रोज़े का मतलब है बुराई को छोड़ अच्छाई को अपनाना

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जालौन(ब्युरो)- रमजान महीने को लेकर मुस्लिम समुदाय के लोगों में अभी से खासा उत्साह देखने को मिलने लगा है। आगामी 27 या 28 मई से रमजान का महीना शुरू होने जा रहा है। बुराई से तौबा कर अल्लाह की इबादत करने का यह खास महीना मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है।

रमजान के बारे में मौलाना सुल्तान साहब बताते हैं कि रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है। रमजान के महीने का रोजा कोई इंसान बिना किसी वाजिब वजह के छोड़ दे तो वह पूरी जिंदगी रोजा रखकर भी उसका सबाव नहीं पा सकता। रोजे का मतलब होता है तकवा। तकवा यानी अपने आप को बुराइयों से बचाते हुए भलाई को अपनाना। इंसान रोजा रखकर ऐसा बनने की कोशिश करता है, जैसा उसका रब चाहता है। रमजान का महीना बेहद पाक व रहमतों वाला होता है। इस महीने में की जाने वाली इबादत का सबाव और दूसरे महीनों में की जाने वाली इबादत से 70 गुना ज्यादा मिलता है।

तकिया मस्जिद के इमाम मौलाना साबिर साहब कहते हैं कि रोजा केवल भूखे, प्यासे रहने का नाम नहीं है। रोजा इंसान के जिस्म के हर हिस्से का होता है। जैसे आँख का रोजा मतलब गलत मत देखो, कान का रोजा, गलत मत सुनो, मुँह का रोजा मतलब गलत मत कहो, हाथ का रोजा यानी गलत काम न करो, पैर का रोजा यानी गलत जगह मत जाओ यानी आपके पैर हमेशा अच्छाई की ओर ही बढ़ें। रोजे के दौरान जो बात सबसे खास होती है कि रोजे के दौरान रोजेदार को कोई बुरा काम ना तो खुद करना चाहिए साथ ही अगर कोई बुरा काम करता दिखे तो उसे भी जहां तक हो सके बुरे काम को करने से रोकना चाहिए। रोजा रखने वाले इंसान को हमेशा बुराई से तौबा करते रहना चाहिए।

अशफाक राईन बताते हैं कि रमजान के महीने में ही पाक कुरआन शरीफ आसमान से उतारी गई थी। इसीलिए रमजान का महीना कुरआन का महीना भी कहा जाता है। रमजान की रात में एक विशेष नमाज होती है, जिसे तराबीह कहते हैं। यह नमाज रात में इशां की नमाज कें बाद पढ़ी जाती है। रमजान के महीने में तराबीह की नमाज के दौरान पूरा कुरआन पढ़ने या सुनने की अजीम बरकतें हैं। रमजान के महीने में अल्लाह बन्दों के लिए रहमतों के दरवाजे खोल देता है।

रिपोर्ट- अनुराग श्रीवास्तव

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