जानें: क्या होता है महाभियोग और कैसे सुप्रीमकोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को किया जा सकता है किनारे

देश की सर्वोच्च न्यायालय इन दिनों सुर्ख़ियों में बनी हुई है, ब्रहस्पतिवार को देश की सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय सुनाया, जिसके तहत महाराष्ट्र से आने वाले सीबीआई की विशेष अदालत के जज जेएच लोया की मौत के मसले पर स्पेशल जांच वाली याचिका को ठुकरा दिया गया है | जिस पीठ ने इस याचिका को ठुकराया था उसमें CJI यानी कि चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया दीपक मिश्रा भी शामिल थे, दीपक मिश्रा पहले भी कई मामलों में सुर्ख़ियों में आ चुके है, इस बार विपक्ष को एक बार फिर से उनके खिलाफ बोलने का अवसर इस नए जजमेंट ने दे दिया है |

अब आज कांग्रेस के नेत्र्तत्व में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, आरजेडी, सीपीआई, एनसीपी ने मिलकर 71 राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षर वाला एक प्रस्ताव सभापति महोदय को सौंपा है, यह प्रस्ताव चीफ जस्टिस के विरुद्ध लगाया गया महाभियोग प्रस्ताव है |

इसे पहले की बात आगे बढे आपके लिए यह जान लेना बेहद आवश्यक है कि वास्तव में महाभियोग है क्या तो,

अगर देश का प्रधान न्यायाधीश या कोई हाईकोर्ट का न्यायाधीश संवैधानिक नियमों के अनुरूप नहीं चलता है तो उसे पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग लाया जाता है. संविधान के अनुच्छेद 124 के भाग 4 में सुप्रीम कोर्ट या किसी हाईकोर्ट के जज को हटाने के लिए महाभियोग लाए जाने का प्रावधान किया गया है |

महाभियोग पर क्या कहता है संविधान-
भारत के संविधान की धारा 124 के भाग 4 में सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस या फिर हाई कोर्ट के मुख्यन्यायाधीशों को उनके पदों से हटाने के लिए पूरी प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन किया गया है | धारा 124 का भाग 4 कहता है कि अगर कोई शख्स देश का चीफ जस्टिस है, तो उसे सिर्फ संसद ही हटा सकती है | इसके लिए संसद के द्वारा महाभियोग प्रस्ताव लाया जाना आवश्यक है | अब अगर किसी चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग लाना है, तो राज्यसभा के कम से कम 50 सांसदों और लोक सभा के कम से कम 100 सांसदों को महाभियोग के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करना होगा |

यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह प्रस्ताव राज्यसभा के सभापति यानी कि भारत के उपराष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा और लोकसभा में यह प्रस्ताव लोकसभा स्पीकर के पास भेजा जाना चाहिए | अगर वे दोनों इसपर अपनी स्वीकृति देते है तो उसके बाद ही आगे की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है जो कि वोटिंग की है |

साथ ही यह भी जान लीजिये कि लोकसभा अध्यक्ष या फिर राज्यसभा के सभापति के पास ये विशेषाधिकार भी है कि अगर वे चाहे तो वो प्रस्ताव को खारिज कर दे या फिर उसे स्वीकार कर ले | अगर प्रस्ताव खारिज हो जाता है, तो प्रक्रिया फिर से शुरू करनी पड़ती है | लेकिन अगर लोकसभा या फिर राज्यसभा में प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो फिर जजेज (इन्क्वायरी) ऐक्ट) 1968 के तहत मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए एक कमेटी बनायी जाती है|

इस कमेटी में तीन लोग होते हैं, जिनमें से एक सुप्रीम कोर्ट का जज होता है, बाकी एक अलग-अलग राज्यों के हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों में से कोई एक न्यायाधीश हो सकता है और इसके अलावा जो तीसरा सख्स इस प्रक्रिया या फिर कहें तो इस कमेटी में शामिल होता है वह या तो कानून का जानकार होता है या फिर कोई रिसर्च स्कॉलर हो सकता है |

अब कमेटी अगर अपनी जांच में चीफ जस्टिस को दोषी पाती है, तो फिर जिस सदन में ये प्रस्ताव रखा गया होता है, कमेटी अपनी जांच रिपोर्ट उस सदन में रखती है | सदन उस प्रस्ताव पर अपनी सहमति अगर दे देता है तो फिर कहीं जाकर इसे दूसरे सदन में विचार करने के लिए भेजा जा सकता है |

अगर इस प्रस्ताव को दोनों सदन में दो तिहाई या फिर इससे अधिक बहुमत मिल जाता है, तो इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है जिसके बाद राष्ट्रपति चीफ जस्टिस को हटाने के लिए मंजूरी देते हैं और चीफ जस्टिस को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ता है |

कैसे लाया जाता है महाभियोग प्रस्ताव-
किसी जज को हटाने के लिए महाभियोग की शुरुआत लोकसभा के 100 सांसदों या राज्यसभा के 50 सदस्यों की सहमति के प्रस्ताव से हो सकती है | नोटिस को लोकसभा में स्पीकर तथा राज्यसभा में सभापति स्वीकार या खारिज कर सकते हैं |

जज को भी दिया जाता है बचाव का मौका-
समिति जांच पूरी करने के बाद अपनी रिपोर्ट पीठासीन अधिकारी को सौंपती है | उसके बाद आरोपी जज को भी अपने बचाव का मौका मिलता है |

