कारगिल का वो वीर जिसने सैनिक जीवन की शुरुवात ही परमवीरचक्र प्राप्त करने के लिए की थी |

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शहीद कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय

( परम वीर चक्र)


” जिस समय राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (N.D.A.) के च्वाइस वाले कालम जहाँ यह लिखना होता हैं कि वह जीवन में क्या बनना चाहते हैं क्या पाना चाहते हैं वहां सब लिख रहे थे कि, किसी को चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ बनना चाहता हैं तो कोई लिख रहा था कि उसे विदेशों में पोस्टिंग चाहिए आदि आदि, उस फार्म में देश के बहादुर बेटे ने लिखा था कि उसे केवल और केवल परमवीर चक्र चाहिए “


प्रारंभिक जीवन और सैनिक स्कूल में जाना – शहीद कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय का जन्म लखनऊ से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर सीतापुर जिले में कमलापुर के पास एक छोटे से गाँव में 25 जून 1975 को हुआ था, छोटे से गाँव में अपने बेटे के लिए पढ़ाई की अच्छी सुविधा न देखकर कैप्टन के पिता श्री गोपीचन्द्र पाण्डेय ने बेटे के अच्छे भविष्य के लिए लखनऊ जाना ही उचित समझा और वह अपनी पत्नी श्रीमती ब्रज्मोहिनी देवी और बेटे के साथ लखनऊ में आकर रहने लगे !

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मनोज कुमार पाण्डेय की प्रारंभिक शिक्षा लखनऊ के ग्रीनफील्ड स्कूल से वर्ष 1979 में प्रारंभ हुई, प्रारंभ से ही वह अपने स्कूल के सर्वश्रेठ विद्यार्थी थे, वहां से निकल कर जुलाई 1984 को कक्षा छह में रानी लक्ष्मीबाई मेमोरियल स्कूल रहीम नगर में दाखिला लिया था और यही से वर्ष 1986-1987 अखिल भारतीय आवासीय विद्यालय छात्रवति परीक्षा को पासकर वह सैनिक स्कूल लखनऊ पहुँच गए I

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सैनिक स्कूल – सैनिक स्कूल के ही अध्यापक श्री रामपाल शुक्ल के अनुसार मनोज कुमार पाण्डेय ने सैनिक स्कूल को जुलाई 1987 में ज्वाइन किया था और जून 1993 में जब उनका चयन भारतीय रक्षा अकादमी के लिए हो गया था तब ही उन्होंने सैनिक स्कूल को छोड़ सीधे भारतीय राष्ट्रीय रक्षा अकादमी चले गए थे I

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रामपाल शुक्ल जी के अनुसार मनोज पाण्डेय बचपन से ही केवल और केवल भारतीय सेना में ही जाना चाहते थे और वह देश के वह कर दिखाना चाहते जो उनसे पहले के इतिहास में कभी न हुआ था I आगे कहते हुए उनकी आँखों में आंशू भर लेकिन आंशुओं के साथ उन्होंने अपनी बात को पूरा करते हुए कहा कि बचपन से मनोज कुमार पाण्डेय का बस एक ही सपना था, पहला और आखिरी सपना वह था …..


 

61 59 60*** परमवीर चक्र ***


 

उनका कहना था कि यह परमवीर चक्र वह अपने लिए नहीं बल्कि अपने स्कूल, अपने माता-पिता और अपने देश के लिए पाना चाहते हैं I

नेशनल कैडेट कोर के लिए उन्हें सैनिक स्कूल में ही गवर्नर के द्वारा सम्मानित किया जा चुका था, आज 29 जून 1993 हैं और भारत माता का यह वीर सपूत, लखनऊ सैनिक स्कूल का एक छोटा सा बच्चा अब पहुँच चुका था राष्ट्रीय रक्षा अकादमी खड्गवाशला पुणे और अब बन चुका था भारत माता का एक सच्चा सिपाही I

