चाहे तो प्रधानमंत्री सेकुलरिज्म शब्द मिटा सकते हैं, यह हमारे ख़ून में है !

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झारखण्ड(ब्यूरो)-
सेकुलरिज्म सभी भारतीयों के रगों में खून की तरह दौड़ रहा है, इसिलिये संविधान विशेषज्ञों ने सेकुलरिज्म की कोई भी लकीर संविधान में खींचने की कोई आवश्यकता नही समझी| जब इंदिरा गांधी राजनीतिक हैसियत से मजबूत थी, तब उन्होने संविधान में, सेकुलरिज्म की रेखा खींच दी। उस समय संविधान में इस तरह के छेड़छाड़ का विपछी दलों ने कोई विरोध नही किया| कारण कि तब विरोधी दल, इंदिरा गांधी के सम्मुख काफी कमजोर थे।

आज नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक हैसियत लाजवाब है। वे संविधान से सेकुलरिज्म की उस रेखा को मिटा सकते हैं।
हालाँकि इसका सेकुलर पार्टियों द्वारा जबरदस्त विरोध किया जा सकता है। पर उसका जवाब यह कह कर दिया जा सकता है कि संविधान की मूल भावना के साथ तब के प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी छेड़ छाड़ कर सकती हैं तो आज के प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी क्यों नहीं? हालाँकि उसके बाद कांग्रेस पार्टी द्वारा कई बार संविधान में बदलाव किये गए। इन बदलावो पर कहा जा सकता है कि वे बदलाव समय की मांग थे और संविधान से सेकुलरिज्म शब्द मिटाना आज के समय की मांग है| 2014 में विरोधी दल तो नरेंद्र मोदी के प्रधानमन्त्री पद का भी विरोध कर रहे थे और आज यूपी के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ का भी कर रहे हैं।

विपछी दलों का कार्य केवल नरेंद्र मोदी का विरोध मात्र रह गया गया है, पर मोदी जी का कार्य शैली दर्शाता है कि वे अपने मूल एजेंडे से डिगने वाले नही हैं। चाहे मामला तीन तलाक का हो, कॉमन सिविल कोड का हो, धारा 370 का हो, जनस्नख्या नियंत्रण कानून का हो, या ताजा मामला संविधान से सेकुलरिज्म शब्द हटाने का हो। विरोधी दल चाहे जितना विरोध कर लें, प्रधानमन्त्री अपने इन सभी एजेंडे को सफलता पूर्वक लागू करने के मूड में हैं।

रिपोर्ट- दिलीप कुमार शर्मा
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