पदोन्नति में आरक्षण के विरुद्ध सवर्णों का एलान-ए-जंग

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पदोन्नति में आरक्षण के विरुद्ध सवर्णों का एलान-ए-जंग – अगर मैं ऐसा लिख रहा हूँ तो यह आवश्यक नहीं है कि आप इससे सहमत हो, ऐसा भी हो सकता है कि ऐसा नहीं है लेकिन जहाँ से मैं इस दुनिया को देख रहा हूँ खासकर हिन्दुस्तान के परिपेक्ष्य में जहाँ आरक्षण महज वोट बैंक की राजनीति के सिवा कुछ और बचा ही नहीं है, वहां या तो यह शुरू हो चुका है या फिर जल्द ही शुरू होने वाला है।

अभी कुछ दिन पहले ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने एनआरसी के मामले पर अपना विरोध जताते हुए भारत में गृहयुद्ध की बात कही थी, हालाँकि वह अपनी बात को मजबूत करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर पायी जिसके बाद में उन्हें अपने शब्द वापस लेने पड़े और उन्हें समूचे राष्ट्र के समक्ष शर्मिंदा होना पड़ा। यह बात और है कि आजकल के राजनेता दिन भर शर्मिंदा हो तब भी उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।

लेकिन ऐसा वास्तव में हो सकता है। आपके दिमाग में सवाल आ सकता है कि क्या बकवास बात है यह, यह आदमी पागल बना रहा है लेकिन जरा ठन्डे दिमाग से सोचिये आरक्षण की व्यवस्था क्यों की गयी थी ? जहाँ तक मेरी समझ कहती है इसीलिए की गयी थी समाज के हर वर्ग को बराबरी के अधिकार दिए जाएँ, उनके मध्य समानता पैदा की जाय।

परन्तु आज क्या हो रहा है, अगर वास्तविकता के धरातल पर हम इसे परखने की कोशिश करें तो पता चलता है कि जिन लोगों को आरक्षण की आवश्यकता नहीं है वह तो लाभ ले रहे है लेकिन अगर हम इसे बारीकी से देखें की एससी और एसटी में ही जिन लोगों को इसकी आवश्यकता है उन बेचारों को इसकी जानकारी ही नहीं है। एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते है –

मान लीजिये कि मैं कोई एस.सी. या एस.टी. कैंडिडेट हूँ, व्यक्ति भी समझ सकते है आप, कोई भर्ती निकली और मुझे आरक्षण की जानकारी थी मैंने फ़ार्म भर दिया और मुझे आरक्षण के तहत नौकरी मिल गयी। अब मेरा विवाह नहीं हुआ था तो हो गया और हो गया था तो जिंदगी आगे बढ़ी और मैं सरकारी नौकरी करने लगा। आगे बढे बच्चे हुए और मैंने उन्हें चूँकि मैं स्वयं मुख्य धारा से जुड़ा हुआ हूँ तो उन्हें भी मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास करूँगा और उन्हें पढ़ाऊंगा-लिखाउंगा जितना मैं कर सकता हूँ। बच्चे शहरों में मेरे साथ ही रहने लगे, अच्छे स्कूलों में पढ़ने लगे बड़े हो गए अब उन्हें भी नौकरी की जरूरत है। अब मैं फिर से फार्म भरूंगा और उन्हें फिर से आरक्षण के तहत नौकरी लेने की बात कहूंगा क्योंकि मैं उसे अपना अधिकार समझता हूँ, जरूरत नहीं।

अब आप समझ गए होंगे, लोग आज आरक्षण को जरूरत नहीं अपना अधिकार समझने लगे है। अब हल्की सी नजर आप उस व्यक्ति के जीवन पर डाल लीजिये जिसे आपके साथ ही नौकरी नहीं मिली थी, उसमे सभी वर्गों खासकर सामान्य और आप वाले दोनों है। आप को नौकरी मिली तो आप गाँव से शहर पहुँच गए आपकी जीवन शैली भी बड़ी हो गयी लेकिन आपके ही साथ रहने वाले वही आपके दोस्त जो जनरल और एस.सी., एसटी. के है दोनों गाँव में ही रहते है उनके हालात आज भी वैसे ही है। अब बताइये आरक्षण की जरूरत किसे है आपको या उसे। खैर आज मुद्दा यह है ही नहीं।

मुद्दा है प्रमोशन में आरक्षण का, आरक्षण से नौकरी तक तो समझ में आता है कि ठीक है सामाजिक स्थिति में परिवर्तन के लिए आरक्षण से नौकरी दी जानी चाहिए, जिससे समाज के अन्य वर्ग के लोगों को भी मुख्य धारा से जुड़ने में मदद मिले, लेकिन जब समान ट्रेनिंग मिल रही है और आप वयस्क भी है, समझदार है, सामान शिक्षा भी दी जा रही है और समान काम भी कर रहे है तो प्रमोशन कार्य के अनुसार होना चाहिए न कि जाति के आधार पर। स्वयं विचार करें।

अरे भाई इस तरह से तो अगर कोई एस.सी. या फिर एस.टी. के यहाँ पर जन्म ले ले तो बस उसकी तो चांदी ही चांदी है थोड़ा सा पढ़ लो, क्योंकि आरक्षण से नौकरी तो मिल ही जायेगी, उसके बाद ऑफिस में काम करो या न करो, मजे करो काम में भी क्योंकि प्रमोशन भी मिल जाएगा क्यों, क्योंकि आपके पिता जी के नाम के नीचे कैटेगरी में एससी या फिर एसटी लिखा हुआ होगा। अजीब बात है, समझ में ही नहीं आता है कि समरसता और बराबरी की बात करने वाले लोग इस तरह की व्यवस्थाओं के खिलाफ क्यों नहीं कुछ बोल पाते है।

इसी तरह की व्यवस्थायें या फिर कहें कि इस तरह की घटिया राजनैतिक चालें ही आम जनमानस के मध्य द्वेष की भावना का बीजरोपण करती है। जिसका खामियाजा आगे चलकर समूचे राष्ट्र को भुगतना पड़ता है। अगर आपको लगता है कि वास्तव में ऐसा हो रहा है तो मेरे ख्याल से अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा है, अगर सामूहिक रूप से, एक जुट होकर इसका विरोध किया जाय तो चीजों में सुधार हो सकता है। जो सरकार वर्तमान में सत्ता पर आसीन है उसने नारा दिया था सबका साथ सबका विकास, लेकिन आज जब धरातल पर हम देख रहे है तो सबका साथ तो सरकार चाह रही है लेकिन विकास पर ध्यान केवल एससी और एसटी के ही है।

मैं यह नहीं कहता हूँ कि जो मैं लिख रहा हूँ या फिर कह रहा हूँ सच यही है, सच इससे भी खतरनाक हो सकता है और इससे कहीं बेहतर भी, यह मेरे निजी विचार है, आपसे हम यह आशा करते है कि आप हमें कमेंट करके अवश्य बताएँगे कि आपको यह आर्टिकल कैसा लगा और इस तरह का कोई भी लेख अगर आप प्रकाशित करवाना चाहते है या फिर आप कोई सुझाव देना चाहते है तो कृपया मुझे 9871030408 पर व्हाट्स एप करें या फिर आप हमें कॉल भी कर सकते है।

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