कैप्टन की माता जी के अनुसार – मनोज का बचपन से ही एन.डी.ए. ज्वाइन करने का बहुत ज्यादा मन था, लेकिन हम ऐसा नहीं चाहते थे, हमनें उसे कई बार समझाने का प्रयास भी किया तो उसने हमसे कहा कि “मम्मी पहले तो आप सभी लोगों ने बहुत-बहुत एक से बढ़कर एक अच्छी-अच्छी वीरता की कहानी सुनायी और अब आप ही मुझे कमजोर कर रही हो, यह गलत बात हैं, उन्होंने आगे कहा था कि अगर आप सभी ही मुझे इतना कमजोर कर दोगे तो हम कैसे कुछ कर पायेंगे, उन्होंने अपनी मम्मी से आगे कहा कि क्या भगत सिंह कि मम्मी नहीं थी ? उनकी भी तो माँ थी न ! उन्होंने आगे नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की भी याद दिलाई अपनी मम्मी को I”

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तब मैंने सोचा कि अब अगर इसकी यही इच्छा हैं, देश के लिए कुछ करने की तो फिर जाने दो   I

कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय के अन्दर भारतीय सेना को लेकर इतना अधिक सम्मान था कि उसके लिए वह कुछ भी छोड़ सकते थे, जिस समय उनका चयन राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में हुआ था उसी के साथ उनका चयन इंजीनीयरिंग में भी हुआ था लेकिन उन्होंने उसे छोड़ राष्ट्रीय रक्षा अकादमी को चुना I

 


 

राष्ट्रीय रक्षा अकादमी – उन्हें राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में 6 जून 1997 को कमीशन मिला, जिस समय राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के फार्म यह भरवाया जा रहा था कि आप जीवन में क्या बनना चाहते हो, क्या पाना चाहते हो तो उस समय देश के इस सबसे होनहार बेटे ने बड़े गर्व से उस फार्म पर स्वर्णअच्छरों में लिखा था कि मैं परमवीर चक्र पाना चाहता हूँ I एक वह दिन था कि उस दिन के बाद इस देश के इस सच्चे सपूत ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा I देश के इस सच्चे सिपाही को 11 गोरखा राइफल में कमीशन मिलने के बाद पहली पोस्टिंग ही श्रीनगर में मिली जोकि आतंकवादियों की गतिविधियों के हिसाब से भारत का सबसे अधिक संवेदनशील इलाका था I

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कुछ दिन श्रीनगर में रहने के बाद लेफ्टीनेंट पाण्डेय को दुनिया के सबसे ऊँचे 18,000 फुट की उंचाई के मिलिट्री बेस कैम्प सियाचीन भेज दिया गया, जिसका तापमान सामान्य से माइनस चालीस डिग्री (-40) सेल्सियस रहता हैं, उनके अफसरों ने उनकी कड़ी मेहनत और देश के प्रति समर्पण को देखते हुए कमांडो ट्रेनिग के लिए भेज दिया था I

यही कारण था कि इनके सीनियर अफसरों ने इनका नाम शौर्य चक्र के लिए भेजा था I

 


 

4 मई 1999 ऑपरेशन रक्षक कारगिल सेक्टर


 

अततः वह दिन आ ही गया जिसका हर वीर सिपाही को इंतज़ार होता हैं, जिसके लिए हर एक वीर सैनिक रोज जीता हैं ….देश के मान, सम्मान और गौरव की रक्षा करने का I

लेफ्टीनेंट पाण्डेय ही वह पहले अफसर थे जिन्होंने स्वयं ही आगे बढ़कर सबसे पहले इस युद्ध में शामिल होने के लिए अपना नाम सेना को और अपने सीनीयर अफसरों को भेजा था, अगर लेफ्टीनेंट चाहते तो उन्हें छुट्टी मिल सकती थी क्योंकि उनकी यूनिट अभी-अभी सियाचिन से होकर वापस आई थी जिसे आराम की भी जरूरत थी लेकिन इस वीर सिपाही ने आराम करने की बजाय देश की रक्षा के लिए जान की बाजी लगाना ही ज्यादा उचित समझा और वह पहुँच गए कारगिल सेक्टर I

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कारगिल युद्ध के दौरान ही लेफ्टीनेंट मनोज कुमार पाण्डेय को पदोंनात्ति (प्रमोशन) दिया गया और उन्हें बना दिया गया लेफ्टीनेंट से कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय और अब इस वीर सिपाही ने शरू कर दिया था कारगिल सेक्टर में दुश्मन के गोले, बारूद और तोपों का सामना करना और चुन-चुन कर पाकिस्तानी घुसपैठियों का सफाया करना I

4 मई से ही कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय ने और उनकी सैनिक टुकड़ी ने बहुत ही बहादुरी के साथ दुश्मनों का चुन-चुन का सफाया करना शरू कर दिया था I