किसके-किसके खिलाफ आ चुका है महाभियोग प्रस्ताव-
चूँकि आज देश के चीफ जस्टिस के खिलाफ कांग्रेस के नेत्र्तत्व में विपक्ष महाभियोग का प्रस्ताव ला चुका है, हालाँकि अभी तक यह बात अभी तक स्पष्ट नहीं हो सकी है कि सभापति महोदय ने उसे स्वीकार किया है या नहीं लेकिन फिर भी आपको बता दें कि ऐसा नहीं है कि यह पहली बार नहीं हुआ कि किसी जज के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया हो देश के कई मुख्यन्यायाधीशों के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव पहले भी लाया जा चुका है |

जस्टिस पीडी दिनाकरण-
जस्टिस पीडी दिनाकरण सिक्किम हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं | 2009 में राज्यसभा के 75 सांसदों ने तत्कालीन उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी को एक पत्र लिखकर जस्टिस दिनाकरण को हटाने की सिफारिश की थी | उनके खिलाफ सांसदों ने कुल 12 आरोप लगाए थे | हामिद अंसारी ने जस्टिस दिनाकरण के खिलाफ 2010 में जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति भी बना दी थी | जब तक समिति की रिपोर्ट आती, जस्टिस दिनाकरण ने खुद ही इस्तीफा दे दिया था |

जस्टिस सौमित्र सेन-
जस्टिस सौमित्र सेन कोलकाता हाई कोर्ट के जस्टिस रहे हैं | 2011 में जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ 24 लाख रुपये की वित्तीय गड़बड़ी का आरोप लगा था | इसके बाद राज्यसभा में जस्टिस सेन के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया | राज्यसभा से प्रस्ताव पास हो गया तो जस्टिस सौमित्र सेन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया | हालांकि जब लोकसभा की प्रक्रिया शुरू हुई, तो उस वक्त लोकसभा में महाभियोग का प्रस्ताव खारिज हो गया |

जस्टिस जेबी पर्दीवाला-
जस्टिस जेबी पर्दीवाला गुजरात हाई कोर्ट में जस्टिस थे | 2015 में आरक्षण के मुद्दे पर उन्होंने टिप्पणी की थी | ये टिप्पणी पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के एक मामले में की गई थी | इसके बाद राज्यसभा के 58 सांसदों ने महाभियोग का नोटिस भेजा था | जब तक उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी इस मुद्दे पर कोई फैसला करते, जस्टिस पर्दीवाला ने अपनी टिप्पणी वापस ले ली | इसके बाद महाभियोग का नोटिस भी वापस ले लिया गया |

जस्टिस नागार्जुन रेड्डी-
जस्टिस नागार्जुन रेड्डी आंध्रप्रदेश और तेलंगाना हाई कोर्ट के जस्टिटस थे | 2016 में उनके खिलाफ महाभियोग लाने के लिए याचिका दाखिल की गई थी | आरोप था कि जस्टिस रेड्डी ने एक जस्टिस को इसलिए प्रताड़ित किया था, क्योंकि वो दलित थे | इसके बाद राज्सभा के 61 सदस्यों ने महाभियोग चलाने के लिए हस्ताक्षर किया था | प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही राज्यसभा के 9 सदस्यों ने अपने हस्ताक्षर वापस ले लिए, जिसके बाद महाभियोग की प्रक्रिया रोक दी गई |

जस्टिस वी रामास्वामी-
जस्टिस वी रामास्वामी पंजाब और हरियाणा के चीफ जस्टिस थे | 1991 में उनपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे | इसके अलावा उनकी नियुक्ति में भी गड़बड़ी की बात सामने आई थी | इसके बाद 1993 में उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लोकसभा में लाया गया | जब प्रस्ताव को पास करवाने की बारी आई, तो कांग्रेस ने वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लिया | इसकी वजह से महाभियोग के पक्ष में बहुमत साबित नहीं हो पाया हालांकि बाद में जस्टिस वी रामास्वामी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था |

क्या विपक्ष हटा सकता है दीपक मिश्रा को-
तो नहीं साहब यह कभी नहीं हटा सकते क्योंकि महाभियोग लाने वाली मुख्य पार्टियां कांग्रेस, डीएमके, आरजेडी, एनसीपी, सपा, टीएमसी, बीएसपी इत्यादि है और यही सभी, इतना ही नहीं समूचा विपक्ष भी एक जुट हो जाय तब भी भारतीय जनता पार्टी को यह राज्यसभा में भले ही पटखनी दे दें लेकिन लोकसभा में इनका प्रस्ताव कभी भी पारित नहीं हो सकता है और न ही यह सभी मिलकर भी दो तिहाई बहुमत जुटा सकते है | .तो इस बात की चिंता तो जस्टिस दीपक मिश्रा को भी नहीं होगी कि उन्हें उनका कार्यकाल पूरा करने से कोई रोक सकता है, हाँ इतना अवश्य है कि उनके माथे पर एक कलंक अवश्य विपक्ष लगा सकता है | इतिहास में दीपक मिश्रा का नाम भी ऐसे जजों में लिया जाएगा जिनके विरुद्ध राजनेताओं ने महाभियोग की प्रक्रिया की शुरुवात की थी लेकिन हमेशा की ही तरह से राजनैतिक दांव पेंचों की वजह से यह अंजाम तक नहीं पहुँच सकी |

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