फिल्म रिव्यु : शोरगुल

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फिल्म शोरगुल अपने नाम को पूरी तरह से सार्थक करती है, फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक इतना लाउड है कि पूरी फिल्म एक शोरगुल से ज्यादा और कुछ नहीं लगती |

हर बार कि तरह ही ‘शोरगुल’ राजनीती से प्रभावित घिसी पिटी कहानी को भुनाने कि कोशिश से ज्यादा और कुछ नहीं है | फिल्म 2013 में यूपी के एक कसबे मुज्जफरनगर में हुए दंगों पर आधारित है |

वही पुरानी कहानी एक मुस्लिम लड़की, एक हिन्दू लड़का, राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए नेताओं कि घटिया चालें, दंगे और हिंसा

अगर फिल्म में जिमी शेरगिल और आशुतोष राणा को छोड़ दिया जाए तो अभिनय भी कहानी की तरह घिसा पिटा ही है |
फिल्म को इतना भड़काऊ और नाटकीय बनाया गया है कि फिल्म अपना मूल सन्देश देने में कामयाब नहीं हो पायी है और शोरगुल के बीच कहीं खो गयी है |

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