जीवन गाथा – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

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स्वतंत्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और देश के दूसरे राष्ट्रपति व महान शिक्षाविद थे I डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के सबसे उत्तम मानने वाले और उसे आगे बढाने वाले ब्यक्ति थे I वह एक महान दार्शनिक और हिन्दू विचारक थे I डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के इन्ही विचारों और उनके द्वारा किये इसी प्रकार के महान कार्यों के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1954 में देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से सम्मानित किया था I

 The Vice-President, Dr. S. Radhakrishnan, inaugurating the Round-Table Conference on the Teaching of the Social Sciences, in South Asia in the old Convocation Hall, Delhi University, on February 15, 1954. The Conference has been organized by the UNESCO. Photograph taken on the occasion shows Dr. S. Radhakrishnan delivering his inaugural address.

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजनीति में आने से पहले एक अध्यापक थे और राजनीति में आने के बाद भी उन्होंने कभी भी एक शिक्षक का स्वाभाव और जीवन छोड़ा नहीं था I भारत के सर्वोच्च पद पर रहते हुए भी वह मूलतः एक शिक्षक ही बने रहे I इसी के आधार पर भारत सरकार ने उन्ही के जन्म दिवस को राष्ट्रीय शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी I और तभी से आज तक पूरे देश में 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है I

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु राज्य के तिरूतनी ग्राम में 5 सितम्बर 1888 को हुआ था। देश के दूसरे राष्ट्रपति का जन्म एक शिक्षित ब्राह्मण परिवार में हुआ था I श्री राधाकृष्णन जी के पिता का नाम वीरास्वामी और माता जी का नाम सीताम्मा था I इनके पिता जी उस समय अंग्रेजों के अधीन भारत सरकार में राजस्व विभाग में कार्यरत थे I डाक्टर राधाकृष्णन के पांच भाई और एक बहन थी और राधाकृष्णन जी अपने परिवार में दूसरे स्थान पर थे इनसे बड़े केवल एक ही भाई थे I काफी बड़ा परिवार होने की वजह से इनके पिता श्री वीरास्वामी अपने परिवार के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं कर पाते थे I फिर भी श्री राधाकृष्णन के रास्ते में यह बाधाये उनके आगे पढने को नहीं रोक सकी I

देश के दूसरे राष्ट्रपति डाक्टर राधाकृष्णन राजनीति में आने से पूर्व 40 वर्षों तक शिक्षक थे, उन्होंने एक शिक्षक के रूप में देश व समाज की लम्बे अरसे तक सेवा की थी I उनके भीतर एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण मौजूद थे I और यही कारण है कि जब उनके जन्मदिवस को मनाने की बात हुई थी तब उन्होंने खुद से ही आगे बढ़कर यह कहा था कि उनका जन्मदिवस उनके नाम पर नहीं बल्कि देश के सम्पूर्ण शिक्षकों के लिए उनके दिन के तौर पर मनाया जाना चाहिए I तभी से पूरे देश में उनके जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है I

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डाक्टर राधाकृष्णन के अनुसार यह समस्त संसार एक शिक्षालय है, एक विद्यालय है I उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जाना सम्भव है। इसीलिए समस्त विश्व को एक इकाई समझकर ही शिक्षा का प्रबन्धन किया जाना चाहिये। आपको बता दें कि एक बार ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था कि मानव की जाति एक होनी चाहिये। मानव इतिहास का सम्पूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति है। यह तभी सम्भव है जब समस्त देशों की नीतियों का आधार विश्व-शान्ति की स्थापना का प्रयत्न करना हो।

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डॉ॰ राधाकृष्णन के अनुसार मात्र जानकारियाँ देना शिक्षा नहीं है। यद्यपि जानकारी का अपना अलग महत्व है और आधुनिक युग में तकनीक की जानकारी महत्वपूर्ण भी है तथापि व्यक्ति के बौद्धिक झुकाव और उसकी लोकतान्त्रिक भावना का भी बड़ा महत्व है। ये बातें व्यक्ति को एक उत्तरदायी नागरिक बनाती हैं। शिक्षा का लक्ष्य है ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरन्तर सीखते रहने की प्रवृत्ति। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को ज्ञान और कौशल दोनों प्रदान करती है तथा इनका जीवन में उपयोग करने का मार्ग प्रशस्त करती है। करुणा, प्रेम और श्रेष्ठ परम्पराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं।

वह अक्सर कहा करते थे कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होता और शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने अनेक वर्षोँ तक अध्यापन किया। एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण उनमें विद्यमान थे। उनका कहना था कि शिक्षक उन्हीं लोगों को बनाया जाना चाहिये जो सबसे अधिक बुद्धिमान हों। शिक्षक को मात्र अच्छी तरह अध्यापन करके ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिये अपितु उसे अपने छात्रों का स्नेह और आदर भी अर्जित करना चाहिये। सम्मान शिक्षक होने भर से नहीं मिलता, उसे अर्जित करना पड़ता है।

उनकी मृत्यु १७ अप्रैल १९७५ को हुई थी।

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