के पहले दो दिन आयोजित की जाएंगी, जिसमें डॉ. भीम रॉव अम्बेडकर के 125वीं जयंती के आयोजन के एक हिस्से के रूप में संविधान के प्रति प्रतिबद्धता पर विचार-विमर्श किया जाएगा और 26 नवम्बर 1949 को संविधान के मसौदे की स्वीकृति के उपलक्ष्य में 26 नवम्बर को संविधान दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इन दोनों दिवसों में प्रश्नकाल और शून्यकाल आयोजित नहीं किये जाएंगे।

बाद में पत्रकारों से बातचीत करते हुए श्री नायडू ने सेवा और वस्तुकर (जीएसटी) लागू करने और रियल एस्टटे नियामकों को स्थापित करने से संबंधित महत्वपूर्ण लंबित विधेयकों को पास कराने में सहयोग करने के लिए विपक्षी दलों से संसद में सहयोग करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि बिहार विधान सभा चुनाव के फैसले से राज्य में लोगों के मनोभाव का पता चलता है और इसे संसद के कामकाज में अवरोध पैदा करने के जनादेश के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कल बिहार में जनादेश के बाद मीडिया रिपोर्टों से मैं बहुत परेशान था कि अब विपक्षीय दल संसद में और अधिक एकजुट हो जाएंगे आने वाले शीतकालीन सत्र में सरकार के संसदीय एजेंडा में अवरोध उत्पन्न करेंगे। मुझे उम्मीद है कि संबंधित पार्टियों की ऐसी राय नहीं है। सभी संबंधित पक्षों को यह समझने की जरूरत है कि बिहार जनादेश सही परिप्रेक्ष्य में है। अन्य राज्यों की भांति बिहार के लोग भी विकास चाहते हैं। विकास का मतलब बुनियादी ढांचा विद्युत, सिंचाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विभिन्न क्षेत्रों में निवेश के द्वारा तेजी से आर्थिक विकास होना है।

तीव्र आर्थिक विकास प्राप्त करने के लिए हमें सही वातावरण बनाने की जरूरत है। जिसके लिए सावधानी पूर्वक विचार किये गए सुधारों की जरूरत पड़ती है। बिहार जनादेश की अन्य तरीके से व्याख्या करना बिहार राज्य की जनता के विवेक पर प्रश्न चिन्ह लगाना है। बिहार जनादेश लोगों की आकांक्षाओं का एक स्पष्ट मंतव्य है। इसकी संसद में बाधा डालने वाले जनादेश के रूप में व्याख्या नहीं की जानी चाहिए।

बिहार और देश का विकास आपस में जुड़े हैं और पारस्परिक रूप से मजबूत हैं। संसद की विचाराधीन विधायी पहल बिहार के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जिनती कि देश के अन्य राज्यों के लिए। जीएसटी और रियल एस्टेट विनियामक को लागू करने के प्रयास बहुत पहले शुरू किए गए हैं और इन्हें इनकी तार्किक परिणाम तक पहुंचाए जाने की जरूरत है। द्विपक्षीय दलों को कुछ चिंता हो सकती है सरकार उन्हें दूर करने के लिए सदैव उनके साथ बैठकर बात करना चाहती है। पिछले साल कार्यभार संभालने से ही हमारा ऐसा दृष्टिकोण रहा है।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

five × one =