कवि पं. पूरनचन्द्र मिश्र ने एक भेंट वार्ता में रामनवमी पर्व की महत्ता तथा प्रभु राम पर चर्चा की

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जालौन ब्यूरो : पिछले 50 वर्षों से रामलीला के माध्यम से संपूर्ण देश मे मर्यादा पुरूषोत्तम प्रभु श्रीराम संस्कृति का प्रचार करने वाले प्रसिद्ध लोक कलाकार, रंगमंच कर्मी व वरिष्ठ कवि पं. पूरनचन्द्र मिश्र ने एक भेंट वार्ता में रामनवमी पर्व की महत्ता तथा प्रभु राम और हमारे समाज से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।

श्री मिश्र ने प्रभु राम के संदर्भ में अपनी मान्यता स्पष्ट करते हुए कहा कि राम हमारे राष्ट्र की आत्मा हैं। लोक कल्याण के लिए समर्पित जीवन का ही नाम राम है। समाज के अत्यंत उपेक्षित, वंचित, दलित तथा सर्वहारा वर्ग के सम्मान तथा उनकी कठिनाईयों को नष्ट करने के लिए ही श्रीराम जन्म लेते हैं। आज भले ही समाज में भौतिकतावादी व्यवस्था ने अपने पैर पसार लिये हों, लेकिन लोकजीवन में जब तक राम की प्रतिष्ठा है, तभी तक हम जीवंत हैं। रामलीला के मंचन के माध्यम से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सहित समाज के हर वर्ग के लोगों द्वारा समाजिक सरोकारों, तीज-त्योहारों, उठने-बैठने, मिलने-जुलने आदि तक में राम नाम कहने की एक शाश्वत परंपरा चली आ रही है। समाज की जाति मूलक व्यवस्था मध्यकाल की देन है। रामलीला में विभिन्न पात्रों का अभिनय करने वाले कालाकारों में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि सभी जातियों के कलाकार पूर्ण आस्था तथा विश्वास के साथ पूरी तन्मयता से राम-चरित्र से जुड़े विविध कथानकों व प्रसंगो का न केवल निर्वहन करते हैं, बल्कि राम को विश्व संस्कृति का विराट पुरूष मानकर उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने का प्रयास भी करते हैं। एक प्रश्न के उत्तर में श्री मिश्र कहते हैं कि राम को राजनीति से जोड़कर केवल राजनीति करना अप्रसांगिक है। श्रीराम को के जीवन को आदर्श मानने वाला समाज का हितचिंतक होता है। रामलीला के मंचन में आई गिरावट तथा दर्शकों की मानसिकता में आए बदलाव के बारे में उन्होंने कहा कि यह आरोप निराधार है कि रामलीला मंचन में गिरावट आई है।

राम के चरित्र की विशेषता जानने की उत्सुकता में ही दर्शक भक्तिभाव के साथ रामलीला देखने आते हैं । लेकिन इतना अवश्य है कि रंगमंच की विधा बहुत तरक्की कर चुकी है। परंतु न तो प्रेक्षागृहों में प्रायः रामलीला का मंचन हो पाता है और न ही रामलीला मंचन में आधुनिक तकनीक का प्रयोग हो पाता है। फिर भी परंपरागत ढंग से हो रही रामलीला के प्रति जनमासन में काफी आकर्षण है। हालांकि आधुनिक समाज की आपाधापी के कारण समाज में फैल रहा अपराधीकरण, फैशनपरस्ती तथा अन्य विकृतियों के कारण आजकल अपेक्षाकृत कम दर्शक रामलीला देखने आते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि रामलीला के दर्शकों की घटती संख्या समाजिक वातावरण के बदलाव के कारण है, न कि रामलीला मंचन की कमी के कारण। उन्होंने कहा कि कहा कि सनातन धर्म मानवीय गुणों को स्थापित करता है जबकि समाज के दलित वर्ग को वास्तविकता से गुमराह किया जा रहा है। मनुवाद एक संस्कारित जीवन शैली का नाम है ब्राह्मण किसी जाति का नाम नहीं है। ब्राह्मण वही है जो सत्य, सदाचारी, वेदपाठी तथा पालक हो इसके साथ ही मन, वाणी व कर्म से जीवंत होकर समाज के लिए जी रहा हो।

रिपोर्ट – अनुराग श्रीवास्तव

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