नैमिष में प्रथम वानप्रस्थ नैमिष मठ रविन्द्र गुरु जी ने किया स्थापित

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सीतापुर (ब्यूरो) भू-लोक का सर्वरूस रूस रूस रूसश्रेष्ठ एवं तीरथ वर नैमिषारण्य में इस समय कोई भी वानप्रस्थ मठ या आश्रम नहीं है, नैमिष में वानप्रस्थ नैमिष मठ की स्थापना के साथ ही यह रिक्तता भी पूर्ण हो गई है , नैमिष तीर्थ में यह वर्तमान समय में वानप्रस्थ का प्रथम (मठ) होगा । जिसका निर्माण नैमिष तीर्थ के प्रति अगाध श्रद्धा,भक्ति ,समर्पण रखने वाले चौराशी कोसी परिक्रमा समिति नैमिषारण्य – मिश्रित के मुख्य परामर्शक व नैमिष रत्न , साहित्य सेवा रत्न , मानस भूषण से अलंकृत एवं संत ह्रदय की उपाधि से बिभूषित तथा नैमिष तीर्थ को पर्यटन स्थल घोषित कराने हेतु दो दसकों से संकल्पित एवं संघर्षरत नैमिष विकास मोर्चा के संयोजक वरिष्ठ पत्रकार , साहित्यकार , फिल्मकार रविन्द्र तिवारी “गुरु जी” ने राजघाट के निकट वान प्रस्थ नैमिष मठ की स्थापना की है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री रविन्द्र “गुरु जी” ने बताया कि नैमिष की अति पुनीत भूमि अनादि काल से ही सनातन संस्कृति को अक्षुण्य बनाने वाली भूमि रही है इसकी गरिमा, महत्ता को लिपि बद्ध करना अत्यंत कठिन है। यह साधकों को सिद्धि प्रदान करने वाली भूमि है हमने नैमिष तीर्थ की गरिमा को पुराणों एवं धार्मिक ग्रंथो में अध्यन, चिन्तन, मन्थन, शोध किया है | पुराण नैमिष से हैं नैमिष पुराणों से है । लेकिन आजादी के 70 वर्ष बाद विगत 28 जून 2017 को मेरे द्वारा वर्षों से की जा रही मांग को दृष्टिगत रखते हुए केन्द्रीय पर्यटन मंत्री महेश शर्मा के निर्देश के बाद प्रदेश पर्यटन मंत्री रीता बहुगुणा जोशी जी ने नैमिष तीर्थ को यथा शीघ्र पर्यटन स्थल घोषित किये जाने का हमें आश्वासन दिया है इसके लिए कोटिशः साधुवाद !
मानव जीवन की आधार भूमि है तीर्थ नैमिषारण्य, यहाँ से ही मानव में सभ्यता,ज्ञान , बैराग्य, सिध्दि , सनातन संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ , यही से मानव जीवन को चार आश्रमों में रहने की शिक्षा प्राप्त हुई । जिसमे निम्न आश्रम बतलाये गये है।
1 – ब्रह्मचर्य
2 – गृहस्थ
3 -वानप्रस्थ
4 -सन्यास

मानव को उपरोक्त चरों आश्रमों में रहते हुए आश्रमो की परम्पराओं के अनुसार जीवन व्यतीत कर मानव जीवन की सार्थकता सिध्दि करने का मार्ग धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है। बदलते सामाजिक परिवेश एवं कलिकाल के प्रभाव के कारण *वानप्रस्थ आश्रम में जाने के बजाय जिसे देखो संत-महन्त सन्यासी आदि बन जाता है । जो सनातन संस्कृति के लिए शुभ संकेत नहीं है ।

वानप्रस्थ का अर्थ
वानप्रस्थ का अर्थ पलायन नहीं है। इसमें जीवन में जहाँ साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा में निरत रहने का अनुशासन है, वहाँ एक अनुबन्ध यह भी है कि वन क्षेत्र में रहा जाय। आरण्यक ही उस उच्चस्तरीय जीवनचर्या के लिए उपयुक्त स्थान हो सकते हैं। घिचपिच बसे, कोलाहल भरे नगरों और गन्दे गली−कूचों में ऐसा वातावरण होता है जिसमें आध्यात्मिकता पनपती नहीं। उस घुटन भरी विषाक्तता में उच्चस्तरीय भावनाएँ पनपने नहीं पाती और किया हुआ स्वाध्याय तथा सुना हुआ सत्संग निरर्थक चला जाता है। वातावरण की श्रेष्ठता कई कारणों पर अवलम्बित है। उनमें से एक तो अनिवार्य ही है और यह है पेड़−पौधों की सघनता और निकटता। वानप्रस्थ का शब्दार्थ है—वन प्रदेश में निवास व्यवस्था। ऊँचे विचार ऐसे ही क्षेत्रों में पनपते और फलते−फूलते हैं। इस लिए ऋषि आरण्यक एवं आश्रम वन−क्षेत्रों में होते पाये गये हैं। नैमिष तीर्थ तो आरण्य में ही स्थित है इस लिए यहाँ वानप्रस्थ मठ या आश्रम का होना नितान्त आवश्यक था । इस रिक्तता को लेकर की गई वानप्रस्थ नैमिष मठ की स्थापना भविष्य में मील का पत्थर साबित होगी !

रिपोर्ट – शैलेन्द्र यादव

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