समाजवादी सेकुलर मोर्चा का गठन, समाजवादी पार्टी का नया रूप या भाजपा का सौभाग्य

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अमेठी (ब्यूरो)- समाजवादी पार्टी में राजनैतिक महाभारत के परिणाम स्वरूप समाजवादी सेकुलर मोर्चा का गठन, समाजवादी पार्टी का नया रूप या भाजपा का सौभाग्य। राजनीति में सत्ता के लिये कोई किसी का खास या रिश्तेदार नहीं होता है। नैतिक हो चाहे अनैतिक किसी प्रकार से सत्ता पाने के लिये खूनी संघर्ष का एक लम्बा इतिहास रहा है।
इतिहास गवांह है की मुग़ल शासक औरंगजेब तथा महाभारत में कंश का नाम विशेष रूप से याद किया जाता है कि इन शासको ने अपने पिता को कैदखाने में डालकर सत्ता पर अनैतिक रूप से कब्ज़ा कर लिया। देश में लोकतंत्र की स्थापना के बाद से कई राजनेताओं की मौत अब तक संदिग्ध परिस्थितियों में हो चुकी है।

विधान सभा चुनाव से पूर्व समाजवादी पार्टी के संस्थापक एवं चरखा दाँव लगाकर राजनैतिक दुशमनों को चारों खाने चित्त करने में महारथ रखने वाले मुलायम सिंह यादव को उन्ही के प्रिय पुत्र जिनको नेताजी ने मात्र पुत्रमोह में सूबे की राजगद्दी सौप दी अखिलेश और जिन पर आँख मूंदकर विश्वास करते थे जिन्हें प्रोफ़ेसर रामगोपाल यादव कहते है ने परास्त कर दिया। उनके समर्थकों को मंत्रिमंडल से ही नहीं निकाले बल्कि भरे मंच से बेइज्जत कर दिया गया। जिसने अपने खून पसीने से सींचकर पार्टी को राष्ट्रीय क्षितिज तक पहुँचाकर सत्ता में भागीदारी दिलाई थी उसे ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से ही हटाकर संरक्षक बना दिया गया।इतना ही नहीं उनकी जगह राष्ट्रीय अध्यक्ष बने उनके पुत्र ने वायदा किया कि चुनाव बाद वह राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद पुनः अपने पिता को वापस लौटा देंगे।

बेइमानी बनाम ईमानदार को लेकर समाजवादी पार्टी में शुरू हुयी लड़ाई ने ऐन चुनाव के वक्त महाभारत का रूप धारण कर लिया था। चुनाव आयोग के रूख और चुनाव का समय देखकर नेता जी मुलायम सिंह यादव चुप तो हो गये लेकिन दो तीन जगहों के अलावा कहीं चुनाव प्रचार करने नहीं गये। अखिलेश यादव द्वारा कांग्रेस के साथ गठबंधन करने में भी उनसे कोई मशविरा नहीं लिया गया और उनके हरदिल अजीज भाई शिवपाल सिंह यादव के साथ उन्हें भी किनारे लगा दिया गया। इसके बावजूद शिवपाल सिंह यादव मोदी योगी की आँधी में भी चुनाव जीत गये और सरकार बनाने का ख्वाब देखने वाले अखिलेश बुरी तरह चुनाव हार गये। चुनावी हार होने के बाद यह अनुमान लगाया जा रहा था कि यदुवंशी समाजवादी परिवार का राजनैतिक झगड़ा शांत हो जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

चुनाव के बाद विपक्षी नेता पद के लिये चयन हो जाने के बाद पहली बार मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी सामने आ गयी। उनके अपने पति के समर्थन में सामने आकर उनके हितों की रक्षा करने के लिये संघर्ष करने के ऐलान के बाद फिर लगा कि महाभारत समाप्त नहीं हुआ है। चुनाव के बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में आये प्रधानमंत्री मोदी से नेताजी का कान में बात करने और उनके भाई शिवपाल सिंह यादव की मुख्यमंत्री से मुलाकात होने के बाद तरह तरह के कयास लगाये जा रहे थे।

अभी कुछ ही दिन पहले शिवपाल सिंह यादव ने एक कार्यक्रम के दौरान अखिलेश से वायदे के मुताबिक मुलायमसिंह यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद सौंपने की माँग की थी और न करने पर नयी पार्टी गठित करने की बात कही थी। इस पर अखिलेश यादव के हरदिल अजीज चाचा रामगोपाल यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी।

यहाँ यह भी बताना जरूरी है की एक समय था जब समाजवादी दल नहीं आंदोलन है के नाम से जानी जाती थी | समाजवादी पार्टी तथा मुलायम सिंह यादव के संगठन का लोहा मानते सभी विपक्षी दल। लेकिन समाजवादी पार्टी का दुर्भाग्य जी कहा जा सकता है कि जब सत्ता में आई समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव को इस आधार पर गद्दी सौप दी की वे नेता जी के पुत्र है। अखिलेश यादव गद्दी संभालने के बाद अपनी उस सेना और सेनानायकों पर कतई ध्यान नहीं दिया जिसके बल पर चुनाव के मैदान में प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई थी ।

समय बीतता गया सत्ता सुख भोगते रहे सपा की सेना वा सेनानायको पर जुर्म होता रहा। सांसद विधायको ने सामानांतर संगठन चलाया यही नहीं सपा संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव जी ने खुली बैठको में भी नशीहत दी जिसके परिणाम स्वरुप अखिलेश जी रणनीतिकारो ने नेता जी को ही बाहर का रास्ता दिखा दिया। लोग कहते हैं कि इस वर्तमान यदुवंशी महाभारत में नेता जी के चरखे दाँव को उनके अपने ही फेल कर रहे हैं । इसे सत्तारूढ़ भाजपा का सौभाग्य ही कहा जायेगा कि उसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी खुद तबाही की कगार पर खड़ा हो गया है। कल शिवपाल सिंह यादव ने अपने ऐलान के मुताबिक एक नयी राजनैतिक पार्टी का गठन अपने आराध्य रामतुल्य भाई मुलायम सिंह यादव की अध्यक्षता में कर लिया है।

अखिलेश सिंह यादव ने अगर अपने चाचा के साथ अपनी स्वच्छ विकासशील छबि से अपनी पहचान बनाई है तो उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने अकेले अपने दम पर समाजवादी कुनबा खड़ा किया है जिससे सभी मुख्य दल घबड़ा रहे थे। मुलायम सिंह यादव की पहचान एक समाजवादी नेता के रूप में थी और आगे भी रहेगी। नयी पार्टी बनने के बाद एक बार समाजवादी पार्टी में बिखराव होगा किन्तु समय की माँग है कि दागी बदनाम बेइमान भ्रष्ट साम्प्रदायिक छबि वालों की जगह नये ईमानदार लोगों को तरजीह दी जाय। समय सदीं परिवर्तन के साथ राजनैतिक चेहरों में भी बदलाव जरूरी है।

रिपोर्ट-हरि प्रसाद यादव

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