सैम भी न बच सकें विवादों से

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sam manekshaw7
गोरखा रेजीमेंट के जवानों के साथ फील्डमार्शल सैम मानिक शॉ

भारत के सर्वश्रेष्ठ सेनाअध्यक्षों में से एक सैम मानिक शॉ भी भारत सरकार और सेना के अफसरों के बीच अक्सर होने वाले विवादों में फंसने से नहीं बच सके I यह घटना है तकरीबन 1959 के आस-पास की जब जनरल एस. थिमैया भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष हुआ करते थे और भारत के ऊपर चीन का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा था I

1959 में भारत के रक्षा मंत्री प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के बेहद करीबी माने जाने वाले यूनाइटेड नेशन में भारत के पूर्व प्रतिनिधि कृष्ण मेनन थे I कृष्ण मेनन अपने रूखे और सख़्त तेवरों के लिए इतने कुख्यात थे कि सेना के तीनों प्रमुख उनके पीठ पीछे उन्हें ‘गॉड अलमाइटी’ कहा करते थे. उनकी एक आदत थी कि वह जूनियर अफ़सरों को बुला कर सीनियर अफ़सरों के बारे में उनकी राय पूछा करते थे I

अपनी इसी आदत के चलते एक दिन मेनन ने मेजर जनरल सैम मानिक शॉ को भी बुला लिया और बुलाकर उन्होंने उनसे पूछा की सेनाध्यक्ष एस.थिमैया के बारे में आप क्या सोचते हो ? और जैसा कि जग जाहिर है कि सैम का स्वाभाव कैसा था, उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा कि, “सर एक जूनियर अफ़सर के तौर पर हमें अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर टिप्पणी करने की अनुमति नहीं दी जाती. हम अपने सीनियर अधिकारियों की इज़्जत करते हैं और इस बारे में कोई दो राय नहीं है I”

मेनन को सैम के द्वारा कहे गए यह शब्द बहुत ही बुरे लगे और उन्होंने सैम से बदला लेने की ठानी और उन्होंने शायद बाद में ऐसा किया भी होगा लेकिन इसका अभी तक कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता है I

पंडित जवाहरलाल नेहरु के साथ वी.कृष्ण मेनन तत्कालीन रक्षा मंत्री1959- 1962
पंडित जवाहरलाल नेहरु के साथ वी.कृष्ण मेनन तत्कालीन रक्षा मंत्री1959- 1962

चीन के खतरे को देखते हुए थिमैय्या चाहते थे कि भारत रक्षा तैयारियों पर और ध्यान दे I कृष्ण मेनन ने उनकी बात को गंभारता से नहीं लिया I मजबूर होकर थिमैय्या ने प्रधान मंत्री नेहरू से मिलने का समय माँगा I

उन्होंने इस बात पर माफ़ी माँगी कि रक्षा मंत्री के होते हुए भी वह रक्षा से संबंधित मामलों पर उनसे बात करने आए हैं I

उन्होंने नेहरू को साफ़ साफ़ बताया कि किस तरह मेनन उनकी सलाह की पूरी तरह से अवहेलना कर रहे हैं I

बेहतर यह होगा कि अगर वह ठीक समझें तो रक्षा मंत्री को बुला कर हालात की गंभीरता बताएं और बाद में दूसरे सेना प्रमुख भी इस बैठक में शामिल हो जाएं I

लेकिन नेहरू का कहना था कि वह पहले इस मुद्दे पर मेनन से ख़ुद बात करें I

थिमैय्या ने आशंका जताई कि मेनन को यह बात पसंद नहीं आएगी I लेकिन नेहरू का कहना था कि इस मुद्दे पर मंत्री को बाई पास करना ठीक नहीं होगा I

जब थिमैय्या कृष्ण मेनन से मिले तो मेनन उन पर आग बबूला हो गए कि वह बग़ैर उनकी इजाज़त के नेहरू से कैसे मिले? यह सरासर बग़ावत है और पूरी तरह से अनुचित है I

थिमैय्या बातचीत बीच में ही छोड़कर अपने घर चले आए और अपनी पत्नी से कहा कि सामान बाँधिए. आर्मी हाउस से बाहर निकलने का समय आ गया है I

उन्होंने नेहरू से मिलने का एक बार फिर समय लिया I

नेहरू उनका इस्ताफ़ा देख कर दंग रह गए I उनके कंधे पर हाथ रखते हुए उन्होंने कहा, “इस इस्तीफ़े को तुरंत वापस लीजिए. सात बजे तक इस इस्तीफ़े को बापस लेने के बारे में एक और पत्र मुझे दीजिए. तब तक यह पत्र मैं अपने पास रखे रखूँगा I”

थिमैय्या झिझक रहे थे. तब नेहरू ने अपना टृंप कार्ड चला, “टिमी मैं आप से कह रहा हूँ कि आप मेरे लिए इस इस्तीफ़े को वापस ले लें और मैं ऐसा प्रधान मंत्री के तौर पर ऐसा नहीं कह रहा हूँ बल्कि एक बुज़ुर्ग के रूप में कह रहा हूँ I”

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