धर्म

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dharmअक्सर लोग कहते रहते हैं यह मेरा धर्म हैं, यह मेरा धर्म लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा हैं कि वास्तव में उसका धर्म क्या हैं …? वास्तव में उसका धर्म क्या कहता हैं …? क्या संदेश देता हैं उसका धर्म …? अगर आप गौर से अपने आस-पास रह रहे सभी अलग–अलग धर्म के मानने वालों के ब्यक्तिगत जीवन को देखें और पूरे खुले मन से इसका अनुभव करें, बिना कुछ किसी से कहें या फिर अपने आप से पूंछे तो आप स्वयं पायेंगे कि ज्यादातर लोग सिर्फ धर्म का प्रयोग अपने निजी फायदे के लिए कर रहे हैं I कोई राजनैतिक फायदा पाने के लिए तो कोई सामाजिक तो कोई आर्थिक विभिन्न प्रकार के अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति का महज एक साधन बन कर रहा गया है धर्म I

दुनिया के सभी धर्मों को अगर एक साथ रखा जाय और उनका एक निचोड़ (रस) निकाला जाय या फिर यूँ कहें तो सभी धर्मों के सार (यानि मूल अर्थ) को अगर समझा जाय तो सभी का कहने का तात्पर्य और लक्ष्य एक ही हैं I सभी धर्म ईश्वर प्राप्ति की बात कहते हैं, सभी धर्मों के अनुसार “अगर आप हमारे द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलेंगे तो आप निश्चय ही ईश्वर तक पहुँच पायेंगे” I यानिकि सभी धर्मों की जितनी भी पुस्तकें या फिर विचारों का संग्रह जो आज हमारे बीच उपलब्ध हैं उन सभी में केवल रास्ते बताये गए हैं ईश्वर प्राप्ति के मानव कल्याण के, सामाजिक उत्थान के इसके अलावा तो शायद और कुछ भी नहीं है I

हर धर्म आडम्बरों से दूर रहने की सलाह देता हैं, हर धर्म में साफ़ साफ़ यह लिखा गया हैं कि आप ऐसा कोई भी कार्य न करें जिससे किसी भी ब्यक्ति या फिर जीव मात्र को किसी भी प्रकार से कष्ट पहुंचे, आप ऐसा कभी भी कोई भी शब्द न बोलें जिससे किसी ब्यक्ति के मन या फिर आत्मा को ठेस पहुंचे, बिना किसी उचित कारण के आपको किसी भी ब्यक्ति को दंड भी नहीं देना चाहिए और अगर आपके लिए दंड देना अनिवार्य हो ही जाता हैं तो वह दंड ऐसा होना चाहिए जिससे ब्यक्ति के जीवन में उसके चरित्र में सुधार आये न कि उसका जीवन नष्ट हो जाय I हाँ यह भी जरूरी होता हैं कि कुछ विशेष परिस्थितियों किसी को म्रत्यु दंड भी दिया जा सकता हैं लेकिन यह एक अंतिम कारण होना चाहिए न कि पहला या फिर मध्य का I

अगर कोई आपके साथ कुछ गलत कर देता हैं जान बूझकर या फिर अनजाने में उससे यह हो जाता हैं तो आपको धर्म के अनुसार उसे क्षमा कर देना चाहिए, अगर अगली बार भी अनजाने में उससे फिर से उसी प्रकार की गलती की पुनरावृत्ति हो जाती हैं तो भी आपको उसे दंड नहीं देना चाहिए, लेकिन अगर जानबूझकर कोई ब्यक्ति बार बार उसी गलती को दोहराता हैं तो आपको उसे दंड देना चाहिए लेकिन दंड देते समय आपको एक बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि उसकी गलती किस प्रकार की हैं और उसी को विचार करके ही दंड का प्रावधान होना चाहिए I

दुनिया का कोई भी धर्म कभी भी किसी भी निर्दोष, बालक या महिला को जिनका कोई अपराध न हो उन्हें दंड देने की आज्ञा नहीं देता है I

आजकल समाज में धर्म के नाम पर केवल अपनी प्रभुता और वर्चस्व को स्थापित किया जा रहा है I बड़े-बड़े तथकथित समाज के ठेकेदार जो लोगों को अभी तक विभिन्न प्रकार के वादों और लुभवानी वाणी से नहीं बाँट सके उन्होंने अब धर्म का झंडा अपने हाथ में उठा लिया है और उसी झंडे से अब देश को हांकने का प्रयास कर रहे है I 1892-1893 में कभी स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि, “भारत वर्ष में धर्म का नहीं अपितु धन का आभाव है I” उन्होंने अमेरिका में रहने वालों से यह अपील की थी कि भारत की यदि गरीबी को दूर कर दिया जाय तो भारत वैश्विक मंच पर दुनिया का नेत्रत्त्व धर्म के मामले में बहुत आसानी से कर सकता है I जब उन्होंने यह कहा था तब शायद उन्होंने आज के भारत की कल्पना नहीं की होगी I

धर्म के वास्तविक अर्थ आज समाज से बिलकुल समाप्त होते जा रहे है I यदि आज कुछ समाज में बचा हुआ है तो वह केवल लोगों के ब्याक्तिगत स्वार्थों में धर्म I धर्म के नाम पर जब तक लोगों को बाटा जाता रहेगा तब तक दुनिया में हमेशा ही मानव-मानव का दुश्मन बना रहेगा I अगर समाज में शांति स्थापित करनी है तो हमें सब कुछ भूल कर धर्म के वास्तविक अर्थों को समझते हुए बाटने की नहीं बल्कि जोड़ने और जुड़ने की नीति को अपनाना पड़ेगा I

***धर्मेन्द्र सिंह ***

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