 

कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय के पिता जी ने बताया की उस समय पकिस्तान के साथ मेरा बेटा युद्ध कर रहा था हमें इसके समाचार मिल रहे थे लेकिन एक महीने पहले से फोन आने बंद हो गए थे हाँ इतना जरूर था कि पत्रों के माध्यम से बातचीत हो जाती थी, जिस समय मेरा बेटा युद्ध के मैदान में था उस समय हम भगवान् से बस एक ही दुआ कर रहे थे कि मेरा बेटा कभी पीछे मुड कर न देखे सदा दुश्मनों का सामना करते हुए आगे और आगे ही बढ़ते रहे I यही बात हम पत्रों के माध्यम से अपने बेटे को भी कहते थे I

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कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय की माता जी कहती हैं कि उनका आखिरी फोन 26 मई 1999 को आया था, उन्होंने आगे कहा कि अप्रैल से लेकर मई तक में उनके चार फ़ोन आये थे, वह एक-एक  हफ्ते में फ़ोन करते थे, हाँ उनका एक पत्र जरूर आया था वह हमें 22 या फिर 23 जून को मिला था I जिसमें उन्होंने लिखा था कि यहाँ पर लड़ाई बहुत ही भयंकर चल रही हैं इसलिए हम कहीं आ या फिर जा नहीं सकते हैं, अभी इन लोगों को भगाने में हमें लगभग 1 महीना और लगेगा, उन्होंने आगे लिखा था कि मम्मी-पापा आप भगवान् पर भरोषा रखना और भगवान् से प्रार्थना करना कि वह हमें हमारे मकसद में कामयाबी दिलायें !

कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय द्वरा लिखा गया अंतिम पत्र
कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय द्वरा लिखा गया अंतिम पत्र

और इस बहादुर देश भक्त की माँ ने भी जब उन्हें पत्र भेजा तो उसमें उन्होंने भी यही लिखा था कि बेटा आगे ही बढ़ते रहना कभी पीछे मुड कर मत देखना !


 

और आज 2 जुलाई 1999 की आधी रात हैं और कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय और उनकी यूनिट एक-एक कर दुश्मनों का सफाया करते हुए कारगिल सेक्टर की एक चोटी खालूरबार हिल पर पहुँच चुके थे और दुश्मनों के साथ लड़ते हुए उन्होंने खालूरबार के पास तीन बंकरों को दुश्मन से खाली करवाया और दुश्मन को मार भगाया I

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लेकिन तब तक देश के इस बहादुर और होनहार बेटे के कंधे और घुटने में गोलियां लग चुकी थी लेकिन फिर भी इस बहादुर बेटे ने हार नहीं मानी और न ही पीछे हटे बल्कि वह लगातार आगे बढ़ते और आगे ही बढ़ते चले गए और खालूबार टॉप के आखिरी बंकर को भी दुश्मन से खाली करवाने के लिए आगे बढे, तभी दुश्मन की एक गोली ने उनके सीने को भेद दिया लेकिन इसके बावजूद भी इस बहादुर सिपाही ने धैर्य नहीं खोया और आखिरी बंकर को भी ग्रेनेट फेंकर दुश्मन से खाली ही करवा लिया I और इसी आखिरी बंकर के खाली करवाने के साथ ही  देश के इस बहादुर बेटे ने अपने जीवन की आखिरी साँसे लेते हुए 3 जुलाई 1999 को इस देश और दुनिया को अलविदा कह दिया I

अंतिम यात्रा – 7 जुलाई 1999 की शाम को देश के इस वीर सिपाही के पार्थिव शरीर को सरकार ने एक स्पेशल विमान के द्वारा लखनऊ भेजा गया और 8 जुलाई 1999 को इनके पार्थिव शारीर को इनके परिवार को अंतिम दर्शन के लिए सौंप दिया गया I

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उस सुबह पूरा का पूरा लखनऊ अपनी आँखों में आँशू भरे हुए अपने सबसे बहादुर बेटे को अंतिम बिदाई दे रहा था I और इसी के साथ देश से इस बहादुर बेटे ने अपनी जीवन लीला को समाप्त कर लिया और पीछे छोड़ गया भारत वासियों के लिए अपनी वीर गाथायें  !!

उनसे जुडी कुछ यादें …..

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जय हिन्द! जय भारत !

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