बरसाती जलभराव और जलनिकासी की व्यवस्था बदहाल

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                                                                      प्रतीकात्मक

अमेठी (ब्यूरो) बरसात का मौसम आते ही गाँवों में एक बार पुनः नर्क जैसी स्थिति पैदा होने लगी है। जलभराव व गंदगी के बीच संक्रामक बीमारियों ने पैर पसारना शुरू कर दिया है। सरकार द्वारा भले ही गाँवों की साफ-सफाई व स्वच्छता के लिये सफाई कर्मियों की तैनाती करके करोड़ों रूपये प्रतिमाह खर्च किये जा रहे हों लेकिन नब्बे फीसदी गाँव ऐसे हैं जहाँ पर कभी भी सफाई कर्मी नहीं जाते हैं और जिला व ब्लाक स्तर पर अधिकारियों की गणेश परिक्रमा लगाते रहते हैं। अधिकांश पढ़ें लिखे सफाई कर्मचारियों द्वारा अपने स्थान पर मजदूरों को तैनात कर रखा है और उन्हें प्रतिमाह अपने वेतन से उन्हें मजदूरी देते हैं। गाँवों में सफाई कर्मियों के न जाने से गाँव में गंदगी तो रहती ही है साथ ही स्कूलों की सफाई बच्चों या शिक्षकों को करनी पड़ती है। गाँवों में बनी जल निकासी नालियां सफाई न होने से बरसात शुरू होते ही बजबजाने लगी हैं और उन नालियों की गंदगी व कीड़े वातावरण को प्रदूषित करने लगे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि साफ सफाई और स्वच्छता के नाम सरकारी धन का दुरुपयोग किया जा रहा है तथा सफाई कर्मियों की तैनाती का लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा है।

                                                                    प्रतीकात्मक

सिर्फ बीस फीसदी ही सफाई कर्मी हैं जो नियमित अपने तैनात गाँव को खुद जाते और नियमित सफाई करते हैं। चालीस से पचास फीसदी ऐसे सफाई कर्मी हैं जो सिर्फ गाँव के स्कूलों की सफाई करके अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेते हैं। गाँवों में जलनिकासी के लिये जिन नालियों या नालों का निर्माण कराया जा रहा है वह दो-चार साल में ही टूटकर बेकार हो जाती हैं।यह सही है कि जितना धन विकास कार्यों के नाम पर हर साल खर्च हो रहा है उसका आधा पचास फीसदी तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। पचास फीसदी यानी आधी रकम से जो कार्य होते हैं उनकी मजबूती व गुणवत्ता का अंदाजा खुद लगाया जा सकता है। गिरते जल स्तर को यथावत बनाये रखने तथा जलभराव समस्या निदान के लिये अरबों रूपये खर्च करके तालाबों की खुदाई तो कराई गयी है किन्तु उनमें अधिकांश तालाब जल ग्रहण करने की स्थिति में नहीं हैं। बरसात का पानी इन तालाबों तक न पहुँचकर आबादी में तबाही मचाने लगता है फलस्वरूप बरसात के बावजूद इन तालाबों में पानी नहीं भर पाता है।

जलनिकासी नालियों का निर्माण भी कुछ इस तरह होता है कि उनका लेविल ऊँचा होने से बरसाती पानी जल्दी उसमें पहुँच ही नहीं पाता है और अगर पहुँच भी जाता है तो उनकी सफाई न होने से सारा पानी इधर उधर फैलने लगता है।अब तक गाँव के ही लोग जलनिकासी न होने के कारण जल भराव से तंग थे किन्तु अब शहरों में जल भराव की समस्या पैदा होने लगी है। लखनऊ राजधानी जैसे महानगरों में इस समय दस-दस फुट पानी सड़कों गलियों मुहल्लों में भरा है।शहरों में जलभराव की समस्या भी जलनिकासी न हो पाने से पैदा हुयी है।जलनिकासी इसलिए नहीं हो पा रही है क्योंकि उनकी सफाई नहीं हुयी है।जब बरसात के पहले नालियों नालों सीवरों की सफाई नहीं होगी तो बरसात में तो वह चोक हो ही जायेगें।एक तरफ तो प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री स्वच्छता अभियान चला रहे हैं वहीं दूसरी तरफ उनके ही कारकुन गंदगी व समस्या बढ़ाने में जुटे हैं। न गाँवों की नालियां साफ हो पा रही है और न ही शहरों की साफ हो पा रही है। हर साल जलभराव व गंदगी के चलते संक्रामक व अन्य बीमारियों से तमाम लोगों की जान तक चली जाती है।तरह तरह के बुखार इसी जलभराव व गंदगी के चलते पैदा होते हैं।गाँवों में जलनिकासी नालियों की रोजाना नहीं तो कम से कम महीने में एक बार तो सफाई होनी ही चाहिए जबकि शहरों में सीवरों नालों नालियों की साप्ताहिक सफाई होनी चाहिए।जो तालाब जल ग्रहण करने योग्य न हो तो उन पर खर्च की गयी रकम उसे बनाने वालों से वसूलने की व्यवस्था होनी चाहिए।इसी तरह हर स्तर पर जिम्मेदारी तय करके जलनिकासी नालियों व नालों सीवरों का निर्माण होना चाहिए।

रिपोर्ट – हरी प्रसाद यादव

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