शोधकर्ताओं ने की भारतीय गौरव इतिहास की बात

0
113

मिर्जापुर(ब्यूरो)- हिंदी गौरव डॉ. भवदेव पाण्डेय शोध संस्थान में ‘विक्रम संवत ही भारतीय नववर्ष’ विषय पर शोध-छात्रों ने गहन विमर्श किया तथा कहा कि राजा विक्रमादित्य ने वसन्त माह को नव-वर्ष न सिर्फ आध्यात्मिक कारणों से बल्कि पूरी तरह से वैज्ञानिक कारणों से माना । कालांतर में भारत पर विदेशी सत्ता के बढ़ते प्रभावों से इसमें बदलाव हो गया । इसके पीछे विदेशी सत्ता भारत की बौद्धिक क्षमता को नकारना भी था ।

गोष्ठी में श्रीमद्भगवतगीताके 18वें अध्यायके 47वें श्लोक ‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वान्नाप्नोति किल्बिषम्’ का उद्धरण देते हुए कहा गया कि इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है कि ‘ हे कुंतीपुत्र ! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि धुएँ से अग्नि की भाति सभी कर्म किसी न किसी दोष से युक्त है ।’
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए संस्थान के संयोजक सलिल पाण्डेय ने कहा कि भारतीय नवसंवत्सर राजा विक्रमादित्य ने सनातन संस्कृति के प्राविधानों को ध्यान में रखते हुए किया था। कृषि आधारित समाज के कारण फसलों के अनुसार इसे नया माह माना| चैत्र का महीना कृषि के लिहाज से सर्वाधिक सुसम्पन्न माह है। इस माह में जौ, गेहूँ के साथ दलहन और तिलहन किसान अपने घर लाते हैं । अनाज में गेहूं अनाजों का राजा माना जाता है । इसे कनकराज भी कहते हैं । समय के लिए यांत्रिक घड़ी न होने से सूर्य किरणों के अलावा हवाओं, बादलों से फसल के लिए किसान उपयुक्त समय निकालते थे । तिथि, नक्षत्रों के हिसाब से बीजारोपण, सिंचाई की जाती थी जो अभी तक प्रचलित भी है । सरकारी स्तर पर भी इस पर गौर किया जाता है । भारत के ऋषि मुनियों के साथ किसान भी प्रकृति से तादाम्य एवं संबन्ध रखते थे । इसको देखते हुए ही विक्रमादित्य ने चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उक्त गरिमा प्रदान की । नवसंवत्सर के 3 दिन पूर्व चैत्र कृष्ण पक्ष जो वर्ष का अंतिम सोपान है त्रयोदशी को ऋषियों द्वारा ‘वारुणी पर्व’ मनाने की व्यवस्था की गयी । इस दिन हिमालय के पिघलने पर अमृतस्वरूप जल निकलता है । तरलता की शुरुआत का यह अवसर है । अभी तक हिमालय शीतकाल में ठोस रूप में होता है जबकि दाता के भाव में इस समय शुरू होता है । हमारी संस्कृति दान को वरीयता देती है । शरीर में भी रक्त या अन्य रसायनों का प्रवाह कम होने लगे और क्लॉटिंग होने लगे तो शरीर अस्वस्थ होने लगता है ।

शरीर के रसायनों की भाँति हिमालय के इस रस (रसायन) की महत्ता की वजह से वारुणी पर्व पर तीर्थ नदियों में स्नान को करोड़ो सूर्यग्रहण में स्नान की तरह लाभप्रद बताया गया है । सूर्य किरणों से नदियों के जल में औषधीय तत्व बढ़ने को लेकर पिछले कुम्भ मेले में विदेशी वैज्ञानिकों ने रिसर्च किए और रिपोर्ट दी कि शाही स्नान के बाद गंगा जल में प्रदूषण कम हुए । धर्म गर्न्थो में भी उल्लेख है कि गंगा सन्तों, सात्विक लोगों के स्पर्श से शुद्ध होती हैं । इस तरह के अन्य कई शोध पश्चिमी देशों में अभी हाल में हुए है ।

शोध छात्र भारत ज्योतिदास, वृजेश जायसवाल, विनय यादव, साकेत पाण्डेय, अंकित हिन्दुस्तानी, बादल मोदनवाल ने कहा कि मानव शरीर भी ब्रह्माण्ड का एक अंश है । यत् पिण्डे तत् ब्रह्मांडे । ऊनी वस्त्रों से तन ढक कर जो ऊर्जा संग्रहित हुई उसका निस्तारण प्रकृति में इस वसन्त के मौसम में होता है । मनुष्य का दायित्व है कि वह जिन 5 महाभूतों से निरन्तर अपनी आवश्यकताएं पूरी करता है वह एक कर्ज है और उस कर्ज मुक्ति के लिए इन तत्वों की सुरक्षा करे । वसुधैव कुटुम्बकं के अंतर्गत नदी-नाले, पर्वत, पेड़- पौधे, खेत-खलिहान, पशु-पक्षी सब आते है ।
शोध छात्राएं रूपा श्रीवास्तव, छाया सिंह, लता आदि ने कहा कि भगवान कृष्ण ने ‘मासानाम मार्गशीर्षो अहम्, ऋतुनां कुसुमाकर:’ ऋतुओं में मैं वसन्त हूँ कहा । धर्मनिष्ठ विक्रमादित्य ने देश-काल परिस्थिति के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष के स्वागत में यह कदम उठाया । अपने धर्म में ही जीना और मरना यह भगवान कृष्ण का उदघोष इस बात का सूचक है कि केवल बाह्य आकर्षण में बिना अपनी परिस्थिति एवं अस्वश्यक्ताओं के हम नकलगामी होंगे तो उसका खामियाजा उठाना पड़ेगा ।

इन कारणों से भी राजा विक्रमादित्य का भारतीय परिवेश को ध्यान में रखकर नव संवत्सर की स्थापना उचित है । इसी अवसर पर भगवान राम का 9वें दिन जन्म का आशय अनुकूल वातावरण में आनन्द रूपी श्री राम के जन्म का भाव मन में पैदा होकर रहेगा । अंत में धन्यवाद अभिषेक सिंह ने देते हुए सरकार से शासकीय स्तर पर स्वीकृति की मांग की ।

रिपोर्ट- अंशू मिश्रा
हिंदी समाचार- से जुड़े अन्य अपडेट लगातार प्राप्त करने के लिए लाइक करें हमारा फेसबुक पेज और आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं |

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here