प्रकाश विजय का मिशन गौरया,

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सुल्तानपुर (ब्यूरो)- प्रकृति के सवांहक घर आंगन में फुदकने वाली गौरया की यादे बचपन की सुखद स्मृतियों में सभी के मानस पटल पर जिन्दा होगी। विश्व के लगभग सभी देशो में पाया जाने वाला यह पक्षी विलुप्ति की ओर है आंगन में छत की मुण्डेर पर दाना चुगने वाली प्राचीन काल से ही हमारे उल्लास, स्वतन्त्रता, परम्परा एवं संस्कृति की भी संवाहक रही गौरया का वजूद ही आज संकट में है। गौरया के उसी वजूद को बचाने का एक भागीरथ प्रयास मध्य प्रदेश से आये जीव संरक्षक प्रकाश विजय कर रहे हैं।

अब तक वे हजार से अधिक विद्यालयों में लाखों छात्र /छात्राओं को जीव संरक्षण के लिये संकल्प दिला चुके है लोगों को निः शुल्क कृत्रिम घोसले देना, खुद घोसलों को सार्वजनिक स्थानों पर लगाना, इस कार्य के लिये औरों को प्रेरित करना उनकी दिनचर्या में शुमार है। जियो और जीने दो का मन्त्र लेकर निकले प्रकाश विजय द्वारा औरों को प्रेरित करने का यह कार्य पूर्वाचल के कई जिलों में किया जा रहा है।

निःस्वार्थ व निष्काम भाव से जीव संरक्षण के लिये प्रकाश विजय द्वारा की जा रही इस सेवा के पीछे एक घटना का हाथ है जिसका दोषी वे खुद को मान कर पश्चात स्वरुप पूरा जीवन जीवों के संरक्षण में लगानें का संकल्प लिया। इसी घटना ने उन्हे इस कार्य के लिये प्रेरित किया वर्ष 2007 की घटना है जब वह व्यापार के सिलसिले में छत्तीसगढ में थे वहां तीन दिन के लिये एक होटल में ठहरे थे उसी कमरे में गौरया का एक घोसला था उसी घोसले में दो चूजे भी थे सुबह काम के सिलसिले में निकलने की जल्दी में कमरे के फैन का स्वीच आफ करना भूल गये जब शाम को लौटे तक देखा कि पंखा के चलते ही दो पक्षी बेड पर मरे पड़े हैं और उनके चूजे घोसले में चीं चीं कर रहे है इस करुणामयी दृष्य ने उनके अन्तरमन को झकझोर कर रख दिया मृत पक्षियों को ले जाकर दफन वे किये और चूजों को कुछ दूर होटल के नौकर की मदद से दूसरी गौरया के घोसले में रख दिया अनजाने में हुए इस अपराध के लिये स्वयं को दोषी मान जीवन की शेष जिन्दगी बे जुबान पक्षियों के संरक्षण का संकल्प लिया |

प्रायश्चित का यही तरीका मान कर निकल पड़े उनका आशियाना उत्तर प्रदेश का सुलतानपुर जिला बना जहां रहकर आज अमेठी, प्रतापगढ, जौनपुर, फैजाबाद अम्बेडकर नगर सहित पूर्वाचंल के कई जिलों के इण्टर कालेज, डिग्री कालेजों में बेजुबान पक्षियों के संरक्षण के साथ साथ प्रकृति के संरक्षण के लिये भी भावी पीढ़ी को जागरुक करने का काम रहे हैं। स्कूलों में उनके सारे प्रोग्राम निःशुल्क होते है किन्ही किन्ही कालेजों में अध्यापकों द्वारा आने- जाने का खर्च मिल गया तो ठीक नहीं मिला तो भी कोई फिक्र नहीं वे अपने काम में पूरी तन्मयता के साथ लगे हैं लोगों का सैकड़ों कृत्रिम घोसले बांटे पानी पीने के बर्तन रखवाये व पक्षियों को दाना पानी देने की आम जन से भी गुहार लगाई हांलाकि इन सब कार्यों के दौरान उन्हे लोगों की हंसी का शिकार भी होना पड़ा बकौल प्रकाश विजय बड़ा मुश्किल काम था ये मेरी सुनने के पहले लोग अपनी सुनाने लगते क्या मिलेगा ? गौरया कैसे बचेगी ? अनेक सवाल यही नहीं कई कालेज तो अपने स्कूल में प्रोग्राम कराने से ही मना कर दिये लेकिन पक्षियों के प्रति उपजे प्रकाश विजय के इस प्रेम के आगे हर उलाहने उन्हे बे मानी लगे।

वेअपनी धुन में रमें रहे आज वह लोगों के बीच जीव संरक्षक के रुप में न सिर्फ अपनी पहचान बना चुके बल्कि उनका यह भागीरथ प्रयास जमीन पर फलीभूत होता दिख रहा है। कई स्थानों पर उनके द्वारा रखे कृत्रिम घोसले में गौरया वास कर रही है। मिशन गौरया के कार्यो का दायरा अब और बढ़ा है इससे जुड़े प्रकाश विजय व उनके साथियों ने जौनपुर जनपद के ग्राम रामपुर में एक वनस्पतिक नर्सरी की स्थापनी की है जिसमें फलदार/छायादार व दुर्लभ औषधीय पौधे लगाये गये हैं इसका ध्येय यही है कि मिशन गौरया कोे आर्थिक सहायता मिलती रहे जिससे मिशन गौरया लगातार काम करता रहे।

पश्चाताप के लिये शुरु हुआ मिशन गौरया आन्दोलन का रुप ले चुका है गौरया संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण पर काम करते हुए मिशन गौरया संरक्षण एवं रिसर्च सेन्टर की स्थापना हुई मेहनत का फल ही है आज दो सौ के करीब गौरया उक्त रिसर्च सेन्टर पर देखी जा सकती है।

भारत में गौरया को संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है। घरेलू गौरया पसेरा डेई परिवार की सदस्य है कुछ इसे वीवरकिच परिवार परिवार से भी संम्बन्धित मानते हैं लम्बाई में 14 से 16 सेमी वनज में 26 से 32 ग्राम होती है। एक बार प्रचनन काल में कम से कम तीन अण्डे देती हैं झुण्ड में रहना पसंद है भोजन की तलाश में आठ किमी तक उड़ जाती हैं अधिकाधिक कीटनाशकों का प्रयोग, मोबाइल टावर, ध्वनि प्रदूषण, शहरीकरण औद्योगीकरण आदि के बढ़ते प्रभाव नें इनके लुप्त होने में अहम भूमिका निभाई है।
रिपोर्ट-संतोष यादव
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