ये साहित्य का सम्मान हो रहा है या अपमान ??

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surekha sainiदादरी कांड के बाद लेखकों ने साहित्य पुरस्कार लौटाने का जो स्वांग रचा है वो आज से पहले कभी नही रचा गया । इनका सरकार पर असहिष्णुता का आरोप है। इनके अनुसार आजादी के बाद पहली बार असहिष्णुता अपने चरम पर है। जैसे दादरी के बिसाहडा गांव की घटना को बिना सोचे समझे अंजाम दिया गया ठीक उसी प्रकार नयनतारा सहगल ने साहित्य का पुरस्कार लौटाने का फैंसला किया और बाकी के लेखक भेडचाल मे बिना सोचे समझे शामिल हो गये।

अब ये लेखक देश दुनिया को ये संदेश दे रहे हैं कि भाजपा सरकार सिर्फ हिन्दुओ की संरक्षक है। लेखकों का यह रवैया समझ से बाहर है कि आज तक उन्हे देश की किसी भी घटना ने विचलित क्यों नही किया जबकि पहले भी अनेक शर्मनाक घटनायें हुई हैं। दादरी घटना की चर्चा दुनियाभर मे हो गई। शर्मनाक घटना है,  ये सच है परन्तु एक घटना 1 सितंबर को केरल के कन्नूर जिले के कथिरूर गांव मे भी हुई थी। इस गांव मे इस दिन मरे हुये कुत्ते बिजली के खंभो मे लटके पाये गये ।

ये इसलिये हुआ क्योंकि इसी दिन एक वर्ष पहले आर एस एस के नेता की इसी खंभे के पास माकपा समर्थकों ने हत्या कर दी थी। क्या ये हत्या  शर्मनाक नही थी? क्या मरे हुये कुत्तों से स्वर्गीय नेता की तुलना कर प्रदर्शन करना शर्मनाक नही था ? राजनीतिक दल अपने अपने समर्थकों की ऐसी शर्मनाक करतूतों को कभी गलत नहीं बताते बल्कि उनके बचाव मे उतर आते हैं। लेखकों का आत्म सम्मान ऐसी घटनाओ पर विचलित क्यूॅ नही हुआ। ऐसी एक नही अनेक घटनाये कोंग्रेस के शासनकाल में हुई हैं तब कहाॅ गये थे ये साहित्यकार ? देश का दुर्भाग्य है कि लेखक और साहित्यकार भी नेताओ जैसा परिचय दे रहे हैं। कलमकार समाज को आईना दिखाते है मगर जब कलमकार ही रास्ता भटक जाये तो इन्हे कौन आईना दिखाये ???
—-सुरेखा सैनी अधिवक्ता

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