राम जन्मभूमि का सच, मंदिर के ऊपर बनाई थी मस्जिद

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आपकी बात- अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि को भगवान श्री राम की जन्मस्थली होने के कारण हिंदुओं में बहुत ही पवित्र धार्मिक स्थान माना जाता है। सन् 1528 में मुगल आक्रमण के दौरान इस इमारत को ध्वस्त कर मस्जिद बनाई गई जिसे बाबरी मस्जिद का नाम दिया गया। बाबर का मुगल सेनापति मीरबाकी ने वहां का भगवान श्रीराम के मंदिर को नष्ट कराया और हिंदुओं की आस्था के विपरीत इस स्थान पर बाबरी मस्ज्दि बनवाया था। सन् 1859 में ब्रिटिश सरकार ने इस स्थान पर लोहे के घेराबंदी लगाते हुए हिंदुओं का प्रवेश वर्जित कर दिया था। तब से लेकर आज तक यह स्थान एक पवित्र स्थल होने की जगह एक विवादित स्थान बना हुआ है।

सन् 1980 में विश्व हिंदू परिषद ने इस स्थान पर पुनः राम मंदिर बनाने की घोषणा की जिसे भारतीय जनता पार्टी का पूरा समर्थन मिला। सन् 1986 में फैजाबाद जिला जज द्वारा हिंदुओं के पुनः प्रवेश के आदेश ने इस आंदोलन को कहीं ज्यादा बल दिया। भारतीय जनता पार्टी के नेता लाल कृष्ण आडवानी ने सितंबर 1990 में मंदिर निर्माण हेतु रथ यात्रा शुरू की थी परंतु उन्हें बिहार में ही गिरफ्तार कर लिया गया। इस घटना से आक्रोशित लाखों कारसेवक अयोध्या पहुंचे और 6 दिसंबर 1992 को पुलिस प्रशासन के प्रतिरोध के बावजूद कारसेवकों ने मस्जिद को ध्वस्त कर उस स्थान पर भगवान श्री राम के मूर्ति की स्थापना कर दी। जवाब में सरकार ने पुलिस को कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया जिसमें 2000 से ज्यादा कारसेवक मारे गए। सरकार ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों पर चलते हुए सभी बड़े हिंदू नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। इससे देश का माहौल ज्यादा खराब हो गया था। केंद्र में भारतीय जनता पार्टी ने वी पी सिंह ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और चुनाव की मांग कर दी। जनता ने भारतीय जनता पार्टी का पूरा समर्थन किया और ना सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की सीटों में इजाफा हुआ बल्कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार भी बन गई। लेकिन राम जन्मभूमि मुद्दे पर विवाद बना रहा और यह कांग्रेसी सरकारों और वामपंथी इतिहासकारों की देन है कि सबकी रक्षा करने वाले भगवान अपनी ही जन्मभूमि पर अपना अस्तित्व तलाश कर रहे हैं तथा तम्बू में रहने के लिए विवश हैं।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश से सरकार ने पुरातत्व विशेषज्ञों की एक टीम भेजकर उस स्थान की खुदाई भी कराई जिससे मंदिर या मस्जिद होने का प्रमाण मिल सके। जांच कमेटी की रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई जिसमें कांग्रेसी सरकार ने राम जन्मभूमि स्थान पर किसी भी मंदिर होने के प्रमाण को नकार दिया। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक फैसला आया जिसने इस स्थान पर चल रहे विवाद को तीन भागों में बांटकर समाधान तो कर दिया था परन्तु इसे कुछ पक्षकारों ने नहीं     माना और और बढ़ा दिया। आज यह मामला उच्चतम न्यायालय में लंबित है।

माननीय उच्चतम न्यायालय ने मन्दिर मस्जिद विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने का नवीनतम निर्देश जारी किया है। जहां हिन्दू संगठनों ने इस सकारात्मक पहल का स्वागत किया है। कुछ मुस्लिम संगठन भी इसे आपसी रजा मन्दी से हल किये जाने के पक्ष में हैं, परन्तु कुछ कट्टर पंथी लोग इसका समाधान चाहते ही नहीं हैं और न्यायालय के निर्णय को ही प्रमुखता दे रहें हैं। इतना ही नहीं वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या के मन्दिर मस्जिद मुद्दे पर इलाहाबाद हाई कोर्ट को गुमराह करने की पहले भी कोशिश की थी। अदालत द्वारा निर्णय दिए जाने के बाद भी इरफान हबीब और उनकी टीम सच मानने को तैयार नहीं रहे। अयोध्या मुद्दे पर राजनेताओं से कृतकत्य होने के चक्कर में इतिहासकारों ने इस स्पष्ट विषय को और विवादित बना दिया है। 6 दिसंबर को ढांचा गिरने के उपरांत जब न्यायालय के संरक्षण में खुदाई हुई, उसमें मंदिरों का मलवा, खंडित मूर्तियां एवं फर्श के अवशेष निकले थे। लेकिन तथाकथित इतिहासकारों ने तब भी विवाद को सुलझने नहीं दिया था।

हाल ही में जाने माने पुरातत्व विशेषज्ञ डा. के के मोहम्मद, जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के उत्तर प्रदेश के पूर्व निदेशक रह चुके हैं, ने मलयालम भाषा में प्रकाशित अपनी आत्मकथा “जानएन्ना भारतीयन” में यह बात स्वीकार की है कि 1976-77 में हुई राम जन्मभूमि स्थल पर हुई पुरातत्व विभाग की खुदाई में उस स्थान पर मंदिर होने के पर्याप्त प्रमाण मिले थे और उनकी टीम ने ये प्रमाण केंद्र की कांग्रेस सरकार को सौंपे भी थे। लेकिन कांग्रेस सरकार ने इन प्रमाणों को नजरअंदाज कर दिया और सरकार के मुताबिक रिपोर्ट बनाने को कहा। डा. मोहम्मद उस टीम का हिस्सा थे जिसका नेतृत्व प्रोफेसर बी बी लाल कर रहे थे। प्रोफेसर लाल तब भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक थे। वर्षों बाद भी अयोध्या मामले का हल नहीं निकलने के लिए डॉ. केके मुहम्मद ने वामपंथी इतिहासकारों को जिम्मेदार ठहराया है। वामपंथियों ने इस मसले का समाधान नहीं होने दिया। वामपंथी इतिहासकारों ने इस मुद्दे को लेकर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेताओं के साथ मिलकर देश के मुस्लिमों को गुमराह किया। इन लोगों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट तक को भी गुमराह करने की कोशिश की थी।

उनकी पुस्तक में यह बताया गया है कि एएसआइ को विवादित ढांचे में मिले 14 स्तंभों पर गुंबद खुदे हुए थे। ये 11वीं व 12वीं शताब्दी के मंदिरों में पाए जाने वाले कलश/ गुंबदों के समान थे। कलश/गुंबद ऐसे नौ प्रतीकों में एक हैं, जो मंदिर में होते हैं। अन्य कई पुरातात्विक साक्ष्य भी यह गवाही दे रहे हैं कि अयोध्या में मंदिर के ऊपर मस्जिद बनाई गई। एएसआइ ने पहली बार 1976-77 में प्रो. बीबी लाल के नेतृत्व में विवादित ढांचे का निरीक्षण किया था। फिर 2002-2003 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर विवादित ढांचा वाले स्थान के आसपास उत्खनन कराया। तब 50 के करीब वैसे चबूतरे मिले जैसे विवादित ढांचे के अंदर थे। इस उत्खनन में कई मुस्लिम अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल किए गए थे। उत्खनन में मंदिरों के ऊपर बने कलश के नीचे लगाया जाने वाला आमलक (गोल पत्थर) मिला। आमलक केवल मंदिर में ही लगाया जाता है। इसी प्रकार जलाभिषेक के बाद जल का प्रवाह करने वाली मगरप्रणाली (मगरमच्छ के आकार वाली) भी मिली।

डॉ. मुहम्मद ने दावा किया है कि 1976-77 के दौरान एएसआइ के तत्कालीन महानिदेशक प्रो. बीबी लाल के नेतृत्व में पुरातत्ववेत्ताओं के दल द्वारा अयोध्या में की गई खोदाई के दौरान विवादित स्थल से हिंदू मंदिर के अवशेष मिले थे। डॉ. मुहम्मद भी उस दल में शामिल थे। आत्मकथा में वामपंथी विचारकों और अन्य के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों को भी उजागर किया गया है। मुहम्मद ने बताया कि इरफान हबीब (भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के तत्कालीन चेयरमैन) के नेतृत्व में कार्रवाई समिति की कई बैठकें हुईं थीं। उन्होंने कहा, ‘अयोध्या मामला बहुत पहले हल हो जाता, यदि मुस्लिम बुद्धिजीवी, वामपंथी इतिहासकारों के ब्रेन-वाश का शिकार न हुए होते। रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा और एस गोपाल सहित इतिहासकारों के एक वर्ग ने तर्क दिया था कि 19वीं शताब्दी से पहले मंदिर की तोडफोड़ और अयोध्या में बौद्ध जैन केंद्र होने का कोई जिक्र नहीं है। इसका इतिहासकार इरफान हबीब, आरएस शर्मा, डीएन झा, सूरज बेन और अख्तर अली ने भी समर्थन किया था। ये वे लोग थे, जिन्होंने चरमपंथी मुस्लिम समूहों के साथ मिलकर अयोध्या मामले का एक सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने के प्रयासों को पटरी से उतार दिया। इनमें से कइयों ने सरकारी बैठकों में हिस्सा लिया और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का खुला समर्थन किया।

डॉ. मुहम्मद के इस प्रकार के स्पष्ट मत व्यक्त करने पर तत्कालीन मुस्लिम संगठन ने उन पर गालियों की बौछारें लगायी थी। उन्हें काफिर तक कहा गया उनके वहिष्कार की भी बातें सुनने को मिली थीं। परन्तु डा. मोहम्मद इससे विचलित हुए बिना अपने सच के मिशन पर तब भी अडिग थे और आज भी अडिग हैं। वह कट्टरंथी मुस्लिम मोहल्ले में रहने के बावजूद अपनी जान व सम्पत्ति की लेशमात्र भी चिंता नहीं की। सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाली सरकार को उनके इस अदम्य साहस के लिए सम्मानित किया जाना चाहिए तथा इस विवाद की समस्या के समाधन के लिए उनका सहयोग लेकर स्थाई निदान खोजवाना चाहिए तथा उभय पक्षों को सत्यता से परिचित कराने में उनकी विशेषज्ञता का उपयोग करना चाहिए।

रिपोर्ट- डा. राधेश्याम द्विवेदी

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